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Holi 2023: कंस के पुतले को पीटकर करते अधमरा, फिर होता है होलिका दहन, 150 सालों से चल रही है परंपरा

Mon, 06 Mar 2023 02:22 PM IST
धीरेन्द्र सिंह अमर उजाला ब्यूरो, आगरा
अमर उजाला ब्यूरो, आगरा Published by: धीरेन्द्र सिंह Updated Mon, 06 Mar 2023 02:22 PM IST
सार

 कंस कहता है मैं नहीं मरूंगा, युवक कहते हैं, मरेगा कैसे नहीं। इसी पुकार के साथ पहले कंस गेट से उसका सिर नीचे फेंकते हैं। उसके बाद धड़ फेंका जाता है। 

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Holi 2023 beating effigy of Kansa then Holika Dahan in agra
कंस का पुतला - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

आगरा के गोकुलपुरा में 150 साल से अधिक समय से होली की एक परंपरा आज भी कायम है। बुजुर्गों की इस परंपरा को अब युवाओं ने संभाल लिया है। होली खेलने के बाद लगने वाले मेले में कंस के पुतले को पीट-पीट कर अधमरा कर दिया जाता है। उसके बाद कृष्ण-बल्देव के स्वरूप उसका वध कर दहन कर देते हैं।
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गोकुलपुरा में प्राचीन कंस गेट है। कहा जाता है कि यहां कभी कंस की जेल थी, यह उसी का गेट है। क्षेत्र में 150 साल पहले नागर समाज के लोगों ने होली पर कंस को पीट-पीट कर मारने की परंपरा शुरू की थी। अब क्षेत्रीय युवा यह आयोजन प्रति वर्ष करा रहे हैं। होली खेलने के बाद क्षेत्रीय नागरिक एकत्र होते हैं। पहले मंसा देवी मंदिर से शोभायात्रा नागर समाज के लोग निकालते थे।
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अब गौड़ मंदिर, नागरी प्रचारिणी के समीप से इसकी शुरुआत होती है। शोभायात्रा में कृष्ण-बल्देव व उनके साथ ग्वाल-बाल के स्वरूप होते हैं। यह शोभायात्रा कंस गेट पर पहुंचती है। वहां कुछ युवक कंस के पुतले को लेकर कंस गेट पर चढ़ जाते हैं। उसे ऊपर ही पीटना शुरू कर देते हैं। कंस कहता है मैं नहीं मरूंगा, युवक कहते हैं, मरेगा कैसे नहीं। इसी पुकार के साथ पहले कंस गेट से उसका सिर नीचे फेंकते हैं। उसके बाद धड़ फेंका जाता है। उसके धड़ को नीचे खड़े युवक जमकर पीटते हैं। तत्पश्चात जयघोषों के साथ कृष्ण और बल्देव के स्वरूप इस पुतले का वध करते हैं। फिर उसका दहन कर दिया जाता है।
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उत्साह बरकरार

पूर्व पार्षद सुनील वर्मा का कहना है कि क्षेत्रीय नागरिकों में अभी भी उत्साह बरकरार है और इस परंपरा को वे कायम किए हुए हैं। अनूप उप्रेती ने बताया कि कंस के पुतले का चेहरा वे स्वयं बनाते हैं और सभी लोग मिलकर धड़ बनाते हैं। इस मेले से एकजुटता प्रदर्शित होती है। मेले में धीरेंद्र गौड़, राकेश गौड़, भुवनेश गौड़ आदि का सहयोग रहता है।
 

लंबे समय से देखते आ रहे

इतिहासकार राजकिशोर राजे ने बताया कि यह एक पुरानी परंपरा है। लोग पहले इन शोभायात्राओं में डंडे खेलते, फाग गाते और गुलाल उड़ाते चलते थे, लेकिन अब यह सीमित हो गई हैं। इसके बावजूद क्षेत्रीय नागरिकों में उत्साह बरकरार है। हम कई पीढ़ी से गोकुलपुरावासी हैं। इस पंरपरा को मैं और मेरे बुजुर्ग लंबे समय से देखते आ रहे हैं।
प्रस्तुति-आदर्श नंदन गुप्ता
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