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लॉकडाउन झुग्गियों में कैद जिंदगी: न मजदूरी और न राशन, बच्चों को क्या खिलाएंगे!
Tue, 24 Mar 2020 11:11 AM IST
Abhishek Saxena
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
Published by: Abhishek Saxena
Updated Tue, 24 Mar 2020 11:11 AM IST
सार
दो दिन से करीब 500 परिवार झुग्गियों में ही बंद हैं।
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आगरा में लॉकडाउन
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
शहर की झुग्गी बस्तियों में रहने वालों के सामने खानपान का संकट पैदा हो गया है। बिजलीघर पर रामलीला मैदान के पास 150 से ज्यादा परिवार रहते हैं। एक हफ्ते से इन्हें कोई काम नहीं मिला है। पानी का इंतजाम नहीं है, ऐसे में बार-बार हाथ धोना दूर की बात है। दो दिन से करीब 500 परिवार झुग्गियों में ही बंद हैं।
शहर में रामलीला मैदान, अबू उलाह दरगाह रोड, आवास विकास कॉलोनी रोड, सिकंदरा रोड, शाहगंज अलबतिया रोड समेत 15 से ज्यादा स्थानों पर 500 से ज्यादा परिवार झुग्गियों में बसर करते हैं। इनमें रहने वाले ज्यादातर लोग मजदूरी करने वाले हैं।
कोई रिक्शा चलाता है तो कोई मूर्तियां बनाता है। इन लोगों ने देवी की मूर्तियां बनाई हैं, लेकिन अभी तक खरीदार नहीं आए हैं। इन्हें नवरात्र के त्योहार से
उम्मीद थी। अब गर्मी करीब है तो सुराही और मटके भी बना रहे हैं, ताकि इन्हें बेचकर पालन-पोषण हो सके।
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शहर में रामलीला मैदान, अबू उलाह दरगाह रोड, आवास विकास कॉलोनी रोड, सिकंदरा रोड, शाहगंज अलबतिया रोड समेत 15 से ज्यादा स्थानों पर 500 से ज्यादा परिवार झुग्गियों में बसर करते हैं। इनमें रहने वाले ज्यादातर लोग मजदूरी करने वाले हैं।
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कोई रिक्शा चलाता है तो कोई मूर्तियां बनाता है। इन लोगों ने देवी की मूर्तियां बनाई हैं, लेकिन अभी तक खरीदार नहीं आए हैं। इन्हें नवरात्र के त्योहार से
उम्मीद थी। अब गर्मी करीब है तो सुराही और मटके भी बना रहे हैं, ताकि इन्हें बेचकर पालन-पोषण हो सके।
रामलीला मैदान के पास की झुग्गियों में रहने वाले परिवारों के पास भी मजदूरी नहीं है। यहां रहने वाले विलास ने बताया कि एक हफ्ते से मजदूरी नहीं मिली है। सुन्नन का रिक्शा भी खड़ा है, सवारी नहीं मिल रही है।
मालती झाड़ू बेचती है, लेकिन कोई खरीदार ही नहीं है। सभी परेशान हैं। ज्यादा राशन नहीं था, अब एक-दो दिन बाद आटा भी खत्म हो जाएगा तब क्या करेंगे? बच्चों को क्या खिलाएंगे? यहां ज्यादातर लोगों को यही चिंता है। उनका कहना है कि पहले तो उदारमना लोग खानपान का सामान भी बांट जाते थे, लेकिन अब तो वह भी नहीं आ रहे हैं।
मालती झाड़ू बेचती है, लेकिन कोई खरीदार ही नहीं है। सभी परेशान हैं। ज्यादा राशन नहीं था, अब एक-दो दिन बाद आटा भी खत्म हो जाएगा तब क्या करेंगे? बच्चों को क्या खिलाएंगे? यहां ज्यादातर लोगों को यही चिंता है। उनका कहना है कि पहले तो उदारमना लोग खानपान का सामान भी बांट जाते थे, लेकिन अब तो वह भी नहीं आ रहे हैं।
पानी ही नहीं, बार-बार हाथ कैसे धुलवाएं
यहां पानी भी दूर से भरकर लाते हैं। बार-बार हाथ कहां से धुलाएंगे। बच्चे भी परेशान हैं। खानपान का सामान भी नहीं मिल रहा है। मजदूरी भी मिलना बंद हो गई है। -मनोज, रामलीला मैदान, झुग्गी बस्ती
कहां से दूरी बनाकर रह लें
बच्चों को कहां छुपा लें, झुग्गियों में इतनी जगह नहीं है कि अंदर सुलाएं। हमें तो सड़क पर ही जीवन काटना है। मरना होगा तो मर जाएंगे। -नीलम, रामलीला मैदान, झुग्गी बस्ती
यहां पानी भी दूर से भरकर लाते हैं। बार-बार हाथ कहां से धुलाएंगे। बच्चे भी परेशान हैं। खानपान का सामान भी नहीं मिल रहा है। मजदूरी भी मिलना बंद हो गई है। -मनोज, रामलीला मैदान, झुग्गी बस्ती
कहां से दूरी बनाकर रह लें
बच्चों को कहां छुपा लें, झुग्गियों में इतनी जगह नहीं है कि अंदर सुलाएं। हमें तो सड़क पर ही जीवन काटना है। मरना होगा तो मर जाएंगे। -नीलम, रामलीला मैदान, झुग्गी बस्ती