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ग्यारह साल बाद वृंदावन में हो रहा कुंभ का आयोजन
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वृंदावन (मथुरा)। इस बार हरिद्वार के साथ वृंदावन कुंभ ग्यारह साल बाद हो रहा है। महंत फूलडोल बिहारी महाराज ने इसे लेकर प्रपत्र जारी किया है, जिसमें कुंभ की बदली समय अवधि को गृह नक्षत्र की चाल का कारण बताया है।
जारी प्रपत्र में महंत ने कहा है कि ज्योतिष, पुराणों, वैज्ञानिक, आध्यात्म शास्त्रों के आधार पर समुद्र मंथन से कलश प्राप्ति के बाद अमृत प्राप्ति को देवासुर संग्राम हुआ था। असुरों से अमृत कलश की रक्षा के लिए भागते समय इंद्र पुत्र जयंत ने उस अमृत कलश को लेकर 12 स्थानों पर स्थापित किया। इसमें 8 देवलोक में व चार मृत्युलोक में स्थित हैं। मृत्युलोक में पड़ने वाले चारों स्थानों के कुंभ में आठ कुंभ 11 वर्ष के अंतराल पर ही होंगे।
महंत का कहना है कि 12 राशियों में 1 सौर वर्ष में 365 दिन, 6 घंटा, 9 मिनट, 34 सेकंड भ्रमण का समय लगता है। बृहस्पति अपनी गति के अनुसार, 361 दिन, एक घंटा 20 मिनट 34 सेकंड में पूरा करता है। इस प्रकार सौरवर्ष और बृहस्पति के संवत्सर में 4 दिन, 4 घंटा 46 मिनट, 40 सेकंड का अंतर होता है। प्रत्येक 12 वर्ष सौरवर्ष और बृहस्पति से सेवकों में 50 दिन 9 घंटा 46 मिनट का अंतर पड़ेगा। अत: बृहस्पति सूर्य से 40 अंश, 11 कला, 28 विकला आगे रहेगा। इस प्रकार बढ़ते-बढ़ते यह अंतर सवा 16 दिन कम 86 वें वर्ष के अंत में बृहस्पति सूर्य से एक-एक राशि आगे देखा जाएगा। 1021 वर्ष 162 दिनों के बाद जब यह अंतर 12 राशि व 360 अंश हो जाएगा तब बृहस्पति और सूर्य सौर वर्षांत में पुन: पूर्व अवस्था में आएगा। इन्हीं नक्षत्रों के उतार-चढ़ाव का कारण है इस वर्ष 11 साल बाद ही कुंभ का पर्व पड़ रहा है।
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जारी प्रपत्र में महंत ने कहा है कि ज्योतिष, पुराणों, वैज्ञानिक, आध्यात्म शास्त्रों के आधार पर समुद्र मंथन से कलश प्राप्ति के बाद अमृत प्राप्ति को देवासुर संग्राम हुआ था। असुरों से अमृत कलश की रक्षा के लिए भागते समय इंद्र पुत्र जयंत ने उस अमृत कलश को लेकर 12 स्थानों पर स्थापित किया। इसमें 8 देवलोक में व चार मृत्युलोक में स्थित हैं। मृत्युलोक में पड़ने वाले चारों स्थानों के कुंभ में आठ कुंभ 11 वर्ष के अंतराल पर ही होंगे।
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महंत का कहना है कि 12 राशियों में 1 सौर वर्ष में 365 दिन, 6 घंटा, 9 मिनट, 34 सेकंड भ्रमण का समय लगता है। बृहस्पति अपनी गति के अनुसार, 361 दिन, एक घंटा 20 मिनट 34 सेकंड में पूरा करता है। इस प्रकार सौरवर्ष और बृहस्पति के संवत्सर में 4 दिन, 4 घंटा 46 मिनट, 40 सेकंड का अंतर होता है। प्रत्येक 12 वर्ष सौरवर्ष और बृहस्पति से सेवकों में 50 दिन 9 घंटा 46 मिनट का अंतर पड़ेगा। अत: बृहस्पति सूर्य से 40 अंश, 11 कला, 28 विकला आगे रहेगा। इस प्रकार बढ़ते-बढ़ते यह अंतर सवा 16 दिन कम 86 वें वर्ष के अंत में बृहस्पति सूर्य से एक-एक राशि आगे देखा जाएगा। 1021 वर्ष 162 दिनों के बाद जब यह अंतर 12 राशि व 360 अंश हो जाएगा तब बृहस्पति और सूर्य सौर वर्षांत में पुन: पूर्व अवस्था में आएगा। इन्हीं नक्षत्रों के उतार-चढ़ाव का कारण है इस वर्ष 11 साल बाद ही कुंभ का पर्व पड़ रहा है।
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