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कोरोना योद्धाओं को सलाम: दिन देखा न रात, जीत ली कोरोना से जंग, पढ़िए खास खबर
Thu, 25 Mar 2021 01:24 PM IST
Abhishek Saxena
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
Published by: Abhishek Saxena
Updated Thu, 25 Mar 2021 01:24 PM IST
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कोरोना के समय इलाज करने वाले चिकित्सक
- फोटो : अमर उजाला
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आगरा में कोरोना वायरस से जंग में चिकित्सक 'सैनिक' की भूमिका में दिखे। वार्ड ब्वॉय, नर्सिंग स्टाफ, सफाई कर्मचारी समेत डॉक्टरों ने दिन देखा न रात और आठ महीनों तक 12 से 16 घंटे तक कार्य करते रहे। अपने घर नहीं गए, क्वारंटीन सेंटर ही आशियाना बना लिया। परिजनों से वीडियो कॉल के जरिए ही कुशलक्षेम पूछ लेते। ऐसे कोरोना योद्धाओं के बलबूते ही वायरस से जंग जीत सके।
पांच महीने तक नहीं गए घर : डॉ. अंशुल पारीक
रैपिड रिस्पांस टीम के प्रभारी डॉ. अंशुल पारीक ने बताया कि जनवरी से होटलों में जाकर पर्यटकों की स्क्रीनिंग कर रहे थे। दो मार्च से शुरूआती पांच महीने तो घर ही नहीं गए। जैसे ही फोन पर संक्रमित मरीज की जानकारी मिलती, तत्काल एंबुलेंस लेकर दौड़ पड़ते। एक-एक दिन में 200 से 250 किमी तक यात्रा की।खाना-पीना और सोने को कोई समय नहीं था, लेकिन सुकून है कि ऐसी महामारी में मन से काम किया।
दूसरे शहरों में कोविड अस्पताल भी स्थापित कराए : डॉ. टीपी सिंह
एसएन मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभाग के डॉ. टीपी सिंह ने बताया कि कोविड अस्पताल बनने पर फिजिकल मेडिसिन कमेटी के सदस्य थे, दिन में दो बार कोरोना मरीजों का हाल जानने के लिए राउंड लेते। इलाज और नए प्रोटोकॉल तय करते। गेस्ट हाउस में ही ठिकाना था। संक्रमण बढ़ने पर शासन के निर्देश पर गाजियाबाद और ग्रेटर नोएडा में कोविड अस्पताल स्थापित कराया।
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पांच महीने तक नहीं गए घर : डॉ. अंशुल पारीक
रैपिड रिस्पांस टीम के प्रभारी डॉ. अंशुल पारीक ने बताया कि जनवरी से होटलों में जाकर पर्यटकों की स्क्रीनिंग कर रहे थे। दो मार्च से शुरूआती पांच महीने तो घर ही नहीं गए। जैसे ही फोन पर संक्रमित मरीज की जानकारी मिलती, तत्काल एंबुलेंस लेकर दौड़ पड़ते। एक-एक दिन में 200 से 250 किमी तक यात्रा की।खाना-पीना और सोने को कोई समय नहीं था, लेकिन सुकून है कि ऐसी महामारी में मन से काम किया।
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दूसरे शहरों में कोविड अस्पताल भी स्थापित कराए : डॉ. टीपी सिंह
एसएन मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभाग के डॉ. टीपी सिंह ने बताया कि कोविड अस्पताल बनने पर फिजिकल मेडिसिन कमेटी के सदस्य थे, दिन में दो बार कोरोना मरीजों का हाल जानने के लिए राउंड लेते। इलाज और नए प्रोटोकॉल तय करते। गेस्ट हाउस में ही ठिकाना था। संक्रमण बढ़ने पर शासन के निर्देश पर गाजियाबाद और ग्रेटर नोएडा में कोविड अस्पताल स्थापित कराया।
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कोरोना संक्रमण काल में इलाज करने वाले एसएन के चिकित्सक
- फोटो : अमर उजाला
आईसीयू में मरीजों की परिजनों की तरह की सेवा : नंदकिशोर मीणा
एसएन के कोविड आईसीयू में ऑपरेशन थिएटर टैक्नीशियन नंदकिशोर मीणा संक्रमित मरीजों के ऑपरेशन में साथ रहते थे। बताया कि आइसीयू में मरीजों की परिजनों की तरह सेवा की। मरीजों को अपने हाथों से खाना भी खिलाते थे। पिनाहट की इंद्रवती को अपने हाथों से खिलाया, जब वह डिस्चार्ज हुई तो उन्होंने कहा कि डॉक्टर समेत सभी ने बेटों की तरह देखभाल की। नंदकिशोर ने बताया कि जब भी मरीज को परेशानी होती पीपीई किट पहनकर तत्काल आइसीयू में जाते थे।
लॉकडाउन में भी कैंसर मरीजों का करते रहे इलाज : डॉ. सुरभि गुप्ता
एसएन मेडिकल कॉलेज के कैंसर रोग विभाग में लॉकडाउन में भी ओपीडी बंद नहीं हुई। यहां की डॉ. सुरभि गुप्ता ने बताया कि उस वक्त संक्रमण से हाहाकार मचा हुआ था। बीमार लोगों में संक्रमण का खतरा ज्यादा था, डर भी लगता था और मरीजों के कष्ट देख दुख भी होता था। इसी हौसले से मरीजों का इलाज करते रहे। करीब चार-पांच महीने तो बच्चों और परिजनों से भी सामाजिक दूरी बरती। लेकिन मन में तसल्ली है कि महामारी में मानवता के लिए काम किया।
आगरा में दरोगा की हत्या: घर में इकलौते बेटे थे प्रशांत यादव, पत्नी और मां का चीत्कार सुनकर पुलिसकर्मियों के निकले आंसू
महीनेभर के बच्चे को वीडियो कॉल से देख लेता था: डॉ. जीवी सिंह
एसएन के क्षय एवं वक्ष रोग के डॉ. जीवी सिंह मार्च से पांच महीने तक घर नहीं गए। जुलाई से सितंबर तक आइसोलेशन वार्ड में नाइट ड्यूटी की। दिन भी में भी मरीजों का फॉलोअप किया। दिन-रात थकान इतनी हावी हो जाती थी कि पूछो मत। कानपुर मेडिकल कॉलेज में भी संक्रमित मरीजों के इलाज को जाना पड़ा। एक महीने का शिशु था, उसको भी दुलार नहीं पा रहा था। वीडियो कॉल के जरिये ही उसे देखकर मन को खुशी मिलती। अब फिर से नाइट ड्यूटी संभाल रहा हूं।
एसएन के कोविड आईसीयू में ऑपरेशन थिएटर टैक्नीशियन नंदकिशोर मीणा संक्रमित मरीजों के ऑपरेशन में साथ रहते थे। बताया कि आइसीयू में मरीजों की परिजनों की तरह सेवा की। मरीजों को अपने हाथों से खाना भी खिलाते थे। पिनाहट की इंद्रवती को अपने हाथों से खिलाया, जब वह डिस्चार्ज हुई तो उन्होंने कहा कि डॉक्टर समेत सभी ने बेटों की तरह देखभाल की। नंदकिशोर ने बताया कि जब भी मरीज को परेशानी होती पीपीई किट पहनकर तत्काल आइसीयू में जाते थे।
लॉकडाउन में भी कैंसर मरीजों का करते रहे इलाज : डॉ. सुरभि गुप्ता
एसएन मेडिकल कॉलेज के कैंसर रोग विभाग में लॉकडाउन में भी ओपीडी बंद नहीं हुई। यहां की डॉ. सुरभि गुप्ता ने बताया कि उस वक्त संक्रमण से हाहाकार मचा हुआ था। बीमार लोगों में संक्रमण का खतरा ज्यादा था, डर भी लगता था और मरीजों के कष्ट देख दुख भी होता था। इसी हौसले से मरीजों का इलाज करते रहे। करीब चार-पांच महीने तो बच्चों और परिजनों से भी सामाजिक दूरी बरती। लेकिन मन में तसल्ली है कि महामारी में मानवता के लिए काम किया।
आगरा में दरोगा की हत्या: घर में इकलौते बेटे थे प्रशांत यादव, पत्नी और मां का चीत्कार सुनकर पुलिसकर्मियों के निकले आंसू
महीनेभर के बच्चे को वीडियो कॉल से देख लेता था: डॉ. जीवी सिंह
एसएन के क्षय एवं वक्ष रोग के डॉ. जीवी सिंह मार्च से पांच महीने तक घर नहीं गए। जुलाई से सितंबर तक आइसोलेशन वार्ड में नाइट ड्यूटी की। दिन भी में भी मरीजों का फॉलोअप किया। दिन-रात थकान इतनी हावी हो जाती थी कि पूछो मत। कानपुर मेडिकल कॉलेज में भी संक्रमित मरीजों के इलाज को जाना पड़ा। एक महीने का शिशु था, उसको भी दुलार नहीं पा रहा था। वीडियो कॉल के जरिये ही उसे देखकर मन को खुशी मिलती। अब फिर से नाइट ड्यूटी संभाल रहा हूं।
टेली-मेडिसिन बनी सहारा, घर बैठे 50 हजार को मिला इलाज
कोरोना महामारी ने मरीजों के लिए मुसीबत खड़ी कर दी। अस्पताल-क्लीनिक बंद थे। किसे दिखाएं, कैसे दवा पाएं संभव नहीं था। ऐसे में पहली बार टेलीमेडिसिन सुविधा शुरू हुई। लॉकडाउन के दौरान करीब 50 हजार मरीजों को घर बैठे इलाज मिला। एसएन, स्वास्थ्य विभाग और आईएमए ने नंबर जारी किए, जिस पर विभिन्न बीमारियों के विशेषज्ञों संबंधित परेशानी को सुनकर दवाएं बताते, फिर उनका फॉलोअप भी किया जाता। एसएन कॉलेज टेलीमेडिसिन प्रभारी डॉ. कामना सिंह ने बताया कि 16500 मरीजों का लाभ मिला। आईएमए की टेलीमेडिसिन में 4850 मरीज लाभान्वित हुए। स्वास्थ्य विभाग की टेलीमेडिसिन से 28650 मरीजों को फोन पर परामर्श देकर इलाज दिया।
आइसोलेशन वार्ड में गूंजी किलकारी, 104 का कराया प्रसव
लॉकडाउन और कोरोना वायरस से संक्रमित गर्भवती महिलाएं। ऐसी विकट परिस्थितियों में एसएन के आइसोलेशन वार्ड में लेबर रूम बना। एसएन कॉलेज की स्त्री रोग विभागाध्यक्ष डॉ. सरोज सिंह ने बताया कि यहां अप्रैल में पहली बार काजीपाड़ा की संक्रमित गर्भवती का प्रसव कराया। प्रदेश में संक्रमित गर्भवती के प्रसव का यह पहला अवसर था। अब तक संक्रमित 104 गर्भवती महिलाओं का प्रसव हुआ, जिसमें से 90 का ऑपरेशन करना पड़ा, 14 का सामान्य प्रसव हुआ।
कोरोना महामारी ने मरीजों के लिए मुसीबत खड़ी कर दी। अस्पताल-क्लीनिक बंद थे। किसे दिखाएं, कैसे दवा पाएं संभव नहीं था। ऐसे में पहली बार टेलीमेडिसिन सुविधा शुरू हुई। लॉकडाउन के दौरान करीब 50 हजार मरीजों को घर बैठे इलाज मिला। एसएन, स्वास्थ्य विभाग और आईएमए ने नंबर जारी किए, जिस पर विभिन्न बीमारियों के विशेषज्ञों संबंधित परेशानी को सुनकर दवाएं बताते, फिर उनका फॉलोअप भी किया जाता। एसएन कॉलेज टेलीमेडिसिन प्रभारी डॉ. कामना सिंह ने बताया कि 16500 मरीजों का लाभ मिला। आईएमए की टेलीमेडिसिन में 4850 मरीज लाभान्वित हुए। स्वास्थ्य विभाग की टेलीमेडिसिन से 28650 मरीजों को फोन पर परामर्श देकर इलाज दिया।
आइसोलेशन वार्ड में गूंजी किलकारी, 104 का कराया प्रसव
लॉकडाउन और कोरोना वायरस से संक्रमित गर्भवती महिलाएं। ऐसी विकट परिस्थितियों में एसएन के आइसोलेशन वार्ड में लेबर रूम बना। एसएन कॉलेज की स्त्री रोग विभागाध्यक्ष डॉ. सरोज सिंह ने बताया कि यहां अप्रैल में पहली बार काजीपाड़ा की संक्रमित गर्भवती का प्रसव कराया। प्रदेश में संक्रमित गर्भवती के प्रसव का यह पहला अवसर था। अब तक संक्रमित 104 गर्भवती महिलाओं का प्रसव हुआ, जिसमें से 90 का ऑपरेशन करना पड़ा, 14 का सामान्य प्रसव हुआ।