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लॉकडॉउन में छूटी इंजीनियर की नौकरी तो शुरू कर दी मल्चिंग विधि से खेती
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कासगंज के गांव महावर में जैविक खाद के लिए मुर्गी पालन करते डोरी लाल
- फोटो : KASGANJ
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कहते हैं कि यदि कुछ करने का जज्बा हो तो कोई भी बाधा आड़े नहीं आती। बात चाहें नौकरी की हो या खेतीवाड़ी की। जज्बा मुकाम तक पहुंचा ही देता है। इसी तरह का जज्बा दिखाई दे रहा है महावर के किसान डोरी लाल में। लॉकडाउन में निजी कंपनी से सिविल इंजीनियर की नौकरी छूटने के बाद बेरोजगारी मिली तो उनके दिमाग में नायाब तरीका सूझा। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण को ध्यान देते हुए मल्चिंग विधि को अपनाते हुए व जैविक खाद के प्रयोग खेती करना शुरू कर दिया।
कासगंज क्षेत्र के गांव महावर के रहने वाले किसान डोरीलाल ने इंटरमीडिएट कृषि शिक्षा से की है।
उसके बाद सिविल इंजीनियर का डिप्लोमा किया। दो साल पहले नोएडा की एक निजी कंपनी में उन्हें सिविल इंजीनियर के पद पर नौकरी मिली। पिछले साल मार्च महीने में जब लॉकडाउन लगा तो कंपनी बंद हो गई और वे बेरोजगार हो गए। उसके बाद अपने गांव महावर वापस लौट आए। फिर उन्होंने आर्थिक उन्नति के लिए खेतीका सहारा लेने का जज्बा पैदा किया। कृषि शिक्षा के दौरान जैविक खाद से खेती करने और खाद बनाने की जो विधियां सीखी थीं उन्हें अपनाने की योजना तैयार की और फिर सफलता की ओर कदम आगे बढ़ा दिए। जैविक खाद के लिए गोबर, मूत्र, मछली एवं मुर्गी के मलमूत्र की जरूरत होती है। इसलिए उन्होंने गो, मछली और मुर्गी पालन शुरू किया। लगभग 6 महीने पहले से वे जैविक खाद तैयार करने का चक्र बना चुके थे और अब खाद तैयार करने के बाद जैविक विधि से खेतीवाड़ी में जुट गए हैं। उन्होंने खेती के लिए मल्चिंग विधि को अपनाया है। वे इस विधि से हरी मिर्च, शिमला मिर्च आदि फसल तैयार कर रहे हैं। इस विधि के माध्यम से न केवल पानी की बचत होती है बल्कि पौधे की जड़ का अच्छा विकास होता है और मिट्टी भी सख्त नहीं होती और पर्याप्त नमी रहती है। पैदावार भी सामान्य फसल की अपेक्षा अधिक होती है।
केंचुआ की यूनिट बनाने की भी तैयारी
केंचुए को किसान मित्र कहा जाता है। जैविक खाद के साथ साथ खेती के लिए केंचुए की भी बेहद जरूरत मानी गई है। ऐसे में किसान डोरी लाल अब जैविक खाद का चक्र तैयार करने के साथ ही केंचुए यूनिट लगाने की भी तैयारी कर चुके हैं। इसके लिए उन्होंने कृषि विभाग के विशेषज्ञों का सहारा भी लिया है।
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इस तरह तैयार करते हैं जैविक खाद
एक निर्धारित लंबाई चौड़ाई का मिट्टी का बैड धरातल से लगभग 7 फुट ऊंचा तैयार करते हैं। इसमें गाय का गोबर, मूत्र एवं सीमित मात्रा मुर्गी का मलमूत्र डालते हैं। फिर उसमें कृषि विज्ञान केंद्र व अन्य संस्था से केंचुए मंगाकर डाल देते हैं। फिर लगभग दो महीने तक इंतजार करते हैं। उसके बाद जैविक खाद तैयार हो जाता है। इसके अलावा मछलियों के तालाब का जो गंदा पानी होता है उसे सीधे पानी के रास्ते खेतों तक पहुंचा दिया जाता है।
आंकड़े की नजर से-
- 120 बीघा खेती है किसान डोरी लाल पर।
- 25 बीघा खेती में की है जैविक खाद से खेती की शुरूआत।
किसान की बात-
- लॉकडाउन में कंपनी बंद होने के बाद घर आ गए थे। फिर यहां मन बनाया कि क्यूं न अपनी कृषि शिक्षा का फायदा लिया जाए और फिर कृषि विभाग के सहयोग से जैविक खाद की विधि का चक्र तैयार किया। हालांकि अनलॉक में नौकरी का फिर ऑफर आया, लेकिन अब जैविक खेती का ही उद्देश्य बना लिया है। - डोरीलाल, किसान।
वर्जन-
- किसान डोरीलाल अन्य किसानों के लिए प्रेरणास्रोत हैं। यह ऐसे पहले किसान सामने आए हैं। जिन्होंने जैविक खेती के लिए विधिवत चक्र बनाया है। कृषि विभाग उन्हें प्रोत्साहित कर रहा है। समय-समय पर उनके खेतों पर पहुंचकर निरीक्षण भी करते हैं। - सुमित चौहान, जिला कृषि अधिकारी।
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कासगंज क्षेत्र के गांव महावर के रहने वाले किसान डोरीलाल ने इंटरमीडिएट कृषि शिक्षा से की है।
उसके बाद सिविल इंजीनियर का डिप्लोमा किया। दो साल पहले नोएडा की एक निजी कंपनी में उन्हें सिविल इंजीनियर के पद पर नौकरी मिली। पिछले साल मार्च महीने में जब लॉकडाउन लगा तो कंपनी बंद हो गई और वे बेरोजगार हो गए। उसके बाद अपने गांव महावर वापस लौट आए। फिर उन्होंने आर्थिक उन्नति के लिए खेतीका सहारा लेने का जज्बा पैदा किया। कृषि शिक्षा के दौरान जैविक खाद से खेती करने और खाद बनाने की जो विधियां सीखी थीं उन्हें अपनाने की योजना तैयार की और फिर सफलता की ओर कदम आगे बढ़ा दिए। जैविक खाद के लिए गोबर, मूत्र, मछली एवं मुर्गी के मलमूत्र की जरूरत होती है। इसलिए उन्होंने गो, मछली और मुर्गी पालन शुरू किया। लगभग 6 महीने पहले से वे जैविक खाद तैयार करने का चक्र बना चुके थे और अब खाद तैयार करने के बाद जैविक विधि से खेतीवाड़ी में जुट गए हैं। उन्होंने खेती के लिए मल्चिंग विधि को अपनाया है। वे इस विधि से हरी मिर्च, शिमला मिर्च आदि फसल तैयार कर रहे हैं। इस विधि के माध्यम से न केवल पानी की बचत होती है बल्कि पौधे की जड़ का अच्छा विकास होता है और मिट्टी भी सख्त नहीं होती और पर्याप्त नमी रहती है। पैदावार भी सामान्य फसल की अपेक्षा अधिक होती है।
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केंचुआ की यूनिट बनाने की भी तैयारी
केंचुए को किसान मित्र कहा जाता है। जैविक खाद के साथ साथ खेती के लिए केंचुए की भी बेहद जरूरत मानी गई है। ऐसे में किसान डोरी लाल अब जैविक खाद का चक्र तैयार करने के साथ ही केंचुए यूनिट लगाने की भी तैयारी कर चुके हैं। इसके लिए उन्होंने कृषि विभाग के विशेषज्ञों का सहारा भी लिया है।
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इस तरह तैयार करते हैं जैविक खाद
एक निर्धारित लंबाई चौड़ाई का मिट्टी का बैड धरातल से लगभग 7 फुट ऊंचा तैयार करते हैं। इसमें गाय का गोबर, मूत्र एवं सीमित मात्रा मुर्गी का मलमूत्र डालते हैं। फिर उसमें कृषि विज्ञान केंद्र व अन्य संस्था से केंचुए मंगाकर डाल देते हैं। फिर लगभग दो महीने तक इंतजार करते हैं। उसके बाद जैविक खाद तैयार हो जाता है। इसके अलावा मछलियों के तालाब का जो गंदा पानी होता है उसे सीधे पानी के रास्ते खेतों तक पहुंचा दिया जाता है।
आंकड़े की नजर से-
- 120 बीघा खेती है किसान डोरी लाल पर।
- 25 बीघा खेती में की है जैविक खाद से खेती की शुरूआत।
किसान की बात-
- लॉकडाउन में कंपनी बंद होने के बाद घर आ गए थे। फिर यहां मन बनाया कि क्यूं न अपनी कृषि शिक्षा का फायदा लिया जाए और फिर कृषि विभाग के सहयोग से जैविक खाद की विधि का चक्र तैयार किया। हालांकि अनलॉक में नौकरी का फिर ऑफर आया, लेकिन अब जैविक खेती का ही उद्देश्य बना लिया है। - डोरीलाल, किसान।
वर्जन-
- किसान डोरीलाल अन्य किसानों के लिए प्रेरणास्रोत हैं। यह ऐसे पहले किसान सामने आए हैं। जिन्होंने जैविक खेती के लिए विधिवत चक्र बनाया है। कृषि विभाग उन्हें प्रोत्साहित कर रहा है। समय-समय पर उनके खेतों पर पहुंचकर निरीक्षण भी करते हैं। - सुमित चौहान, जिला कृषि अधिकारी।

कासगंज फोटो किसान डोरीलाल- फोटो : KASGANJ

कासगंज के गांव में मल्चिंग विधि और जैविक खाद से तैयार की जा रही मिर्च की फसल- फोटो : KASGANJ

कासगंज के गांव में मल्चिंग विधि और जैविक खाद से तैयार की जा रही मिर्च की फसल- फोटो : KASGANJ