रखें ध्यान: खर्राटे लेते हैं तो गाड़ी चलाते समये आ सकती है झपकी, कम नींद लेने वालों को भी 'खतरा'
न्यूरोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया के 70वें अधिवेशन में विशेषज्ञ चिकित्सकों ने कहा कि नींद पूरी कर ही गाड़ी चलाने के प्रति जागरूक करने के लिए एक अभियान चलाने की जरूरत है। सरकार कदम उठाती है तो सोसाइटी भी सहयोग देने के लिए तैयार है।
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गाड़ी चलाते समय झपकी आने से दुर्घटनाएं बढ़ी हैं। ऐसी दुर्घटनाओं में मौत का आंकड़ा भी अधिक है। नशे में गाड़ी नहीं चलाने के प्रति तो जागरूक किया जाता है लेकिन नींद पूरी कर गाड़ी चलाने के लिए भी जागरूक किया जाना चाहिए। खर्राटे लेने वाले लोगों में गाड़ी चलाते वक्त झपकी लगने की आशंका अधिक रहती है। सात घंटे से कम नींद लेने वालों में भी झपकी लगने की आशंका अधिक होती है। 100 किलोमीटर की रफ्तार से गाड़ी पांच सेकेंड में ही 100 मीटर तक की दूरी तय कर लेती है। झपकी आने की स्थिति में चालक प्रतिक्रिया ही नहीं दे पाता। यह चर्चा न्यूरोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया के 70वें अधिवेशन के समापन पर रविवार को आगरा के जेपी होटल में हुई।
न्यूरोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष पद का प्रभार सौंपने से पहले डॉ. वरिंदर पाल सिंह ने कहा कि जिंदगी कीमती है, इसे दुर्घटना से बचाना जरूरी है। नशे पर तो अब तक बहुत बात हो चुकी है पर नींद पर कम चर्चा हुई है। गाड़ी चलाते समय झपकी आना नशे में गाड़ी चलाने से भी अधिक खतरनाक है। नींद पूरी कर ही गाड़ी चलाने के प्रति जागरूक करने के लिए एक अभियान चलाने की जरूरत है। सरकार कदम उठाती है तो सोसाइटी भी सहयोग देने के लिए तैयार है।
विशेषज्ञों ने कहा कि झपकी आने के मामले में चालक में गलत विश्वास दुर्घटनाओं की वजह बनता है। सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के मुताबिक एक महीने में 25 में से एक वयस्क (18 या इससे अधिक आयु का) गाड़ी चलाते समय सो जाने की सूचना देता है। अधिकांश कोई सूचना देते ही नहीं। खर्राटे लेने वाले लोगों को गाड़ी चलाते वक्त झपकी लगने की आशंका अधिक रहती है। सात घंटे से कम नींद लेने वालों में भी झपकी की आशंका अधिक होती है। वर्ष 2017 में 91,000 दुर्घटनाओं में झपकी आना ही कारण था, जिनमें 50,000 को चोटें आई थीं और 800 मौतें हुई थीं। वर्ष 2020 की पुलिस रिपोर्टों के आधार पर 633 मौतें हुईं। चिकित्सकों की माने तो संख्याओं को कम आंका गया है।
71वां अधिवेशन भुवनेश्वर में होगा
आयोजन सचिव डॉ. अरविंद कुमार अग्रवाल के मुताबिक अधिवेशन के अंतिम दिन 82 से अधिक शोधपत्र सभी सत्रों व कार्यशालाओं में प्रस्तुत किए गए। स्मृति चिह्न दिए गए। न्यूरोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष पद की कमान डॉ. वरिंदर पाल सिंह ने जबलपुर के डॉ. वाईआर यादव को सौंपी। सचिव डॉ. केश्रीधर के साथ ही आयोजन अध्यक्ष डॉ. आरसी मिश्रा और आयोजन सचिव डॉ. अरविंद यादव भी मंच पर उपस्थित रहे। घोषणा की गई कि अगला अधिवेशन वर्ष 2023 में भुवनेश्वर में होगा।
आयोजन अध्यक्ष और वरिष्ठ न्यूरो सर्जन डॉ. आरसी मिश्रा ने कहा कि वर्ष 2007 के बाद आगरा में यह न्यूरोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया को दूसरा सबसे बड़ा अधिवेशन है। आयोजन की सफलता से इस बात की पूरी संभावना है कि आगे भी आगरा को इस आयोजन की मेजबानी का अवसर मिलता रहेगा।