{"_id":"5e458f988ebc3ee5b6562e18","slug":"cultural-kanawad-mela-kasganj-news-agr429357166","type":"story","status":"publish","title_hn":"आस्था की कांवड़ में होगा चल, अचला गंगा के जल का संगम","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
आस्था की कांवड़ में होगा चल, अचला गंगा के जल का संगम
विज्ञापन
कासगंज के सोरों-लहरा घाट पर जयकारे लगाते कांवड़िये
- फोटो : KASGANJ
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
कासगंज। तीर्थनगरी सोरों में कांवड़ मेला के कारण आस्था का संगम है। महाशिवरात्रि पर्व पर भगवान शिव के जलाभिषेक के लिए दूर दराज से पहुंच रहे कांवड़ियों में जहां एक ओर श्रद्धा का भाव है वहीं वर्षों पुरानी मान्यता को भी वह जीवंतता दिए हुए हैं। लहरा और सोरों घाट के गंगाजल का अद्भुत संगम कांवड़ियों की कांवड़ में रखे गंगाजल में हो रहा है।
तीर्थनगरी सोरों स्थित हरिपदी के कुंड को अचला गंगा की मान्यता मिली हुई है, क्योंकि कुंड का जल बहता पानी नहीं है। इसके अलावा लहरा घाट के बहते पानी के कारण यहां की पतित पावनी को चला गंगा कहा जाता है। दोनों ही घाटों के जल का अलग अलग महत्व है। राजस्थान और मध्यप्रदेश से आने वाले तमाम श्रद्धालु वर्षों पुरानी एक मान्यता को जीवंतता दिए हुए हैं। मान्यता है कि सोरों हरिपदी के कुंड और लहरा घाट के जल को कांवड़ की गंगाजली में मिश्रित कर भगवान शिव का जलाभिषेक करने से जन्म मरण से मुक्ति मिलती है और मनोकामना पूरी होती है।
पुरोहित बोले जल के संगम का विशेष महत्व
तीर्थपुरोहित राहुल वशिष्ठ एवं सतीश भारद्वाज के मुताबिक हरिपदी कुंड की अचला गंगा एवं लहरा घाट की चल गंगा के जल के संगम का विशेष महत्व है। दूर दराज के तमाम कांवड़िए ऐसे हैं जो दोनों ही गंगाघाटों का जल मिश्रित कर भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। मान्यता यह भी है कि राजस्थान, मध्यप्रदेश के तमाम श्रद्धालु तीर्थनगरी सोरों के हरिपदी कुंड का जल ताम्र पात्र में अलग से भी ले जाते हैं और भंडारे के रूप में गंगभोज का आयोजन करते हैं। वहां पानी को गंगाजल में मिलाकर लोगों को प्रसाद के रूप में पिलाते हैं।
विज्ञापन
लहरा की राह पर बढ़ी चहलकदमी
लहराघाट पर अब धीमे-धीमे श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ने लगी है। कांवड़ियों के आने से लहरा की राह पर चहलकदमी भी बढ़ गई है। अब दिन में ही नहीं बल्कि रात में भी लहरा, सोरों से कासगंज की ओर श्रद्धालु बढ़ रहे हैं और भगवान शिव की जयकार कर रहे हैं।
विज्ञापन
तीर्थनगरी सोरों स्थित हरिपदी के कुंड को अचला गंगा की मान्यता मिली हुई है, क्योंकि कुंड का जल बहता पानी नहीं है। इसके अलावा लहरा घाट के बहते पानी के कारण यहां की पतित पावनी को चला गंगा कहा जाता है। दोनों ही घाटों के जल का अलग अलग महत्व है। राजस्थान और मध्यप्रदेश से आने वाले तमाम श्रद्धालु वर्षों पुरानी एक मान्यता को जीवंतता दिए हुए हैं। मान्यता है कि सोरों हरिपदी के कुंड और लहरा घाट के जल को कांवड़ की गंगाजली में मिश्रित कर भगवान शिव का जलाभिषेक करने से जन्म मरण से मुक्ति मिलती है और मनोकामना पूरी होती है।
विज्ञापन
पुरोहित बोले जल के संगम का विशेष महत्व
तीर्थपुरोहित राहुल वशिष्ठ एवं सतीश भारद्वाज के मुताबिक हरिपदी कुंड की अचला गंगा एवं लहरा घाट की चल गंगा के जल के संगम का विशेष महत्व है। दूर दराज के तमाम कांवड़िए ऐसे हैं जो दोनों ही गंगाघाटों का जल मिश्रित कर भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। मान्यता यह भी है कि राजस्थान, मध्यप्रदेश के तमाम श्रद्धालु तीर्थनगरी सोरों के हरिपदी कुंड का जल ताम्र पात्र में अलग से भी ले जाते हैं और भंडारे के रूप में गंगभोज का आयोजन करते हैं। वहां पानी को गंगाजल में मिलाकर लोगों को प्रसाद के रूप में पिलाते हैं।
विज्ञापन
लहरा की राह पर बढ़ी चहलकदमी
लहराघाट पर अब धीमे-धीमे श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ने लगी है। कांवड़ियों के आने से लहरा की राह पर चहलकदमी भी बढ़ गई है। अब दिन में ही नहीं बल्कि रात में भी लहरा, सोरों से कासगंज की ओर श्रद्धालु बढ़ रहे हैं और भगवान शिव की जयकार कर रहे हैं।