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Agra News: पांडवों ने कराया था जखदर महादेव मंदिर का जीर्णोद्धार
Sun, 13 Aug 2023 10:53 PM IST
आगरा ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, आगरा
संवाद न्यूज एजेंसी, आगरा
Updated Sun, 13 Aug 2023 10:53 PM IST
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मैनपुरी। जिले के गांव भांवत में स्थित जखदर महादेव का प्राचीन शिवमंदिर महाभारत काल से भी पूर्व का बताया जाता है। लोगों की मान्यता है कि इस मंदिर का जीर्णाेद्धार पांडवों ने कराया था। गांव भांवत में स्थित खेड़ा को भी लोग दुर्योधन द्वारा बनाया गया लाक्ष्या गृह मानते हैं। किवदंती है कि इस मंदिर का निर्माण लाखा बंजारे ने कराया था।
मंदिर की देखभाल करने वाले पुजारी उमाशंकर तिवारी बताते हैं कि ऐसा माना गया है कि गांव भांवत निवासी एक ठाकुर परिवार गाय पालता था। उनकी गाय घर पर दूध नहीं देती थी और जहां मंदिर बना है वहां पर आकर गाय के थनों से अपने आप दूध की धार निकलने लगती थी। लगभग पांच हजार से अधिक वर्ष पूर्व लाखा बंजारा द्वारा मंदिर का निर्माण कराया गया था। इस समय में मंदिर में शंकर जी की शिवलिंग के अतिरिक्त हनुमान जी, दुर्गा माता की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। गांव भांवत निवासी कल्लू तिवारी बताते हैं कि मंदिर का निर्माण लाखा बंजारे ने कराया था, जो गांव भारापुर के निवासी थे। लाखा बंजारे अपने एक लाख बैलों पर खाड़ (चीनी) लेकर जा रहे थे। मंदिर के पास शंकर जी एक बाबा के भेष में मिले। उन्होंने बंजारे से चीनी मांगी। बंजारे ने उन्हें चीनी न देने के लिए यह कहकर मना कर दिया कि इसमें नमक है। घर जाकर देखा तो चीनी की जगह सभी नमक ही निकला। यह देखकर परेशान बंजारा अपनी पत्नी सहित शंकर जी के स्थान पर आया और माफी मांगी तो नमक चीनी हो गया। इसके बाद उसने भव्य मंदिर का निर्माण कराऊंगा। तब से लगातार बराबर इस मंदिर से लोग जुड़ते गए।
ऐसा बताया जाता है कि महाभारत युद्ध से पूर्व पांडवों ने भी जखदर महादेव की पूजा की और मंदिर का पुन: जीर्णाेद्धार कराया। शंकर जी की शिवलिंग के लिए लोगों की आस्था है कि अगर कोई शर्त लगाकर अपनी भुजाओं में लेना चाहे तो शिवलिंग का आकर अपने आप बढ़ जाता है और मन से लेना चाहे तो आ जाता है। मंदिर पर दीपावली से शुरू होकर देवोत्थान एकादशी तक विशाल मेला लगाया जाता है।
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मंदिर पर वर्ष के प्रत्येक सोमवार को भक्त पूजा के लिए पहुंच रहे हैं। सावन के सोमवार को तो यहां बड़ी संख्या में भक्त पूजा के लिए पहुंचते हैं। मंदिर में पहुंचने वाले की हर कामना पूरी होती है।
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मंदिर की देखभाल करने वाले पुजारी उमाशंकर तिवारी बताते हैं कि ऐसा माना गया है कि गांव भांवत निवासी एक ठाकुर परिवार गाय पालता था। उनकी गाय घर पर दूध नहीं देती थी और जहां मंदिर बना है वहां पर आकर गाय के थनों से अपने आप दूध की धार निकलने लगती थी। लगभग पांच हजार से अधिक वर्ष पूर्व लाखा बंजारा द्वारा मंदिर का निर्माण कराया गया था। इस समय में मंदिर में शंकर जी की शिवलिंग के अतिरिक्त हनुमान जी, दुर्गा माता की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। गांव भांवत निवासी कल्लू तिवारी बताते हैं कि मंदिर का निर्माण लाखा बंजारे ने कराया था, जो गांव भारापुर के निवासी थे। लाखा बंजारे अपने एक लाख बैलों पर खाड़ (चीनी) लेकर जा रहे थे। मंदिर के पास शंकर जी एक बाबा के भेष में मिले। उन्होंने बंजारे से चीनी मांगी। बंजारे ने उन्हें चीनी न देने के लिए यह कहकर मना कर दिया कि इसमें नमक है। घर जाकर देखा तो चीनी की जगह सभी नमक ही निकला। यह देखकर परेशान बंजारा अपनी पत्नी सहित शंकर जी के स्थान पर आया और माफी मांगी तो नमक चीनी हो गया। इसके बाद उसने भव्य मंदिर का निर्माण कराऊंगा। तब से लगातार बराबर इस मंदिर से लोग जुड़ते गए।
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ऐसा बताया जाता है कि महाभारत युद्ध से पूर्व पांडवों ने भी जखदर महादेव की पूजा की और मंदिर का पुन: जीर्णाेद्धार कराया। शंकर जी की शिवलिंग के लिए लोगों की आस्था है कि अगर कोई शर्त लगाकर अपनी भुजाओं में लेना चाहे तो शिवलिंग का आकर अपने आप बढ़ जाता है और मन से लेना चाहे तो आ जाता है। मंदिर पर दीपावली से शुरू होकर देवोत्थान एकादशी तक विशाल मेला लगाया जाता है।
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मंदिर पर वर्ष के प्रत्येक सोमवार को भक्त पूजा के लिए पहुंच रहे हैं। सावन के सोमवार को तो यहां बड़ी संख्या में भक्त पूजा के लिए पहुंचते हैं। मंदिर में पहुंचने वाले की हर कामना पूरी होती है।