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पशु बेचकर की थी बीज की जुगाड़
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25एमएनपी-21-औंछा के गांव नगला पीपल में किसान की मौत के बाद विलाप करते परिजन
- फोटो : MAINPURI
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मैनपुरी/औंछा। कर्ज और साहूकारों के तगादे से परेशान किसान को खेत में बोई फसल से काफी उम्मीदें थीं। इसीलिए दुधारू पशु बेचकर उसने बीज का जुगाड़ किया था। फसल बरबाद होने से उसके सपने टूट गए। वहीं साहूकार भी लगातार तगादा कर रहे थे। इससे किसान कई दिनों से परेशान चल रहा था।
परिजनों के अनुसार किसान साधू सिंह ने 12 बीघा फसल तो उगाही पर ले ली थी, लेकिन वह अब साहूकारों से मोटे ब्याज पर कर्ज लेना नहीं चाहता था। इस वजह से उसने अपनी भैंस और बकरी बेचकर धान के बीज की व्यवस्था की थी। उम्मीद थी कि फसल अच्छी होगी तो बड़ी बेटी नीतू की शादी में लिए गए करीब दो लाख रुपये के कर्ज का कुछ बोझ कम कर सकेगा। बीमार पत्नी सुनीता देवी का उपचार सही से करा सकेगा। वहीं 16 वर्षीय पुत्र अनूप, 14 वर्षीय पुत्री सीता, 11 वर्षीय सीटू और 10 वर्षीय शालिनी की परवरिश के लिए भी कुछ रुपयों का इंतजाम करना था।
शायद किसान की ये उम्मीद भी उस दिन खत्म हो गई जब फसल को पशुओं ने रौंद दिया। किसी तरह संभले किसान ने अब फसल को बेचने से कुछ मुनाफे की आस लगाई, लेकिन वह भी उस समय खत्म हो गई जब बुवाई तक का पैसा वसूल नहीं हुआ।
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हालात से हारे किसान को खुदकुशी के अलावा कोई और रास्ता नजर नहीं आया। एक ही झटके में परिवार की सभी खुशियां काफूर हो गईं। त्योहार की खुशी मातम में बदल गई।
अब कैसे होगा परिवार का भरण पोषण
किसान की मौत के बाद अब परिवार के सामने भरण पोषण की समस्या खड़ी हो गई है। परिवार के इकलौते कमाने वाले साधू सिंह की मौत के बाद पत्नी और बच्चों का रो-रो कर बुरा हाल है। ग्रामीणों का कहना है कि गरीब किसान की मौत के बाद अब भला इस परिवार की गाड़ी कैसे चलेगी। प्रशासन आर्थिक सहायता उपलब्ध कराए।
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परिजनों के अनुसार किसान साधू सिंह ने 12 बीघा फसल तो उगाही पर ले ली थी, लेकिन वह अब साहूकारों से मोटे ब्याज पर कर्ज लेना नहीं चाहता था। इस वजह से उसने अपनी भैंस और बकरी बेचकर धान के बीज की व्यवस्था की थी। उम्मीद थी कि फसल अच्छी होगी तो बड़ी बेटी नीतू की शादी में लिए गए करीब दो लाख रुपये के कर्ज का कुछ बोझ कम कर सकेगा। बीमार पत्नी सुनीता देवी का उपचार सही से करा सकेगा। वहीं 16 वर्षीय पुत्र अनूप, 14 वर्षीय पुत्री सीता, 11 वर्षीय सीटू और 10 वर्षीय शालिनी की परवरिश के लिए भी कुछ रुपयों का इंतजाम करना था।
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शायद किसान की ये उम्मीद भी उस दिन खत्म हो गई जब फसल को पशुओं ने रौंद दिया। किसी तरह संभले किसान ने अब फसल को बेचने से कुछ मुनाफे की आस लगाई, लेकिन वह भी उस समय खत्म हो गई जब बुवाई तक का पैसा वसूल नहीं हुआ।
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हालात से हारे किसान को खुदकुशी के अलावा कोई और रास्ता नजर नहीं आया। एक ही झटके में परिवार की सभी खुशियां काफूर हो गईं। त्योहार की खुशी मातम में बदल गई।
अब कैसे होगा परिवार का भरण पोषण
किसान की मौत के बाद अब परिवार के सामने भरण पोषण की समस्या खड़ी हो गई है। परिवार के इकलौते कमाने वाले साधू सिंह की मौत के बाद पत्नी और बच्चों का रो-रो कर बुरा हाल है। ग्रामीणों का कहना है कि गरीब किसान की मौत के बाद अब भला इस परिवार की गाड़ी कैसे चलेगी। प्रशासन आर्थिक सहायता उपलब्ध कराए।