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अध्ययन: 40 साल में 40 फीसदी ज्यादा शक्तिशाली हुआ अल नीनो, 1000 साल में पहली बार दिखा इतना ताकतवर
Mon, 31 Aug 2026 09:09 PM IST
धर्मेंद्र कुमार सिंह
फीचर डेस्क, अमर उजाला
फीचर डेस्क, अमर उजाला
Published by: धर्मेंद्र कुमार सिंह
Updated Mon, 31 Aug 2026 09:09 PM IST
सार
वैज्ञानिकों के एक अध्ययन के मुताबिक, बीते 40 वर्षों में पूर्व-औद्योगिक युग की तुलना में करीब अल नीनो 40 फीसदी अधिक शक्तिशाली हो गई है। उनका कहना है कि अल नीनो 1000 साल में कभी इतना ताकतवर नहीं दिखा।
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40 साल में 40 फीसदी ज्यादा शक्तिशाली हुआ अल नीनो
- फोटो : AI
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विस्तार
अल नीनो को लेकर एक अध्ययन में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। इस अध्ययन के मुताबिक, बीते 40 वर्षों में पूर्व-औद्योगिक युग की तुलना में करीब अल नीनो 40 फीसदी अधिक शक्तिशाली हो गई है। अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन के शोधकर्ताओं और अन्य वैज्ञानिकों ने प्रशांत महासागर में स्थित गैलापागोस द्वीपसमूह के आधुनिक और प्राचीन प्रवाल (कोरल) का अध्ययन किया है। गैलापागोस द्वीपसमूह दक्षिण अमेरिका में इक्वाडोर के तट से करीब 1,000 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
यह अध्ययन साइंस पत्रिका में प्रकाशित किया गया है। अध्ययन के निष्कर्ष से पता चलता है कि बीते चार दशकों में हुई अल नीनो की घटनाएं करीब 1850 से पहले के 1,000 वर्षों में हुई किसी भी घटना की तुलना में अधिक शक्तिशाली थीं। करीब 1850 के बाद इंसानों द्वारा ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के माध्यम से जलवायु को प्रभावित करने की शुरुआत की गई। यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन के पृथ्वी एवं पर्यावरण विज्ञान विभाग की प्रोफेसर एवं अध्यक्ष जूलिया कोल इस अध्ययन की मुख्य लेखक है। उनका कहना है कि हमने अतीत में कभी नहीं देखा कि जब अल नीनो आज जितना ताकतवर रहा हो। हमने यह भी पाया है कि अल नीनो की तीव्रता वैश्विक तापमान में वृद्धि के साथ-साथ बदलती है।
कोल ने आगे कहा कि हमारे निष्कर्ष से पता चलता है कि बीते 40 वर्षों में देखी गई बड़ी अल नीनो घटनाएं बीते 1,000 वर्षों के संदर्भ में सामान्य नहीं हैं। दुनिया के अधिकांश मौसम और जलवायु पर अल नीनो-दक्षिणी दोलन (ENSO) का प्रभाव पड़ता है, जो प्रशांत महासागर और वायुमंडल से जुड़ी एक बड़ी प्राकृतिक जलवायु घटना है। इसके गर्म चरण को अल नीनो कहा जाता है, जो समुद्र की सतह के तापमान को बढ़ाता है और दुनिया भर में चरम मौसमी घटनाओं को बढ़ाता है। इसके ठंडे चरण को ला नीना कहा जाता है। सामान्यतः एक अल नीनो का चक्र 2 से 7 वर्षों तक चल सकता है।
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दुनिया की मौसम और जलवायु एजेंसियों ने 2026-27 के अल नीनो का पूर्वानुमान जारी किया है, जिनमें इसके बहुत शक्तिशाली या लगभग रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचने की संभावना 90 फीसदी से ज्यादा बताई गई है। कोल का कहना है कि सवाल यह नहीं है कि अल नीनो होगा या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि यह कितना गंभीर होगा और इसके प्रभाव कितने विनाशकारी होंगे? अध्ययन की प्रमुख लेखिका ने आगे कहा कि यह घटना वैश्विक तापमान वृद्धि के ऊपर एक अतिरिक्त प्रभाव के तौर सामने आ रही है और इसकी संभावना है कि यह ग्रीनहाउस गैसों की वजह से होने वाली सामान्य तापमान वृद्धि को और तेज कर देगी। ऐसे में पूर्वानुमान हैं कि तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर की तुलना में 1.7 या 1.8 डिग्री सेल्सियस तक ज्यादा हो सकता है और यह वर्तमान रिकॉर्ड से काफी अधिक होगा।
शोधकर्ताओं ने गैलापागोस द्वीपसमूह से 13 मूंगा (कोरल) के नमूने लिए। इनमें जीवित मूंगा कॉलोनियां और प्राचीन मूंगा के बड़े टुकड़े शामिल थे। मूंगा हर वर्ष करीब 1 से 2 सेंटीमीटर की दर से बढ़ते हैं। वे कैल्शियम कार्बोनेट की परतों का निर्माण करते हैं और इन परतों की रासायनिक संरचना उस समुद्री जल के तापमान का रिकॉर्ड सुरक्षित रखती है जिसमें मूंगा का विकास हुआ था। अल नीनो की चरम घटनाएं कुछ वर्षों में होती हैं। इसलिए शोधकर्ताओं ने ऐसे मूंगा के नमूनों पर ध्यान केंद्रित किया जिनकी परतें कम से कम 20 वर्षों का रिकॉर्ड उपलब्ध कराती थीं।
वैज्ञानिकों ने मूंगा के लिए नमूनों की एक-एक मिलीमीटर के अंतराल पर जांच की और मूंगा के कंकाल की रासायनिक संरचना के दो पहलुओं का अध्ययन किया। वैज्ञानिकों ने स्ट्रॉन्शियम और कैल्शियम (Sr/Ca) के अनुपात और ऑक्सीजन आइसोटोप के अनुपात का विश्लेषण किया। इस तरह तापमान में होने वाले बदलावों का एक ऐतिहासिक रिकॉर्ड बनाया गया। गैलापागोस इस अध्ययन के लिए विशेष रूप से एक अहम जगह है, क्योंकि यहां अल नीनो का प्रभाव सबसे ज्यादा नजर आता है। शोधकर्ताओं को अध्ययन में पता चला कि बीते 40 से 50 वर्षों में अल नीनो की बहुत शक्तिशाली घटनाएं हुईं। इसके विपरीत, इससे पहले की अल नीनो घटनाओं में अपेक्षाकृत कम और करीब समान तीव्रता का पैटर्न देखे गए।
शोधकर्ताओं ने उन सभी जलवायु मॉडलों का भी विश्लेषण किया, जिनमें बीते 1,000 वर्षों की जलवायु परिस्थितियों का अनुकरण किया गया था। इनमें वैज्ञानिकों ने ज्वालामुखी विस्फोटों और सूर्य की गतिविधियों में होने वाले बदलावों के इतिहास को भी शामिल किया। मॉडलों में अल नीनो की तीव्रता में कोई ऐसा बड़ा बदलाव नहीं देखा गया, जिससे यह संकेत मिले कि सिर्फ प्राकृतिक प्रक्रियाएं ही वर्तमान समय में देखे जा रहे इतने बड़े बदलावों को पैदा कर सकती थीं।
कोल ने कहा कि वैश्विक तापमान में होने वाली वृद्धि अल नीनो को और शक्तिशाली बना रही है। अगर यह सही है, तो हम और ज्यादा शक्तिशाली जलवायु चरम घटनाओं को देख सकते हैं, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र, बुनियादी ढांचे और मानव जीवन का नुकसान बढ़ सकता है। उनका कहना है कि हमें जीवाश्म ईंधनों से दूर जाने की आवश्यकता है, क्योंकि यही समस्या की मूल वजह हैं।
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यह अध्ययन साइंस पत्रिका में प्रकाशित किया गया है। अध्ययन के निष्कर्ष से पता चलता है कि बीते चार दशकों में हुई अल नीनो की घटनाएं करीब 1850 से पहले के 1,000 वर्षों में हुई किसी भी घटना की तुलना में अधिक शक्तिशाली थीं। करीब 1850 के बाद इंसानों द्वारा ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के माध्यम से जलवायु को प्रभावित करने की शुरुआत की गई। यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन के पृथ्वी एवं पर्यावरण विज्ञान विभाग की प्रोफेसर एवं अध्यक्ष जूलिया कोल इस अध्ययन की मुख्य लेखक है। उनका कहना है कि हमने अतीत में कभी नहीं देखा कि जब अल नीनो आज जितना ताकतवर रहा हो। हमने यह भी पाया है कि अल नीनो की तीव्रता वैश्विक तापमान में वृद्धि के साथ-साथ बदलती है।
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कोल ने आगे कहा कि हमारे निष्कर्ष से पता चलता है कि बीते 40 वर्षों में देखी गई बड़ी अल नीनो घटनाएं बीते 1,000 वर्षों के संदर्भ में सामान्य नहीं हैं। दुनिया के अधिकांश मौसम और जलवायु पर अल नीनो-दक्षिणी दोलन (ENSO) का प्रभाव पड़ता है, जो प्रशांत महासागर और वायुमंडल से जुड़ी एक बड़ी प्राकृतिक जलवायु घटना है। इसके गर्म चरण को अल नीनो कहा जाता है, जो समुद्र की सतह के तापमान को बढ़ाता है और दुनिया भर में चरम मौसमी घटनाओं को बढ़ाता है। इसके ठंडे चरण को ला नीना कहा जाता है। सामान्यतः एक अल नीनो का चक्र 2 से 7 वर्षों तक चल सकता है।
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अल नीनो के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचने की संभावना 90 फीसदी से ज्यादा
दुनिया की मौसम और जलवायु एजेंसियों ने 2026-27 के अल नीनो का पूर्वानुमान जारी किया है, जिनमें इसके बहुत शक्तिशाली या लगभग रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचने की संभावना 90 फीसदी से ज्यादा बताई गई है। कोल का कहना है कि सवाल यह नहीं है कि अल नीनो होगा या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि यह कितना गंभीर होगा और इसके प्रभाव कितने विनाशकारी होंगे? अध्ययन की प्रमुख लेखिका ने आगे कहा कि यह घटना वैश्विक तापमान वृद्धि के ऊपर एक अतिरिक्त प्रभाव के तौर सामने आ रही है और इसकी संभावना है कि यह ग्रीनहाउस गैसों की वजह से होने वाली सामान्य तापमान वृद्धि को और तेज कर देगी। ऐसे में पूर्वानुमान हैं कि तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर की तुलना में 1.7 या 1.8 डिग्री सेल्सियस तक ज्यादा हो सकता है और यह वर्तमान रिकॉर्ड से काफी अधिक होगा।
शोधकर्ताओं ने गैलापागोस द्वीपसमूह से 13 मूंगा (कोरल) के नमूने लिए। इनमें जीवित मूंगा कॉलोनियां और प्राचीन मूंगा के बड़े टुकड़े शामिल थे। मूंगा हर वर्ष करीब 1 से 2 सेंटीमीटर की दर से बढ़ते हैं। वे कैल्शियम कार्बोनेट की परतों का निर्माण करते हैं और इन परतों की रासायनिक संरचना उस समुद्री जल के तापमान का रिकॉर्ड सुरक्षित रखती है जिसमें मूंगा का विकास हुआ था। अल नीनो की चरम घटनाएं कुछ वर्षों में होती हैं। इसलिए शोधकर्ताओं ने ऐसे मूंगा के नमूनों पर ध्यान केंद्रित किया जिनकी परतें कम से कम 20 वर्षों का रिकॉर्ड उपलब्ध कराती थीं।
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40 से 50 वर्षों में अल नीनो की बहुत शक्तिशाली घटनाएं हुईंवैज्ञानिकों ने मूंगा के लिए नमूनों की एक-एक मिलीमीटर के अंतराल पर जांच की और मूंगा के कंकाल की रासायनिक संरचना के दो पहलुओं का अध्ययन किया। वैज्ञानिकों ने स्ट्रॉन्शियम और कैल्शियम (Sr/Ca) के अनुपात और ऑक्सीजन आइसोटोप के अनुपात का विश्लेषण किया। इस तरह तापमान में होने वाले बदलावों का एक ऐतिहासिक रिकॉर्ड बनाया गया। गैलापागोस इस अध्ययन के लिए विशेष रूप से एक अहम जगह है, क्योंकि यहां अल नीनो का प्रभाव सबसे ज्यादा नजर आता है। शोधकर्ताओं को अध्ययन में पता चला कि बीते 40 से 50 वर्षों में अल नीनो की बहुत शक्तिशाली घटनाएं हुईं। इसके विपरीत, इससे पहले की अल नीनो घटनाओं में अपेक्षाकृत कम और करीब समान तीव्रता का पैटर्न देखे गए।
शोधकर्ताओं ने उन सभी जलवायु मॉडलों का भी विश्लेषण किया, जिनमें बीते 1,000 वर्षों की जलवायु परिस्थितियों का अनुकरण किया गया था। इनमें वैज्ञानिकों ने ज्वालामुखी विस्फोटों और सूर्य की गतिविधियों में होने वाले बदलावों के इतिहास को भी शामिल किया। मॉडलों में अल नीनो की तीव्रता में कोई ऐसा बड़ा बदलाव नहीं देखा गया, जिससे यह संकेत मिले कि सिर्फ प्राकृतिक प्रक्रियाएं ही वर्तमान समय में देखे जा रहे इतने बड़े बदलावों को पैदा कर सकती थीं।
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कोल का कहना है कि यह निष्कर्ष वैश्विक तापमान वृद्धि को कम करने की आवश्यकता को और मजबूत करते हैं। उनका कहना है कि अल नीनो जलवायु की चरम घटनाओं का एक बहुत बड़ा स्रोत है। इसलिए अगर इसकी तीव्रता बढ़ रही है, तो इसके प्रभाव भी ज्यादा गंभीर होंगे। सूखा, बाढ़, जंगलों में आग और खाद्य असुरक्षा जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती है।कोल ने कहा कि वैश्विक तापमान में होने वाली वृद्धि अल नीनो को और शक्तिशाली बना रही है। अगर यह सही है, तो हम और ज्यादा शक्तिशाली जलवायु चरम घटनाओं को देख सकते हैं, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र, बुनियादी ढांचे और मानव जीवन का नुकसान बढ़ सकता है। उनका कहना है कि हमें जीवाश्म ईंधनों से दूर जाने की आवश्यकता है, क्योंकि यही समस्या की मूल वजह हैं।