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रवायतः ताशा बजाकर करते हैं रोजेदारों को आगाह, 30 साल से चल रहा ये सिलसिला

Mon, 27 Mar 2023 02:46 PM IST
धीरेन्द्र सिंह अमर उजाला ब्यूरो, आगरा
अमर उजाला ब्यूरो, आगरा Published by: धीरेन्द्र सिंह Updated Mon, 27 Mar 2023 02:46 PM IST
सार

सुई कटरा के हशमत अली आज भी रमजान में इस रवायत को निभाने के लिए आधी रात के बाद अपने घर से निकलते हैं। रमजान में एक नेक काम का 70 गुना सबाब मिलता है। 
 

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Hashmat comes out early to wake up the fasting people For 30 years in Ramzan
हशमत अली - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

आगरा में मुकद्दस रमजान में सहरी की सदियों पुरानी रवायत को सुई कटरा के हशमत अली पिछले 30 साल से निभा रहे हैं। रमजान के पहले रोजे से ही वह हाथ में ताशा लेकर तड़के तीन बजे घर से निकल पड़ते हैं। ताशा बजाकर एलान करते हैं कि सहरी का वक्त हो गया है, रोजेदार उठकर सहरी कर लें।
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रमजान में बरसों पुरानी रवायत (परंपराओं) को आज तक लोग निभा रहे हैं। भारतीय मुस्लिम विकास परिषद के अध्यक्ष समी आगाई बताते हैं कि मुगलकाल से ही सहरी में रोजेदारों को जगाने की रवायत चल रही है। पहले लोगों के पास घड़ियां आदि बहुत कम होती थीं। रोजेदारों को सहरी के वक्त का पता ही नहीं चल पाता था। सुबह जब जागते तब तक सहरी का वक्त निकल जाता था। इसे देखते हुए मोहल्लों में जागरूक लोगों ने सहरी से पहले उठकर लोगों को आवाज लगाने की परंपरा शुरू की। यह परंपरा वक्त के साथ कम होती चली गई।
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उन्होंने बताया कि सुई कटरा के हशमत अली आज भी रमजान में इस रवायत को निभाने के लिए आधी रात के बाद अपने घर से निकलते हैं। रमजान में एक नेक काम का 70 गुना सबाब मिलता है। आने वाली पीढ़ी यह समझे या नहीं, अब हर घर में सभी सुविधाएं हैं। लेकिन जो रवायत हैं, उन्हें निभाना हमारा फर्ज है।
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शाही जामा मस्जिद पर रोशन होता है बल्ब

सर्वदलीय मुस्लिम एक्शन कमेटी के अध्यक्ष सैयद इरफान सलीम का कहना है कि शाही जामा मस्जिद पर रमजान का चांद होते ही पहले लालटेन जलाई जाती थी। वक्त के साथ स्वरूप बदला, अब मस्जिद के गुंबद पर एक बल्ब रोशन किया जाता है। यह बल्ब केवल रमजान के दिनों में ही रोशन होता है। इससे रोजेदार समझ लेते थे कि रमजान का चांद हो चुका है। यह बल्ब आज भी जलाया जाता है।
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