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Agra News: ईयरफोन-शोरगुल से सूख रहीं नसें, ऊंचा सुन रहे लोग
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एसएन में कार्यशाला
आगरा। ईयरफोन लगाकर ज्यादा समय बिताने, शोरगुल में रहने वालों के कान जवाब दे रहे हैं। इससे कान की सुनने के सेल प्रभावित हो रहे हैं, जिससे ऊंचा सुनाई दे रहा है। कानों में झनझनाहट और दर्द की परेशानी भी होने लगी है। करीब 65 फीसदी लोगों को ऐसी दिक्कतें हैं। एसएन मेडिकल कॉलेज के ईएनटी रोग विभाग की ओर से आयोजित कार्यशाला में चिकित्सकों ने इस पर चिंता जताई।
मुख्य वक्ता पद्मश्री डॉ. जेएम हंस ने कहा कि कान में सुनने के सेल होते हैं जो आवाज को विद्युत में बदलकर मस्तिष्क तक पहुंचाते हैं, जिससे सुनाई देता है। घंटों ईयरफोन इस्तेमाल करने और शोरगुल में रहने से ये सेल प्रभावित होते हैं। कान की नसों में सूजन आने के साथ रक्त संचार प्रभावित होने लगता है। लंबे समय तक ऐसी स्थिति से सुनाई कम देना, दर्द रहना, कान में झनझनाहट, ऊंचा सुनने की परेशानी बन रही है।
ऐसे 65 फीसदी लोगों में अधिकांश बच्चे और युवा हैं। उन्होंने कहा कि अब तक वह 3500 बच्चों में कॉक्लियर इम्प्लांट कर आवाज ला चुके हैं। डॉ. राजीव पचौरी ने कहा कि बच्चों की अधिकतम 5 साल तक की आयु में सर्जरी होने पर यह ज्यादा सफल है। कार्यशाला का शुभारंभ प्राचार्य डॉ. प्रशांत गुप्ता ने किया।
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विभागाध्यक्ष डॉ. रितु गुप्ता ने कहा कि 60-70 डेसीबल से अधिक शोर होना कानों के लिए नुकसानदेह है। कार्यशाला में डॉ. धर्मेंद्र कुमार, डॉ. अखिल प्रताप सिंह, डॉ. एलके गुप्ता, डॉ. राकेश गुप्ता, डॉ. विशाल चौहान, डॉ. वीपी गुप्ता, डॉ. सलोनी सिंह और डॉ. सौमिता नीरज आदि की मौजूदगी रही।
इन बातों का रखें ख्याल
- ईयरफोन का इस्तेमाल जरूरी होने पर ही करें।
- कार्यक्षेत्र पर ध्वनि प्रदूषण से बचाव के साधन हों।
- फोन की रिंगटोन, टीवी की आवाज सीमित रखें।
- शोरगुल वाले स्थानों पर कार्य करते वक्त ईयर प्लग लगाएं।
- लाउडस्पीकर, वाहनों के तीव्र हॉर्न को रोका जाए।
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मुख्य वक्ता पद्मश्री डॉ. जेएम हंस ने कहा कि कान में सुनने के सेल होते हैं जो आवाज को विद्युत में बदलकर मस्तिष्क तक पहुंचाते हैं, जिससे सुनाई देता है। घंटों ईयरफोन इस्तेमाल करने और शोरगुल में रहने से ये सेल प्रभावित होते हैं। कान की नसों में सूजन आने के साथ रक्त संचार प्रभावित होने लगता है। लंबे समय तक ऐसी स्थिति से सुनाई कम देना, दर्द रहना, कान में झनझनाहट, ऊंचा सुनने की परेशानी बन रही है।
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ऐसे 65 फीसदी लोगों में अधिकांश बच्चे और युवा हैं। उन्होंने कहा कि अब तक वह 3500 बच्चों में कॉक्लियर इम्प्लांट कर आवाज ला चुके हैं। डॉ. राजीव पचौरी ने कहा कि बच्चों की अधिकतम 5 साल तक की आयु में सर्जरी होने पर यह ज्यादा सफल है। कार्यशाला का शुभारंभ प्राचार्य डॉ. प्रशांत गुप्ता ने किया।
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विभागाध्यक्ष डॉ. रितु गुप्ता ने कहा कि 60-70 डेसीबल से अधिक शोर होना कानों के लिए नुकसानदेह है। कार्यशाला में डॉ. धर्मेंद्र कुमार, डॉ. अखिल प्रताप सिंह, डॉ. एलके गुप्ता, डॉ. राकेश गुप्ता, डॉ. विशाल चौहान, डॉ. वीपी गुप्ता, डॉ. सलोनी सिंह और डॉ. सौमिता नीरज आदि की मौजूदगी रही।
इन बातों का रखें ख्याल
- ईयरफोन का इस्तेमाल जरूरी होने पर ही करें।
- कार्यक्षेत्र पर ध्वनि प्रदूषण से बचाव के साधन हों।
- फोन की रिंगटोन, टीवी की आवाज सीमित रखें।
- शोरगुल वाले स्थानों पर कार्य करते वक्त ईयर प्लग लगाएं।
- लाउडस्पीकर, वाहनों के तीव्र हॉर्न को रोका जाए।