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लॉकडाउन में सड़कों पर गुजर गया मजदूर दिवस, 'कोरोना काल' में श्रमिकों की दर्दभरी कहानी

Sat, 02 May 2020 12:19 AM IST
मुकेश कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा Published by: मुकेश कुमार Updated Sat, 02 May 2020 12:19 AM IST
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Labour Day 2020 painful story of workers in lockdown
जयपुर से बिहार जाने के लिए निकले मजदूर - फोटो : अमर उजाला
मेहनतकश मजदूर नहीं जानते हक-हुकूक की बातें, ये जानते हैं सिर्फ भूख की बातें। जब पेट की अंतड़ियां सूखती हैं तो क्रांति के नारे नहीं, रोटी के निवाले याद आते हैं। 'कोरोना काल' में कई दुश्वारियों के साथ इनका मजदूर दिवस सड़कों पर गुजर गया। लॉकडाउन में आगरा-जयपुर हाईवे से होते हुए घर जा रहे पप्पू को याद नहीं कि मजदूर दिवस कब है। उसे बस घर जाना है। उसके साथी गुड्डू के ये मार्मिक शब्द, ‘मजदूर एक कचरा है, और कुछ नहीं’ कलेजे को भेद देते हैं। 
Labour Day 2020 painful story of workers in lockdown
जयपुर से बिहार जाने के लिए निकले मजदूर - फोटो : अमर उजाला
दिन शुक्रवार, शाम छह बजे का वक्त था। आगरा-जयपुर हाईवे से साइकिल पर मास्क लगाए मजदूरों की टोली गुजर रही थी। पसीने में भीगे मेहनतकश छांव में थोड़ी देर बैठ गए। एक साथी की साइकिल का टायर पंक्चर हो गया। उसे भी जोड़ना है। इनमें से तीन-चार ने कर्ज लेकर नई साइकिल खरीदी है। सभी 28 अप्रैल को जयपुर से बिहार जाने के लिए निकले हैं। जिसका फासला करीब 1100 किमी है। 
Labour Day 2020 painful story of workers in lockdown
बिहार के रहने वाले श्रमिक - फोटो : अमर उजाला
अवधेश और पप्पू यादव कहते हैं कि जयपुर में ढलाई फैक्ट्री में काम करते थे। लॉकडाउन में रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया। इसलिए निराश होकर हम लोग साइकिल से ही घर जाने के लिए निकल पड़े। बोले, क्या करते, डेढ़ महीने से बैठकर खा रहे थे। पैसे खत्म हो गए। 
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Labour Day 2020 painful story of workers in lockdown
बिहार के रहने वाले श्रमिक - फोटो : अमर उजाला
इन श्रमिकों ने बताया कि सरकार द्वारा भेजे गए हजार रुपये किसी को मिले, किसी को नहीं। भूख से मरने से अच्छा, अपने गांव चले जाएं। रास्ते में संस्थाओं ने खाना खिलाया। सीमा पर पुलिस वालों ने दूसरा रास्ता बता दिया। वहां से भटकते हुए यहां पहुंचे हैं। गांव वालों ने खाना खिलाया और मास्क भी दिए।
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Labour Day 2020 painful story of workers in lockdown
बिहार के रहने वाले श्रमिक - फोटो : अमर उजाला
श्रमिक पप्पू ने बताया कि दिन में 50-60 किमी चलते हैं। फुटपाथ पर तीन-चार घंटे सोते हैं। पीने को गर्म पानी मिलता है। पैरों में छाले पड़ गए। पैर दर्द करता है पर हम हिम्मत नहीं हारेंगे। हमें अपने घर जाना है।
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