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सैटेलाइट से होगी बारहसिंघा की गणना
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कासगंज बारहसिंघा का फाइल फोटो
- फोटो : KASGANJ
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कासगंज। गंगा की खादर में अनुकूल वातावरण होने से बड़ी संख्या में वन्य जीव होने के कयास लगाए जा रहे हैं। इसमें बारहसिंघा हिरण भी देखे गए हैं। पिछले दिनों वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट देहरादून की टीम पटियाली के श्रीनगला कॉरिडोरी में बारहसिंघा हिरणों के झुंड देख चुकी है। ऐसे में उनकी सही गणना के लिए अब सैटेलाइट का सहारा लिया जाएगा।
वन्य जीवों के संरक्षण में वन विभाग के साथ ही वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फंड एवं वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट की टीमें भी लगी हुई हैं। जिले में डॉल्फिन, कछुआ, राजकीय पक्षी सारस के संरक्षण के अलावा अब बारहसिंघा के संरक्षण की भी मुहिम छेड़ी गई है। पिछले दिनों कासगंज क्षेत्र के इखौना एवं पटियाली के श्रीनगला कॉरिडोर में बारहसिंघा वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने देखे थे। वैज्ञानिकों ने माना है कि गंगा नदी के किनारे जंगलों में बड़ी संख्या में बारहसिंघा हो सकते हैं। खादर के जंगल काफी घने हैं। ऐसे में धरातल पर गणना आसान नहीं है। इसलिए सैटेलाइट के माध्यम से हिरणों की गणना की जाएगी।
ड्रॉन एवं अन्य कैमरों का भी सहारा
वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट की टीमें ड्रॉन एवं डीएसएलआर कैमरे का भी सहारा लेंगी। कैमरों में हिरणों के झुंडों को कैद करने के बाद उनकी गणना करेंगी। इसी सप्ताह देहरादून से वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट देहरादून के वैज्ञानिकों के जिले में पहुंचने की संभावना है। वन विभाग वहां के वैज्ञानिकों से निरंतर संपर्क में हैं।
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प्रोजेक्ट तैयार करने में जुटा वन विभाग
जैसे ही गंगा नदी के किनारे जंगलों में बारहसिंघा देखे गए हैं तो वन विभाग इनके संरक्षण को प्रोजेक्ट तैयार करने में जुट गया है। इससे कासगंज में हिरणों के अभ्यारण्य की स्थापना की जा सके। बारहसिंघा के साथ ही काले हिरण भी जंगलों में होने की संभावना जताई गई है।
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वन्य जीवों के संरक्षण में वन विभाग के साथ ही वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फंड एवं वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट की टीमें भी लगी हुई हैं। जिले में डॉल्फिन, कछुआ, राजकीय पक्षी सारस के संरक्षण के अलावा अब बारहसिंघा के संरक्षण की भी मुहिम छेड़ी गई है। पिछले दिनों कासगंज क्षेत्र के इखौना एवं पटियाली के श्रीनगला कॉरिडोर में बारहसिंघा वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने देखे थे। वैज्ञानिकों ने माना है कि गंगा नदी के किनारे जंगलों में बड़ी संख्या में बारहसिंघा हो सकते हैं। खादर के जंगल काफी घने हैं। ऐसे में धरातल पर गणना आसान नहीं है। इसलिए सैटेलाइट के माध्यम से हिरणों की गणना की जाएगी।
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ड्रॉन एवं अन्य कैमरों का भी सहारा
वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट की टीमें ड्रॉन एवं डीएसएलआर कैमरे का भी सहारा लेंगी। कैमरों में हिरणों के झुंडों को कैद करने के बाद उनकी गणना करेंगी। इसी सप्ताह देहरादून से वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट देहरादून के वैज्ञानिकों के जिले में पहुंचने की संभावना है। वन विभाग वहां के वैज्ञानिकों से निरंतर संपर्क में हैं।
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प्रोजेक्ट तैयार करने में जुटा वन विभाग
जैसे ही गंगा नदी के किनारे जंगलों में बारहसिंघा देखे गए हैं तो वन विभाग इनके संरक्षण को प्रोजेक्ट तैयार करने में जुट गया है। इससे कासगंज में हिरणों के अभ्यारण्य की स्थापना की जा सके। बारहसिंघा के साथ ही काले हिरण भी जंगलों में होने की संभावना जताई गई है।