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डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्याल स्थापना दिवस: छात्रों के घर पर ही पहुंचती थीं अंकतालिकाएं व डिग्री

Sun, 27 Jun 2021 03:17 PM IST
Abhishek Saxena न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा Published by: Abhishek Saxena Updated Sun, 27 Jun 2021 03:17 PM IST
सार

विश्वविद्यालय से पढ़कर शिक्षाविद् के रूप में पहचान बनाने वाले कुछ लोगों ने अमर उजाला के साथ अपने पढ़ाई के दिनों के अनुभव साझा किए। बताया कि उनकी पढ़ाई के दौरान विश्वविद्यालय की अलग पहचान थी।

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डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय (पूर्ववर्ती आगरा कॉलेज) एक जुलाई को 95 वर्ष का हो जाएगा। समारोह में विश्वविद्यालय के गौरवशाली इतिहास पर भी प्रकाश डाला जाएगा। इस उपलक्ष्य में विश्वविद्यालय से पढ़कर शिक्षाविद् के रूप में पहचान बनाने वाले कुछ लोगों ने अमर उजाला के साथ अपने पढ़ाई के दिनों के अनुभव साझा किए। बताया कि उनकी पढ़ाई के दौरान विश्वविद्यालय की अलग पहचान थी। समय पर प्रवेश व परीक्षा होती थी और परिणाम मिल जाता था। छात्रों के घर अंकतालिकाएं और डिग्री पहुंच जाती थी। उन्हें विश्वविद्यालय के चक्कर लगाने की जरूरत भी नहीं पड़ती थी। 

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उस समय नकल नाम की चीज नहीं थी: डॉ. केएस
नालंदा विश्वविद्यालय पटना, मोनाद विश्वविद्यालय, गाजियाबाद व कुमाऊं विश्वविद्यालय, नैनीताल के कुलपति रहे और वर्तमान में रेजीडेंशियल यूनिवर्सिटी, अल्मोड़ा के कुलपति प्रो. केएस राना ने बताया कि उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से संबद्ध आगरा कॉलेज व आरबीएस कॉलेज से पढ़ाई की। बीएससी, दो विषयों में एमएससी व पीएचडी यहां से किया। उस समय नकल नाम की चीज नहीं थी। विद्यार्थी अपनी मेहनत से डिवीजन लाते थे। घर पर अंकतालिका व डिग्री मिल जाती थी। इसके लिए विश्वविद्यालय नहीं जाना होता था। 
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निर्धारित समय पर प्रवेश मिल जाता था: डॉ. जीसी 
आगरा विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. जीसी सक्सेना का कहना है कि उन्हें इस बात पर गर्व है कि वह आगरा विश्वविद्यालय के छात्र, शिक्षक और बाद में कुलपति रहे। वर्ष 1954 से 60 तक आगरा कॉलेज में शिक्षा ग्रहण की। इसके बाद आरबीएस कॉलेज में शिक्षक बने। वर्ष 2001 से 2004 तक विश्वविद्यालय के कुलपति रहे। उनका कहना है कि इस विश्वविद्यालय की पहचान थी कि समय पर प्रवेश, परीक्षा और परिणाम मिल जाते थे। जुलाई से कक्षाएं लगनी शुरू हो जाती थी। अपने कुलपति के कार्यकाल तक इस व्यवस्था को बनाए रखने की कोशिश की।

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डॉ. जीसी सक्सेना और डॉ. विनोद माहेश्वरी, बाएं से दाएं क्रमश: - फोटो : अमर उजाला

परीक्षा का परिणाम 11 दिन में घोषित हो गया: डॉ. विनोद 
आगरा कॉलेज के पूर्व प्राचार्य डॉ. विनोद माहेश्वरी ने बताया कि वह वर्ष 1979 में आगरा विश्वविद्यालय में एमए पूर्वार्द्ध के अंग्र्रेजी के छात्र थे, उस समय कुलपति प्रो. एसएन मेहरोत्रा थे। उन्होंने विश्वविद्यालय के इतिहास में पहली बार केंद्रीय मूल्यांकन की व्यवस्था शुरू कराई। आलोचनाओं व शंकाओं के बीच यह योजना सफल रही। हमारा परीक्षा परिणाम महज 11 दिन में घोषित हो गया। तब से केंद्रीय मूल्यांकन विश्वविद्यालय का अभिन्न अंग बन गया। इस विवि का छात्र रहना और फिर इससे संबद्ध कॉलेज के प्राचार्य के रूप में इससे जुड़ना गर्व की बात रही। 

प्रत्येक महाविद्यालय में होता था दीक्षांत समारोह: डॉ. मीरा 
श्रीमती बीडी जैन गर्ल्स पीजी कॉलेज की प्राचार्या डॉ. मीरा अग्रवाल ने बताया कि उन्होंने अपनी शिक्षा वर्ष 1985 में आगरा विश्वविद्यालय से पूर्ण की। शोध कार्य भी विश्वविद्यालय से किया। समय पर परीक्षा होती थी और परिणाम मिल जाता था। प्रत्येक महाविद्यालय में दीक्षांत समारोह होता था। कुलाधिपति की ओर से प्रमाणपत्र और डिग्रियां मिल जाती थीं। हमने बीए, एमए की अंकतालिका व डिग्री के लिए कभी विश्वविद्यालय का रुख नहीं किया। सब घर पर उपलब्ध हो गई। 

विश्वविद्यालय को बेहतर बनाने के लिए ये सुझाव दिए 
. छात्र हित को सर्वोपरि रखकर करना होगा काम।
. प्रवेश, परीक्षा और परिणाम निश्चित समय पर होना चाहिए। 
. छात्रों को डिग्री व अंकपत्र मिलने में परेशानी नहीं होनी चाहिए।
. परीक्षाएं पारदर्शिता के साथ होनी चाहिए, नकल पर अंकुश जरूरी। 
. पूर्व छात्रों और पूर्व कुलपतियों से संवाद किया जा सकता है। 
. ऑनलाइन व्यवस्था को मजबूत बनाया जाए, छात्रों को विवि न जाना पड़े।
. नैक की ग्रेडिंग बढ़ाने की दिशा में प्रयास करना चाहिए। 
. पूर्व छात्रों को विश्वविद्यालय से जोड़ा जाना चाहिए। 

साधेर आयोग ने विश्वविद्यालय खोलने की संस्तुति की थी 
विश्वविद्यालय के अधिष्ठाता छात्र कल्याण प्रो. ब्रजेश रावत ने बताया कि मुंशी नारायण प्रसाद अस्थाना, डॉ. एलपी माथुर, लाला दीवान चंद्र, राय बहादुर आनंद स्वरूप, डॉ. ब्रजेंद्र स्वरूप, प्रो. गोकुल चंद्रा और विश्वविद्यालय के कुलपति रहे रेवरेंड ए. डब्ल्यू डेनिस ने ब्रिटिश सरकार के सहयोग से एक साधेर आयोग की स्थापना कराई। जिसने इस क्षेत्र में एक नया विश्वविद्यालय खोलने की संस्तुति की। वर्ष 1926 में प्रांतीय विधायिका की ओर से आगरा में बिल के रूप में एक विश्वविद्यालय शुरू करने का प्रस्ताव पास किया। जिस पर तत्कालीन गवर्नर की ओर से 20 अक्तूबर 1926 को हस्ताक्षर कर दिए गए। एक जुलाई 1927 को आगरा विश्वविद्यालय अस्तित्व में आ गया। 

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