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सिर्फ ‘आरओ’ से बर्बाद हो रहा पानी ही इतना कि यमुनापार का संकट दूर हो जाए
ब्यूरो, अमर उजाला
Updated Sun, 17 May 2015 02:04 AM IST
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आरओ (रिवर्स आसमोसिस) सिस्टम के बूते बेशक पीने के लिए मीठे पानी का इंतजाम हो जा रहा हो। ऐसे पानी की सप्लाई करने वाले ढेरों प्लांट भी शहर में संचालित हैं। लेकिन मीठे पानी से प्यास बुझाने की यह कोशिश भविष्य को कितना ‘खारा’ कर रहा है, कम ही लोग जानते हैं। यूं समझ लीजिए कि एक लीटर शुद्ध/मीठा पानी देने के लिए ये संयंत्र तीन लीटर पानी बर्बाद करते हैं। एक अनुमान के मुताबिक लगभग 95 लाख लीटर पानी रोज बर्बाद हो रहा है। यह मात्रा इतनी बड़ी है कि इसे बचाकर यमुनापार के अधिकांश क्षेत्रों में जलसंकट दूर किया जा सकता है। यही कारण है कि अंधाधुंध दोहन हो रहा है जिसका नतीजा भूगर्भ जल नीचे, और नीचे खिसकता स्तर है। अगर इसके रिचार्ज के उपाय न हुए तो भविष्य में पानी के लिए तरसना पड़ सकता है। बता दें, भूगर्भ जल में फ्लोराइट, आर्सेनिक और बैक्टीरिया अधिक होने के कारण शहर में हजारों लोगों ने घरों में आरओ लगे हैं।
70 फीसदी पानी बर्बाद
तमाम संस्थानों और फैक्ट्रियों में बड़े आरओ प्लांट लगे हैं। इन प्लांट में 70 फीसदी पानी बेकार जाता है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि कितने पानी का दोहन किया जा रहा है। ऐसी स्थिति में भूगर्भ जल का स्तर गिरना स्वाभाविक है।
टीडीएस है कई गुना
शहर में अलग-अलग जगहों पर भूगर्भ जल की स्थिति अलग है। टीडीएस की ही बात हो तो यह 700 से 2300 मिलीग्राम प्रति लीटर तक है। दरअसल, टीडीएस पानी में घुले मिनरल कैल्शियम, मैग्नीशियम, पोटैशियम, सोजियम, बाईकार्बोनेट, क्लोराइट्स, सल्फेट्स हैं। इससे पानी में खरापन आ जाता है। जितना अधिक टीडीएस होगा, उसके शोधन में पानी उतना अधिक बेकार होगा।
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उपयोग में लाया जा सकता है यह पानी
जिन घरों में आरओ लगे हैं, उनमें अधिकांश लोग इससे निकलने वाले बेकार पानी का पाइप नाली में ही डाल देते हैं। इस बेकार पानी में हानिकारक तत्वों की मात्रा इतनी अधिक हो जाती है कि इसे न तो बागवानी में उपयोग किया जा सकता है और न ही सब्जी धोने में। मगर, इस पानी से घर के बर्तन जरूर साफ किए जा सकते हैं। साथ ही घर, वाहन आदि की धुलाई आदि में प्रयोग किया जा सकता है।
जलकल का पानी भी शुद्ध नहीं
जानकारों के मुताबिक, जलकल से सप्लाई होने वाला पानी भी शुद्ध नहीं है। इस पानी में टीडीएस की मात्रा लगभग 650 मिलीग्राम प्रति लीटर है। इसी को देखते हुए भूगर्भ जल के अलावा जिन लोगों के यहां वाटर वर्क्स के पानी की सप्लाई है, उनमें अधिकांश ने आरओ लगवा रखे हैं।
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70 फीसदी पानी बर्बाद
तमाम संस्थानों और फैक्ट्रियों में बड़े आरओ प्लांट लगे हैं। इन प्लांट में 70 फीसदी पानी बेकार जाता है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि कितने पानी का दोहन किया जा रहा है। ऐसी स्थिति में भूगर्भ जल का स्तर गिरना स्वाभाविक है।
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टीडीएस है कई गुना
शहर में अलग-अलग जगहों पर भूगर्भ जल की स्थिति अलग है। टीडीएस की ही बात हो तो यह 700 से 2300 मिलीग्राम प्रति लीटर तक है। दरअसल, टीडीएस पानी में घुले मिनरल कैल्शियम, मैग्नीशियम, पोटैशियम, सोजियम, बाईकार्बोनेट, क्लोराइट्स, सल्फेट्स हैं। इससे पानी में खरापन आ जाता है। जितना अधिक टीडीएस होगा, उसके शोधन में पानी उतना अधिक बेकार होगा।
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उपयोग में लाया जा सकता है यह पानी
जिन घरों में आरओ लगे हैं, उनमें अधिकांश लोग इससे निकलने वाले बेकार पानी का पाइप नाली में ही डाल देते हैं। इस बेकार पानी में हानिकारक तत्वों की मात्रा इतनी अधिक हो जाती है कि इसे न तो बागवानी में उपयोग किया जा सकता है और न ही सब्जी धोने में। मगर, इस पानी से घर के बर्तन जरूर साफ किए जा सकते हैं। साथ ही घर, वाहन आदि की धुलाई आदि में प्रयोग किया जा सकता है।
जलकल का पानी भी शुद्ध नहीं
जानकारों के मुताबिक, जलकल से सप्लाई होने वाला पानी भी शुद्ध नहीं है। इस पानी में टीडीएस की मात्रा लगभग 650 मिलीग्राम प्रति लीटर है। इसी को देखते हुए भूगर्भ जल के अलावा जिन लोगों के यहां वाटर वर्क्स के पानी की सप्लाई है, उनमें अधिकांश ने आरओ लगवा रखे हैं।