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सच्चे मन से मांगी हर मुराद करती हैं माता पूरी
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गांव पड़रिया स्थित माता काली का मंदिर
- फोटो : MAINPURI
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मैनपुरी। शहर के निकटवर्ती गांव पड़रिया स्थित प्राचीन काली देवी मंदिर का विशेष महत्व है। करीब 350 साल पुराने काली देवी के मंदिर के बारे में मान्यता है कि यहां श्रद्धाभाव के साथ मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है।
गांव पड़रिया का काली देवी मंदिर जिले के प्रमुख देवी मंदिरों में शामिल है। पुजारी अनिल बाबा के अनुसार करीब 350 साल पुराना मां काली देवी मंदिर के निर्माण के पीछे पुराना इतिहास है। उनके अनुसार गांव के श्रद्धालु बटेश्वर में यमुना स्नान और भगवान शिव की पूजा-अर्चना के लिए जाते थे। करीब 350 वर्ष पूर्व गांव के लोग बटेश्वर गए तो लौटते समय उनकी बैलगाड़ी किसी पत्थर की शिला से टकराकर रुक गई।
ग्रामीणों ने उतरकर देखा तो काली देवी की प्रतिमा थी। ग्रामीण प्रतिमा को बैलगाड़ी में रखकर गांव ले आए और गांव के बाहर प्रतिमा को विधिविधान के साथ स्थापित करा दिया। कुछ वर्षों के बाद ग्रामीणों ने धन एकत्रित कर मंदिर का निर्माण कराया और मंदिर पर नवरात्र के दौरान मेले का आयोजन शुरू हो गया। करीब सौ साल तक मेले का आयोजन होता रहा। उस दौरान जिले के ही नहीं पड़ोसी जिले के श्रदालु नवरात्र के दौरान पूजा अर्चना करने के लिए आते थे। बाद मे मेले का आयोजन बंद हो गया और मंदिर भी जर्जर हो गया। करीब 35 वर्ष पूर्व ग्रामीणों ने जीर्णशीर्ण हो चुके मंदिर का जीर्णोद्धार कराया।
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गांव पड़रिया का काली देवी मंदिर जिले के प्रमुख देवी मंदिरों में शामिल है। पुजारी अनिल बाबा के अनुसार करीब 350 साल पुराना मां काली देवी मंदिर के निर्माण के पीछे पुराना इतिहास है। उनके अनुसार गांव के श्रद्धालु बटेश्वर में यमुना स्नान और भगवान शिव की पूजा-अर्चना के लिए जाते थे। करीब 350 वर्ष पूर्व गांव के लोग बटेश्वर गए तो लौटते समय उनकी बैलगाड़ी किसी पत्थर की शिला से टकराकर रुक गई।
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ग्रामीणों ने उतरकर देखा तो काली देवी की प्रतिमा थी। ग्रामीण प्रतिमा को बैलगाड़ी में रखकर गांव ले आए और गांव के बाहर प्रतिमा को विधिविधान के साथ स्थापित करा दिया। कुछ वर्षों के बाद ग्रामीणों ने धन एकत्रित कर मंदिर का निर्माण कराया और मंदिर पर नवरात्र के दौरान मेले का आयोजन शुरू हो गया। करीब सौ साल तक मेले का आयोजन होता रहा। उस दौरान जिले के ही नहीं पड़ोसी जिले के श्रदालु नवरात्र के दौरान पूजा अर्चना करने के लिए आते थे। बाद मे मेले का आयोजन बंद हो गया और मंदिर भी जर्जर हो गया। करीब 35 वर्ष पूर्व ग्रामीणों ने जीर्णशीर्ण हो चुके मंदिर का जीर्णोद्धार कराया।
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