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UP: जहां खुद हनुमान जी बनते हैं यजमान, 53 वर्षों से अनवरत जारी है भक्ति का प्रवाह; क्रम नहीं टूटा
Thu, 02 Apr 2026 10:40 AM IST
आगरा ब्यूरो
अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
Published by: आगरा ब्यूरो
Updated Thu, 02 Apr 2026 10:40 AM IST
सार
आगरा में लंगड़े की चौकी हनुमान मंदिर 500 साल पुराना है। यह मंदिर मुगलकालीन है, जो कभी शहर से दूर था। अब यह घनी बस्ती में शामिल हो गया है। यहां हनुमान जी का दिव्य विग्रह संगमरमर के सिंहासन पर विराजमान हैं। जिनके दर्शन मात्र से सारे कष्ट दूर हो जाते हैं।
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लंगड़े की चौकी हनुमान मंदिर
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
विस्तार
प्राचीन हनुमान मंदिर, लंगड़े की चौकी पर भक्ति की एक ऐसी मिसाल कायम है, जो शायद ही कहीं और देखने को मिले। यहां पिछले 53 वर्षों से श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें यजमान की भूमिका में कोई मनुष्य नहीं, बल्कि स्वयं हनुमानजी महाराज विराजमान होते हैं। उन्हीं के निमित्त यह आयोजन किया जाता है, जिसके लिए अलग से मुहूर्त निकालने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
मंदिर महंत गोविंद उपाध्याय ने बताया कि कथा का शुभारंभ प्रतिवर्ष रामनवमी को होता है और विश्राम हनुमान जयंती के दो दिन बाद। इस परंपरा की शुरुआत उनके पिता मुख्य महंत डोरीदास उपाध्याय ने बद्रीनाथ धाम निवासी आचार्य प्रियधर शास्त्री के साथ मिलकर की थी। 25 वर्षों तक आचार्य प्रियधर शास्त्री ने कथा का वाचन किया और उनके गोलोकवासी होने के बाद अब उनके पुत्र हिमांशु धर शास्त्री इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
आयोजन की विशेषता यह है कि यहां कथा के दौरान किसी भी प्रकार का शोर-शराबा या नृत्य नहीं होता। भक्ति का यह प्रवाह इतना अटूट है कि कोरोना काल जैसी भीषण आपदा के समय भी नियमों का पालन करते हुए प्रतीकात्मक रूप से कथा की गई थी।
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प्रस्तुति-आदर्श नंदन गुप्ता, वरिष्ठ पत्रकार
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मंदिर महंत गोविंद उपाध्याय ने बताया कि कथा का शुभारंभ प्रतिवर्ष रामनवमी को होता है और विश्राम हनुमान जयंती के दो दिन बाद। इस परंपरा की शुरुआत उनके पिता मुख्य महंत डोरीदास उपाध्याय ने बद्रीनाथ धाम निवासी आचार्य प्रियधर शास्त्री के साथ मिलकर की थी। 25 वर्षों तक आचार्य प्रियधर शास्त्री ने कथा का वाचन किया और उनके गोलोकवासी होने के बाद अब उनके पुत्र हिमांशु धर शास्त्री इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
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आयोजन की विशेषता यह है कि यहां कथा के दौरान किसी भी प्रकार का शोर-शराबा या नृत्य नहीं होता। भक्ति का यह प्रवाह इतना अटूट है कि कोरोना काल जैसी भीषण आपदा के समय भी नियमों का पालन करते हुए प्रतीकात्मक रूप से कथा की गई थी।
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प्रस्तुति-आदर्श नंदन गुप्ता, वरिष्ठ पत्रकार