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गांधी आश्रम की कीमती संपत्ति को खुर्द-बुर्द करने का चल रहा षड्यंत्र
ब्यूरो, अमर उजाला अागरा
Updated Sat, 06 Jun 2015 02:23 AM IST
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क्षेत्रीय गांधी आश्रम बाईपास किनारे की 577 वर्ग मीटर बेशकीमती जमीन को तीन बिल्डरों को सौंपने के लिए कमेटी आर्थिक हालात सुधारने का तर्क दे रही है, लेकिन हकीकत ये है कि महज 15 हजार रुपये उसे किराये के तौर पर मिलेंगे।
अपने ही कर्मचारियों की भविष्य निधि न देने के मामले में क्षेत्रीय गांधी आश्रम के खिलाफ 47 लाख रुपये की रिकवरी भविष्य निधि संगठन कर चुका है, जबकि करोड़ों रुपये की वसूली अभी की जानी है। गांधी आश्रम के बुरे आर्थिक हालात तो इस लीज से सुधरेंगे नहीं, जबकि मंत्री पर इस लीज डीड में करोड़ों रुपये का फायदा लेने के आरोप लग रहे हैं।
1981 से अपने कर्मचारियों को प्रोविडेंट फंड तक न दे रहे गांधी आश्रम ने 29 साल के लिए सालाना 1.80 लाख रुपये किराए पर लीज बिल्डरों के नाम की। यानी हर माह 15 हजार रुपये की आय। इस रकम से गांधी आश्रम की हालत सुधरने का दावा किया जा रहा है। लेकिन हकीकत ये है कि क्षेत्रीय गांधी आश्रम ने अपने ही कर्मचारियों का भविष्य निधि नहीं दिया। सिविल कोर्ट में क्षेत्रीय गांधी आश्रम के मंत्री शंभू नाथ चौबे के खिलाफ मुकदमा दर्ज है। बैंक खाता सीज करके भी गांधी आश्रम से वसूली नहीं हो पाई।
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आश्रम नहीं देगा तो बिल्डर से वसूली
भविष्य निधि संगठन ने गांधी आश्रम से 47 लाख रुपये की रिकवरी की है, लेकिन अब जमीन बिल्डरों को सौंपने से हरकत में आए पीएफ कमिश्नर ने साफ कहा कि कर्मचारियों के भविष्य निधि की वसूली हर हाल में होगी। विभाग 17 बी के तहत रिकवरी करने की तैयारी कर रहा है, जिसके तहत अगर जमीन लीज पर दी गई है तो रिकवरी बिल्डरों से वसूली जाएगी।
मजिस्ट्रेट ने रुकवाया निर्माण कार्य
गांधीवादी एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रानी सरोज गौरिहार और श्री गांधी आश्रम, लखनऊ के प्रतिनिधि भरत मिश्रा की शिकायत पर शुक्रवार को प्रशासन ने मजिस्ट्रेट को भेजकर बिल्डरों का निर्माण कार्य रुकवा दिया। दोपहर में अधिकारियों के जाने के बाद फिर काम चला, लेकिन प्रशासन के सख्त संदेश के बाद निर्माण रोक दिया गया।
वर्जन
जिस उद्देश्य के लिए गांधी आश्रम बनाए गए, उन्हें दरकिनार करके जमीनों को बेचा जा रहा है। खादी और गांधी आश्रम भावनाओं से जुड़े हैं। आश्रम घाटे में हैं तो बंद कर दो, लेकिन बेचो मत। जो ऐसा कर रहे हैं, उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज होना चाहिए।
- रानी सरोज गौरिहार
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, गांधीवादी
फर्जी ढंग से लीज डीड की गई है, यह पूरी तरह से धोखाधड़ी का मामला है। शंभूनाथ चौबे अपनी जागीर समझकर आश्रम की संपत्तियां बेचकर अपनी जेब भर रहे हैं। वह ऐसा करके गांधी आश्रम के नाम को मिटा देंगे।
- भरत मिश्रा
प्रतिनिधि, श्रीगांधी आश्रम, लखनऊ
2012 में बना था जी प्लस 3 का प्लान
चार अप्रैल 2012 में क्षेत्रीय गांधी आश्रम मंत्री शंभूनाथ चौबे ने आश्रम की 10 हजार वर्ग फीट जमीन पर जी प्लस 3 फ्लैट निर्माण का टेंडर निकाला। तब श्री गांधी आश्रम, 9 शाहनजफ रोड, लखनऊ के महामंत्री ब्रजभूषण पांडेय सूचना प्रकाशित कराई कि आगरा की जमीन श्री गांधी आश्रम, लखनऊ की है, न कि क्षेत्रीय गांधी आश्रम की। संस्था को केवल खादी एवं ग्रामोद्योग का काम करने के लिए संपत्ति दी गई है। इसे बेचने का अधिकार नहीं है। 2 साल की चुप्पी के बाद शंभूनाथ चौबे ने अपनी योजना को परवान चढ़ाया।
कर्मचारियों को न वेतन, ना पीएफ
1981 से क्षेत्रीय गांधी आश्रम, कमला नगर, बाईपास में नौकरी करने वालों को कमेटी महज 2500 रुपये तनख्वाह दे रही है। संस्था के कर्मचारियों को वेतन भी इतना कम मिल रहा है कि न्यूनतम मजदूरी गारंटी अधिनियम का भी उल्लंघन हो रहा है। सवाल यही है कि जब तनख्वाह नहीं, पीएफ नहीं तो गांधी आश्रम में घाटा कैसे। साल 2008-09 में करीब 8 करोड़ रुपये का स्टॉक नई कमेटी को हैंडओवर किया गया था। घाटे की आड़ में जमीन और संपत्ति बेचने का षड्यंत्र रचा जा रहा है।
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अपने ही कर्मचारियों की भविष्य निधि न देने के मामले में क्षेत्रीय गांधी आश्रम के खिलाफ 47 लाख रुपये की रिकवरी भविष्य निधि संगठन कर चुका है, जबकि करोड़ों रुपये की वसूली अभी की जानी है। गांधी आश्रम के बुरे आर्थिक हालात तो इस लीज से सुधरेंगे नहीं, जबकि मंत्री पर इस लीज डीड में करोड़ों रुपये का फायदा लेने के आरोप लग रहे हैं।
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1981 से अपने कर्मचारियों को प्रोविडेंट फंड तक न दे रहे गांधी आश्रम ने 29 साल के लिए सालाना 1.80 लाख रुपये किराए पर लीज बिल्डरों के नाम की। यानी हर माह 15 हजार रुपये की आय। इस रकम से गांधी आश्रम की हालत सुधरने का दावा किया जा रहा है। लेकिन हकीकत ये है कि क्षेत्रीय गांधी आश्रम ने अपने ही कर्मचारियों का भविष्य निधि नहीं दिया। सिविल कोर्ट में क्षेत्रीय गांधी आश्रम के मंत्री शंभू नाथ चौबे के खिलाफ मुकदमा दर्ज है। बैंक खाता सीज करके भी गांधी आश्रम से वसूली नहीं हो पाई।
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आश्रम नहीं देगा तो बिल्डर से वसूली
भविष्य निधि संगठन ने गांधी आश्रम से 47 लाख रुपये की रिकवरी की है, लेकिन अब जमीन बिल्डरों को सौंपने से हरकत में आए पीएफ कमिश्नर ने साफ कहा कि कर्मचारियों के भविष्य निधि की वसूली हर हाल में होगी। विभाग 17 बी के तहत रिकवरी करने की तैयारी कर रहा है, जिसके तहत अगर जमीन लीज पर दी गई है तो रिकवरी बिल्डरों से वसूली जाएगी।
मजिस्ट्रेट ने रुकवाया निर्माण कार्य
गांधीवादी एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रानी सरोज गौरिहार और श्री गांधी आश्रम, लखनऊ के प्रतिनिधि भरत मिश्रा की शिकायत पर शुक्रवार को प्रशासन ने मजिस्ट्रेट को भेजकर बिल्डरों का निर्माण कार्य रुकवा दिया। दोपहर में अधिकारियों के जाने के बाद फिर काम चला, लेकिन प्रशासन के सख्त संदेश के बाद निर्माण रोक दिया गया।
वर्जन
जिस उद्देश्य के लिए गांधी आश्रम बनाए गए, उन्हें दरकिनार करके जमीनों को बेचा जा रहा है। खादी और गांधी आश्रम भावनाओं से जुड़े हैं। आश्रम घाटे में हैं तो बंद कर दो, लेकिन बेचो मत। जो ऐसा कर रहे हैं, उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज होना चाहिए।
- रानी सरोज गौरिहार
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, गांधीवादी
फर्जी ढंग से लीज डीड की गई है, यह पूरी तरह से धोखाधड़ी का मामला है। शंभूनाथ चौबे अपनी जागीर समझकर आश्रम की संपत्तियां बेचकर अपनी जेब भर रहे हैं। वह ऐसा करके गांधी आश्रम के नाम को मिटा देंगे।
- भरत मिश्रा
प्रतिनिधि, श्रीगांधी आश्रम, लखनऊ
2012 में बना था जी प्लस 3 का प्लान
चार अप्रैल 2012 में क्षेत्रीय गांधी आश्रम मंत्री शंभूनाथ चौबे ने आश्रम की 10 हजार वर्ग फीट जमीन पर जी प्लस 3 फ्लैट निर्माण का टेंडर निकाला। तब श्री गांधी आश्रम, 9 शाहनजफ रोड, लखनऊ के महामंत्री ब्रजभूषण पांडेय सूचना प्रकाशित कराई कि आगरा की जमीन श्री गांधी आश्रम, लखनऊ की है, न कि क्षेत्रीय गांधी आश्रम की। संस्था को केवल खादी एवं ग्रामोद्योग का काम करने के लिए संपत्ति दी गई है। इसे बेचने का अधिकार नहीं है। 2 साल की चुप्पी के बाद शंभूनाथ चौबे ने अपनी योजना को परवान चढ़ाया।
कर्मचारियों को न वेतन, ना पीएफ
1981 से क्षेत्रीय गांधी आश्रम, कमला नगर, बाईपास में नौकरी करने वालों को कमेटी महज 2500 रुपये तनख्वाह दे रही है। संस्था के कर्मचारियों को वेतन भी इतना कम मिल रहा है कि न्यूनतम मजदूरी गारंटी अधिनियम का भी उल्लंघन हो रहा है। सवाल यही है कि जब तनख्वाह नहीं, पीएफ नहीं तो गांधी आश्रम में घाटा कैसे। साल 2008-09 में करीब 8 करोड़ रुपये का स्टॉक नई कमेटी को हैंडओवर किया गया था। घाटे की आड़ में जमीन और संपत्ति बेचने का षड्यंत्र रचा जा रहा है।