{"_id":"62e80fd4d7fb2919117aacfb","slug":"karimganj-became-a-village-from-rupayan-mainpuri-news-agr542113042","type":"story","status":"publish","title_hn":"करीमगंज के टीले में छिपा है सैकड़ों साल पुराना इतिहास","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
करीमगंज के टीले में छिपा है सैकड़ों साल पुराना इतिहास
विज्ञापन
मैनपुरी। करीमगंज स्थित टीले का इतिहास सैकड़ों साल पुराना है। यहां मूर्ति तो कभी पत्थर मिलते रहे हैं। रोजाना ग्रामीण यहां प्राचीन पत्थर ढूंढने पहुंच रहे हैं। सोमवार को भी ग्रामीणों को तीन प्राचीन पत्थर मिले हैं, ये किसके पास हैं ये कोई नहीं बता सका।
मैनपुरी से कुरावली रोड पर दस किलोमीटर की दूरी पर बसे करीमगंज का 12वीं सदी में अस्तित्व में आया था। तब इसे रूपायन नाम से जाना जाता था और ये व्यापार का केंद्र था। अनाज और सब्जियों का व्यापार यहां से होता था। रूपायन इलाहाबाद से मथुरा जाने वाले कच्चे मार्ग पर स्थित होने के चलते प्रसिद्ध था। यहां किला भी हुआ करता था, जिस पर कई बार आक्रमण हुआ। सन 1280 में एटा के नवाब करीम खान ने कर्मचारी अमोल और घनश्याम की इच्छा पर किले को ध्वस्त कर उन्हें यहां बसा दिया। आज भी किले के अवशेष मौजूद हैं। किले के ऊपर करीम खान की मजार बनी हुई है। यहां हिंदू और मुस्लिम दोनों पूजा के लिए आते हैं। उन्हीं के नाम पर गांव का नाम रूपायन से बदलकर करीमगंज हो गया।
विदेशी शोधार्थियों ने जाना इतिहास
करीमगंज के इतिहास पर अब तक चार किताबें लिखी जा चुकी हैं। ये चारों अमेरिका से आए शोधार्थियों और प्रोफेसर ने लिखी हैं। गांव निवासी उमेश चंद्र पांडेय बताते हैं कि वर्ष 1925 में समाजशास्त्री विलियम वाइजर और उनकी पत्नी शार्लोट वाइजर करीमगंज आए। उन्होंने गांव में पांच साल रहकर हिंदू जिजमानी सिस्टम और इंडिया नामक किताब लिखी। पति की मृत्यु के पांच साल बाद शार्लोट वाइजर ने फोर फैमिलीज ऑफ करीमगंज लिखी। इसकी कहानी करीमगंज के रहने वाले चार अलग-अलग जातियों के परिवारों के तुलनात्मक जीवन पर आधारित थी। इन किताबों को पढ़ने के बाद न्यूयॉर्क स्थित साइरेकस यूनिवर्सिटी में एंथ्रोपोलोजी की प्रोफेसर सुसेन एस वाडले 1965 में करीमगंज आईं। उन्होंने बिहाइंड द मड वॉल्स और स्ट्रगलिंग विद डेस्टिनी इन करीमपुर पुस्तकें लिखीं। सुसेन एस वाडले अब भी यहां आती हैं।
विज्ञापन
शोधार्थियों ने इसलिए चुना करीमगंज
70 वर्षीय उमेश चंद्र पांडेय बताते हैं कि तत्कालीन कलेक्टर से शोधार्थियों ने भारतीय वर्ण व्यवस्था और जिजमानी प्रथा पर अध्ययन के लिए राय मांगी थी। उन्होंने औंछा, ललूपुर और करीमगंज का सुझाव दिया। करीमगंज में 17 जातियों के लोग रहते थे, इसलिए शोधार्थियों ने इसे ही बेहतर ठिकाना समझा। उमेश के घर शोधार्थी लंबे समय तक रहे। इससे उन्हें यह जानकारी है।
----
ये लिखी गईं किताबें
-जिजमानी सिस्टम ऑफ इंडिया
-बिहाइंड द मड वॉल्स
- स्ट्रगलिंग विद डेस्टिनी इन करीमपुर
-फोर फैमिलीज ऑफ करीमगंज
विज्ञापन
मैनपुरी से कुरावली रोड पर दस किलोमीटर की दूरी पर बसे करीमगंज का 12वीं सदी में अस्तित्व में आया था। तब इसे रूपायन नाम से जाना जाता था और ये व्यापार का केंद्र था। अनाज और सब्जियों का व्यापार यहां से होता था। रूपायन इलाहाबाद से मथुरा जाने वाले कच्चे मार्ग पर स्थित होने के चलते प्रसिद्ध था। यहां किला भी हुआ करता था, जिस पर कई बार आक्रमण हुआ। सन 1280 में एटा के नवाब करीम खान ने कर्मचारी अमोल और घनश्याम की इच्छा पर किले को ध्वस्त कर उन्हें यहां बसा दिया। आज भी किले के अवशेष मौजूद हैं। किले के ऊपर करीम खान की मजार बनी हुई है। यहां हिंदू और मुस्लिम दोनों पूजा के लिए आते हैं। उन्हीं के नाम पर गांव का नाम रूपायन से बदलकर करीमगंज हो गया।
विज्ञापन
विदेशी शोधार्थियों ने जाना इतिहास
करीमगंज के इतिहास पर अब तक चार किताबें लिखी जा चुकी हैं। ये चारों अमेरिका से आए शोधार्थियों और प्रोफेसर ने लिखी हैं। गांव निवासी उमेश चंद्र पांडेय बताते हैं कि वर्ष 1925 में समाजशास्त्री विलियम वाइजर और उनकी पत्नी शार्लोट वाइजर करीमगंज आए। उन्होंने गांव में पांच साल रहकर हिंदू जिजमानी सिस्टम और इंडिया नामक किताब लिखी। पति की मृत्यु के पांच साल बाद शार्लोट वाइजर ने फोर फैमिलीज ऑफ करीमगंज लिखी। इसकी कहानी करीमगंज के रहने वाले चार अलग-अलग जातियों के परिवारों के तुलनात्मक जीवन पर आधारित थी। इन किताबों को पढ़ने के बाद न्यूयॉर्क स्थित साइरेकस यूनिवर्सिटी में एंथ्रोपोलोजी की प्रोफेसर सुसेन एस वाडले 1965 में करीमगंज आईं। उन्होंने बिहाइंड द मड वॉल्स और स्ट्रगलिंग विद डेस्टिनी इन करीमपुर पुस्तकें लिखीं। सुसेन एस वाडले अब भी यहां आती हैं।
विज्ञापन
शोधार्थियों ने इसलिए चुना करीमगंज
70 वर्षीय उमेश चंद्र पांडेय बताते हैं कि तत्कालीन कलेक्टर से शोधार्थियों ने भारतीय वर्ण व्यवस्था और जिजमानी प्रथा पर अध्ययन के लिए राय मांगी थी। उन्होंने औंछा, ललूपुर और करीमगंज का सुझाव दिया। करीमगंज में 17 जातियों के लोग रहते थे, इसलिए शोधार्थियों ने इसे ही बेहतर ठिकाना समझा। उमेश के घर शोधार्थी लंबे समय तक रहे। इससे उन्हें यह जानकारी है।
----
ये लिखी गईं किताबें
-जिजमानी सिस्टम ऑफ इंडिया
-बिहाइंड द मड वॉल्स
- स्ट्रगलिंग विद डेस्टिनी इन करीमपुर
-फोर फैमिलीज ऑफ करीमगंज