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नवरात्र के चौथे दिन हुई माता कूष्मांडा की पूजा अर्चना
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फोटो-27 व 28
नवरात्र के चौथे दिन हुई माता कूष्मांडा की पूजा
-शीतला देवी मंदिर पर रहे मेले जैसे हालात
अमर उजाला ब्यूरो
मैनपुरी। जिले भर में नवरात्र के चौथे दिन माता कूष्मांडा की पूजा-अर्चना की गई। इस दौरान भक्तों में माता के चतुर्थ स्वरूप की पूजा के लिए हर तरफ उत्साह दिखाई दिया।
बुधवार को सुबह से ही सृष्टि का विस्तार करने वाली माता कूष्मांडा की पूजा-अर्चना के लिए भक्तों का माता के मंदिरों में पहुंचना शुरू हो गया था। भक्तों ने माता के मंदिरों में पहुंचकर आराधना कर माता कूष्मांडा की आरती उतारी। इस दौरान भजन कीर्तन का भी दौर जारी रहा। मंदिरों में सुबह से ही भीड़ रही। व्रतधारी भक्तों ने माता के मंदिरों में पहुंचकर घंटों तक संकीर्तन किया। नगर के प्रसिद्ध शीतला देवी और काली माता मंदिर में आयोजित होने वाली महा आरती में भक्तों ने भाग लिया। इसके अतिरिक्त भोगांव, कुरावली, बेवर, करहल, किशनी, कुसमरा आदि स्थानों पर भी आयोजित माता मंदिरों में माता कूष्मांडा की पूजा अर्चना की गई।
पीले वस्त्र धारण कर करें स्कंदमाता की पूजा
नवरात्र के पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा होती है। मां के इस स्वरूप की पूजा करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। मां भक्त के सारे दोष और पाप दूर कर देती है। मां अपने भक्तों की समस्त इच्छाओं की पूर्ति करती हैं। भगवान स्कंद कुमार कार्तिके के नाम से भी जाने जाते हैं। ये प्रसिद्ध देवासुर संग्राम में देवताओं के सेनापति बने थे। पुराणों में इन्हें कुमार और शक्ति कहकर इनकी महिमा का वर्णन किया गया है। इन्हीं भगवान स्कंद की माता होने के कारण मां दुर्गाजी के इस स्वरूप को स्कंदमाता के नाम से जाना जाता है। नवदुर्गा के पांचवें स्वरूप स्कंदमाता की अलसी औषधी के रूप में भी पूजा होती है। स्कंद माता को पार्वती एवं उमा के नाम से भी जाना जाता है। स्कंद माता की पूजा में भक्तों को पीले फूल, चने की दाल, मौसमी फल और केले का भोग लगाना चाहिए। मान्यता है कि पीले वस्त्र धारण कर पूजा की जाए तो परिणाम अति शुभ होते हैं।
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इस मंत्र का करें जाप
या देवी सर्वभूतेषु माँ स्कंदमाता रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमा।
तीन सौ वर्ष से भी पुराना है माता काली का मंदिर
अजीतगंज। क्षेत्र के गांव रतनपुर बरा में कालीमाता का प्राचीन मंदिर है। ग्रामीणों का कहना है कि मंदिर का निर्माण 300 साल पहले गांव के ही थम्मन मिश्रा के पूर्वजों ने कराया था। मां काली मंदिर पर नवरात्र में नवमी के दिन मेला लगता है। यहां हजारों श्रद्धालु जुटते हैं। माता का अशीर्वाद लेकर पूजा अर्चना करते हैं। यहां असाढ़ माह में भी मेले का आयोजन होता है। मंदिर की विशेष बात यह है कि एक ही प्रांगण में कालीमाता का मंदिर और मजार स्थित हैं। श्रद्धालु मंदिर में माता को प्रसाद चढ़ाने के बाद मजार पर भी मत्था टेकता है। मंदिर की बुर्जी की ऊंचाई 40 फीट है। भक्तों के आने जाने के लिए दो दरवाजे लगे हुए हैं। मान्यता है कि कालीमाता के पूजन से बिगड़े काम बन जाते हैं।
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नवरात्र के चौथे दिन हुई माता कूष्मांडा की पूजा
-शीतला देवी मंदिर पर रहे मेले जैसे हालात
अमर उजाला ब्यूरो
मैनपुरी। जिले भर में नवरात्र के चौथे दिन माता कूष्मांडा की पूजा-अर्चना की गई। इस दौरान भक्तों में माता के चतुर्थ स्वरूप की पूजा के लिए हर तरफ उत्साह दिखाई दिया।
बुधवार को सुबह से ही सृष्टि का विस्तार करने वाली माता कूष्मांडा की पूजा-अर्चना के लिए भक्तों का माता के मंदिरों में पहुंचना शुरू हो गया था। भक्तों ने माता के मंदिरों में पहुंचकर आराधना कर माता कूष्मांडा की आरती उतारी। इस दौरान भजन कीर्तन का भी दौर जारी रहा। मंदिरों में सुबह से ही भीड़ रही। व्रतधारी भक्तों ने माता के मंदिरों में पहुंचकर घंटों तक संकीर्तन किया। नगर के प्रसिद्ध शीतला देवी और काली माता मंदिर में आयोजित होने वाली महा आरती में भक्तों ने भाग लिया। इसके अतिरिक्त भोगांव, कुरावली, बेवर, करहल, किशनी, कुसमरा आदि स्थानों पर भी आयोजित माता मंदिरों में माता कूष्मांडा की पूजा अर्चना की गई।
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पीले वस्त्र धारण कर करें स्कंदमाता की पूजा
नवरात्र के पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा होती है। मां के इस स्वरूप की पूजा करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। मां भक्त के सारे दोष और पाप दूर कर देती है। मां अपने भक्तों की समस्त इच्छाओं की पूर्ति करती हैं। भगवान स्कंद कुमार कार्तिके के नाम से भी जाने जाते हैं। ये प्रसिद्ध देवासुर संग्राम में देवताओं के सेनापति बने थे। पुराणों में इन्हें कुमार और शक्ति कहकर इनकी महिमा का वर्णन किया गया है। इन्हीं भगवान स्कंद की माता होने के कारण मां दुर्गाजी के इस स्वरूप को स्कंदमाता के नाम से जाना जाता है। नवदुर्गा के पांचवें स्वरूप स्कंदमाता की अलसी औषधी के रूप में भी पूजा होती है। स्कंद माता को पार्वती एवं उमा के नाम से भी जाना जाता है। स्कंद माता की पूजा में भक्तों को पीले फूल, चने की दाल, मौसमी फल और केले का भोग लगाना चाहिए। मान्यता है कि पीले वस्त्र धारण कर पूजा की जाए तो परिणाम अति शुभ होते हैं।
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इस मंत्र का करें जाप
या देवी सर्वभूतेषु माँ स्कंदमाता रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमा।
तीन सौ वर्ष से भी पुराना है माता काली का मंदिर
अजीतगंज। क्षेत्र के गांव रतनपुर बरा में कालीमाता का प्राचीन मंदिर है। ग्रामीणों का कहना है कि मंदिर का निर्माण 300 साल पहले गांव के ही थम्मन मिश्रा के पूर्वजों ने कराया था। मां काली मंदिर पर नवरात्र में नवमी के दिन मेला लगता है। यहां हजारों श्रद्धालु जुटते हैं। माता का अशीर्वाद लेकर पूजा अर्चना करते हैं। यहां असाढ़ माह में भी मेले का आयोजन होता है। मंदिर की विशेष बात यह है कि एक ही प्रांगण में कालीमाता का मंदिर और मजार स्थित हैं। श्रद्धालु मंदिर में माता को प्रसाद चढ़ाने के बाद मजार पर भी मत्था टेकता है। मंदिर की बुर्जी की ऊंचाई 40 फीट है। भक्तों के आने जाने के लिए दो दरवाजे लगे हुए हैं। मान्यता है कि कालीमाता के पूजन से बिगड़े काम बन जाते हैं।