Mthura Holi 2023: ब्रज में बिखरेंगे टेसू के फूलों से बने रंग, जानें किस तरह हो रहे हैं तैयार
ब्रज की होली में टेसू के रंगों का विशिष्ट स्थान है। सबसे पहले टेसू के फूलों को पानी के साथ बड़े-बड़े ड्रमों में भिगोया जाता है। उसके बाद फूलों का रस निकाला जाता है।
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मथुरा के बरसाना यानि ब्रज की अनोखी लठामार होली, जिसमें कृष्णकालीन परंपरा की झलक दिखाई पड़ती है। होली में प्रयोग होने वाली हर वस्तु आज भी द्वापरकालीन दिखती है। आज भी लठामार होली में श्रीजी मंदिर पर नंदगांव के हुरियारों पर रसायन युक्त रंगों का प्रयोग नहीं किया जाता है। हुरियारों को रंग में सराबोर करने के लिए टेसू के फूलों से तैयार प्राकृतिक रंग बनाया जा रहा है।
लठामार होली की परंपरा बड़ी ही निराली है। हर चीज परंपरा के अनुसार होती है। बात हुरियारिनों की हो चाहे हुरियारों की, दोनों ही द्वापरकाल परंपरा के अनुसार ही चलते हैं। वहीं लट्ठ वहीं ढाल वही पारंपरिक कपड़े सभी कृष्णकालीन परंपरा को जीवंत करते दिखाई पड़ते हैं। लठामार होली के दौरान और इतना ही नहीं वही खड़ी ब्रज भाषा में हुरियारिनों पर अपनी मधुर वाणी से रसकों के पदों पर हुरियारे तीर छोड़ते हैं।
लठामार होली के दौरान होली खेलने में रंग और अबीर-गुलाल भी बरसता है। कही किसी हुरियारिन या हुरियारे को किसी प्रकार की परेशानी न हो इसके लिए भी बरसाना लाडली जी मंदिर के सेवायतों द्वारा विशेष प्रकार का रंग तैयार किया जा रहा है। जिसके लिए टेसू के 10 क्विंटल फूलों का प्रयोग किया जाता है। इसको तैयार करने में 10 दिन लग जाते हैं।
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ऐसे बनता है टेसू ईको फ्रेंडली रंग
सबसे पहले टेसू के फूलों को पानी के साथ बड़े-बड़े ड्रमों में भिगोया जाता है। उसके बाद फूलों का रस निकाला जाता है। निकले रस में चूने को मिलाकर वापस ड्रमों में भर दिया जाता है। इस प्रकार तैयार किया जाता है टेसू ईको फ्रेंडली रंग, फिर खेली जाती है विश्व प्रसिद्ध लठामार होली।
श्रीजी मंदिर बरसाना के सेवायत संजय गोस्वामी ने बताया कि आजकल के जो रंग बाजार में मिलते हैं वो मिलावटी होते हैं। किसी भी हुरियारे-हुरियारिन व श्रद्धालुओं को त्वचा संबधित परेशानी हो सकती है, लेकिन टेसू के फूलों से तैयार ईको फ्रेंडली रंग से त्वचा को किसी प्रकार की हानि नहीं पहुंचती, साथ ही इसकी खुशबू से मन में ताजगी बनी रहती है और होली का वातावरण महकने लग जाता है। दिल्ली से टेसू के 10 क्विंटल फूल मंगाए गए हैं।