{"_id":"5ec21460f916cf569a0f26cf","slug":"crisis-in-lockdown-to-run-shoe-factory-no-orders-came-from-country-or-abroad","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"संकट... श्रमिक पूरे नहीं तो कैसे चलें जूते के कारखाने, देश और विदेश से नहीं मिल रहे ऑर्डर","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
संकट... श्रमिक पूरे नहीं तो कैसे चलें जूते के कारखाने, देश और विदेश से नहीं मिल रहे ऑर्डर
Mon, 18 May 2020 10:23 AM IST
Abhishek Saxena
गगन राव पाटिल, अमर उजाला, आगरा
गगन राव पाटिल, अमर उजाला, आगरा
Published by: Abhishek Saxena
Updated Mon, 18 May 2020 10:23 AM IST
सार
- 8000 बड़े कारखाने हैं जूते के
- दुनिया भर में है आगरा के जूते की पहचान
विज्ञापन
जूता फैक्टरी में काम करता कारीगर
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
ताजनगरी की पहचान ताजमहल से तो है ही, जूते की चमक भी दुनिया भर में बिखरी है। लेकिन लॉकडाउन में कारखानों के शटर डाउन हैं। कोरोना वायरस का संकट इटली, अमेरिका, फ्रांस और ईरान सहित उन तमाम देशों में भी है जहां आगरा से जूते निर्यात किया जाते हैं।
अब वहां से ऑर्डर ही नहीं आ रहे हैं तो जूते के कारखाने कैसे चलें? वैसे भी प्रशासन ने छूट सिर्फ इतनी दी है कि 50 मजदूरों केसाथ काम किया जा सकता है। जिन कारखानों में 1500 से ज्यादा मजदूर हों, वे 50 से काम कैसे चलाएं? उद्यमी पुराने ऑर्डर पूरे करने के लिए कारखाने खोलना चाहते हैं लेकिन इतने कम मजदूरों के साथ काम कर पाना मुमकिन नहीं है।
परेशानी का सबब यह भी बना है कि यूपी में सबसे ज्यादा कोरोना संक्रमित आगरा में है। इस कारण यहां प्रशासन की सख्ती कुछ ज्यादा है। राहत सिर्फ इतनी है कि ज्यादातर जूता कारीगर स्थानीय हैं। जैसे ही स्थिति सामान्य होती है, तो जूता कारखाने धीरे धीरे पटरी पर आ सकते हैं। फिलहाल स्थिति विकट है।
विज्ञापन
विज्ञापन
अब वहां से ऑर्डर ही नहीं आ रहे हैं तो जूते के कारखाने कैसे चलें? वैसे भी प्रशासन ने छूट सिर्फ इतनी दी है कि 50 मजदूरों केसाथ काम किया जा सकता है। जिन कारखानों में 1500 से ज्यादा मजदूर हों, वे 50 से काम कैसे चलाएं? उद्यमी पुराने ऑर्डर पूरे करने के लिए कारखाने खोलना चाहते हैं लेकिन इतने कम मजदूरों के साथ काम कर पाना मुमकिन नहीं है।
विज्ञापन
परेशानी का सबब यह भी बना है कि यूपी में सबसे ज्यादा कोरोना संक्रमित आगरा में है। इस कारण यहां प्रशासन की सख्ती कुछ ज्यादा है। राहत सिर्फ इतनी है कि ज्यादातर जूता कारीगर स्थानीय हैं। जैसे ही स्थिति सामान्य होती है, तो जूता कारखाने धीरे धीरे पटरी पर आ सकते हैं। फिलहाल स्थिति विकट है।
विज्ञापन
ये प्रमुख इकाइयां
गुप्ता ओवरसीज, डाबर फुटवियर, पॉर्क्स एक्सपोर्ट, तेज शूज, वासन एंड वासन, विरोला इंटरनेशनल, कैफ लेदर सहित 250 इकाइयां निर्यात के लिए जूते बनाती हैं। इनके अलावा, लगभग 7500 इकाइयां हैं जो घरेलू आवश्यक्ता के लिए जूते बनाती हैं। इनसे अलग घर -घर चलने वाले लघु कारखाने तो 10 हजार से ज्यादा हैं।
बड़ा सवाल : तैयार माल कहां बेचें
जूता उद्यमियों के लिए बड़ा सवाल यह भी बना है कि जो माल पहले से तैयार है, उसे कहां भेजें। निर्यात कंपनियों ने पुराने ऑर्डर पूरे कर लिए लेकिन माल विदेश पहुंचा नहीं। घरेलू आवश्यक्ता के लिए भी जूते बड़ी संख्या में तैयार हैं लेकिन लॉकडाउन में जा नहीं सकते। बंदरगाहों पर माल पड़ा है। उसके वहां रहने का पैसा भी उद्यमी दे रहे हैं और वह पहुंच नहीं पा रहा है।
गुप्ता ओवरसीज, डाबर फुटवियर, पॉर्क्स एक्सपोर्ट, तेज शूज, वासन एंड वासन, विरोला इंटरनेशनल, कैफ लेदर सहित 250 इकाइयां निर्यात के लिए जूते बनाती हैं। इनके अलावा, लगभग 7500 इकाइयां हैं जो घरेलू आवश्यक्ता के लिए जूते बनाती हैं। इनसे अलग घर -घर चलने वाले लघु कारखाने तो 10 हजार से ज्यादा हैं।
बड़ा सवाल : तैयार माल कहां बेचें
जूता उद्यमियों के लिए बड़ा सवाल यह भी बना है कि जो माल पहले से तैयार है, उसे कहां भेजें। निर्यात कंपनियों ने पुराने ऑर्डर पूरे कर लिए लेकिन माल विदेश पहुंचा नहीं। घरेलू आवश्यक्ता के लिए भी जूते बड़ी संख्या में तैयार हैं लेकिन लॉकडाउन में जा नहीं सकते। बंदरगाहों पर माल पड़ा है। उसके वहां रहने का पैसा भी उद्यमी दे रहे हैं और वह पहुंच नहीं पा रहा है।
1. कारखाने खोले जाने की छूट मिलनी चाहिए
जूता कारखानों को खोले जाने की और छूट मिलनी चाहिए। लाखों लोग इससे जुड़े हैं। सामाजिक दूरी और मास्क अनिवार्य किया जा सकता है। फिलहाल स्थिति यह है कि पुराने ऑर्डर पूरे नहीं हुए हैं और नए मिल नहीं रहे। उद्यमियों के चेक बुक आदि जो सामान कारखानों में रह गया, उन्हें तक नहीं ला पाए हैं - गागन दास रमानी, अध्यक्ष, शू फैक्टर्स
2. आखिर कच्चा माल कहां से आएगा
लेदर टेनरी बंद हैं। विदेश से कच्चा माल आता था, वह बंद है। नए ऑर्डर आ नहीं रहे। 50 मजदूर के साथ कारखाना चलाना मुमकिन नहीं है। यह बड़े संकट का समय है। सरकार को जूता उद्योग को खास तौर से तवज्जो देनी होगी, वरना स्थिति विकट होती चली जाएगी। उद्यमियों का पहले ही करोड़ों का नुकसान हो चुकी है - शाहरू मोहसिन, जूता उद्यमी
3. जूता इंडस्ट्री को अलग से देखना होगा
जूता इंडस्ट्री संकट में है। 50 मजदूरों के साथ कारखाने नहीं खोले जा सकते हैं। कुछ काम होगा ही नहीं। कैसे ऑर्डर पूरे हो सकते हैं। सरकार को और रियायत देनी चाहिए - जितेंद्र त्रिलोकानी , जूता उद्यमी
जूता कारखानों को खोले जाने की और छूट मिलनी चाहिए। लाखों लोग इससे जुड़े हैं। सामाजिक दूरी और मास्क अनिवार्य किया जा सकता है। फिलहाल स्थिति यह है कि पुराने ऑर्डर पूरे नहीं हुए हैं और नए मिल नहीं रहे। उद्यमियों के चेक बुक आदि जो सामान कारखानों में रह गया, उन्हें तक नहीं ला पाए हैं - गागन दास रमानी, अध्यक्ष, शू फैक्टर्स
2. आखिर कच्चा माल कहां से आएगा
लेदर टेनरी बंद हैं। विदेश से कच्चा माल आता था, वह बंद है। नए ऑर्डर आ नहीं रहे। 50 मजदूर के साथ कारखाना चलाना मुमकिन नहीं है। यह बड़े संकट का समय है। सरकार को जूता उद्योग को खास तौर से तवज्जो देनी होगी, वरना स्थिति विकट होती चली जाएगी। उद्यमियों का पहले ही करोड़ों का नुकसान हो चुकी है - शाहरू मोहसिन, जूता उद्यमी
3. जूता इंडस्ट्री को अलग से देखना होगा
जूता इंडस्ट्री संकट में है। 50 मजदूरों के साथ कारखाने नहीं खोले जा सकते हैं। कुछ काम होगा ही नहीं। कैसे ऑर्डर पूरे हो सकते हैं। सरकार को और रियायत देनी चाहिए - जितेंद्र त्रिलोकानी , जूता उद्यमी