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चंद्रयान-3 अपने लक्ष्य के करीब: चंद्रमा और मंगल ग्रह की सतह पर लैंडर के उतरने में क्या है अंतर, जानें जवाब

Sun, 20 Aug 2023 09:57 AM IST
धीरेन्द्र सिंह अमर उजाला ब्यूरो, आगरा
अमर उजाला ब्यूरो, आगरा Published by: धीरेन्द्र सिंह Updated Sun, 20 Aug 2023 09:57 AM IST
सार

Chandrayaan 3 Update Today: लैंडर मॉड्यूल अपने लक्ष्य के बेहद करीब है। कुछ ही दिनों में ये चांद की सतह पर उतर सकता है। ऐसे में मिशन और अंतरिक्ष के बारे में जानने के लिए विद्यार्थियों में उत्सुकता बढ़ती भी जा रही है। 

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Chandrayaan-3 closer to its goal know difference between landing of lander on surface of Moon and Mars
Chandrayaan-3 - फोटो : twitter

विस्तार

चंद्रयान-3 जैसे-जैसे अपने लक्ष्य के करीब पहुंच रहा है, मिशन और अंतरिक्ष के बारे में जानने के लिए विद्यार्थियों में उत्सुकता बढ़ती भी जा रही है। आगरा के अलावा बाहर के विद्यार्थी भी अमर उजाला के माध्यम से इनसे जुड़े सवाल पूछ रहे हैं, जिनका जवाब मामले के विशेषज्ञ व वैज्ञानिक डीईआई के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अरुण प्रताप सिकरवार की ओर से दिया जा रहा है।
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छात्रों के सवाल

सवाल: चंद्रमा और मंगल ग्रह की सतह पर किसी लैंडर के उतरने में क्या अंतर होता है?
जवाब: पृथ्वी की तुलना में मंगल ग्रह लगभग आधा है, लेकिन इसका वातावरण यहां की तुलना में सिर्फ एक प्रतिशत ही है। इसी तरह चंद्रमा का वातावरण तो मंगल से भी बहुत नगण्य है। किसी वस्तु या लैंडर को चंद्रमा की सतह पर उतारने के लिए रेट्रोरॉकेट का उपयोग करते हैं, जो कि लैंडर को सुरक्षित उतारने के लिए ऊपर की और थ्रस्ट देते हुए लैंडर को धीरे धीरे नीचे उतारने में मदद करते हैं। चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी की तुलना में 1/6 होता है। मंगल ग्रह पर कुछ वातावरण होने की वजह से लैंडर में रेट्रोरॉकेट के ऊपर की और थ्रस्ट के प्रयोग के साथ, एक बड़ा सा पैराशूट भी प्रयोग किया जाता है, जिससे नीचे उतरते हुए लैंडर की सॉफ्ट लैंडिंग की जा सके। अमेरिका का नासा, मंगल गृह पर इसी तरह से सॉफ्ट लैंडिंग कर चुका है।
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सवाल : इसरो का अगला अंतरिक्ष मिशन, आदित्य एल-1 क्या है तथा इससे किसकी खोज की जाएगी? 
जवाब: संस्कृत में आदित्य, सूर्य का एक पर्यायवाची शब्द है और इस तरह आदित्य एल-१ भारत का सूर्य के अध्ययन के लिए अंतरिक्ष में छोड़ा जाने वाला पहला उपग्रह होगा। एक भारी राकेट के साथ, इस उपग्रह को पृथ्वी से लगभग 15 लाख किलोमीटर दूर एल-1 कक्षा में भेजा जाएगा। यह एल-1 कक्षा वह होती है, जहां पृथ्वी पर होने वाले ग्रहण अथवा इसकी छाया का असर खत्म होकर इस उपग्रह पर लगातार सूर्य की रोशनी बनी रहेगी। इस तरह आदित्य एल-1, सूर्य के काफी नजदीक पहुंच कर इसकी सरंचना, ऊष्मा की क्रियाओं तथा सूर्य की दूसरी अनसुलझी विज्ञान के रहस्य को खोलेगा। यह मिशन पृथ्वी से एल-1 कक्षा तक पहुंचने में लगभग 109 दिन का समय लगाएगा।

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