संरक्षण: घड़ियाल के बाद इंडियन स्कीमर के लिए संजीवनी बनी चंबल, दिखे सुखद परिणाम
आगरा में चंबल नदी घड़ियाल के बाद अब इंडियन स्कीमर के लिए संजीवनी बनी है। संरक्षण के सुखद परिणाम दिखे हैं। नेस्टिंग के बाद वन विभाग की टीम निगरानी में जुटी है।
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उत्तर प्रदेश के आगरा जिले के बाह क्षेत्र में दुनिया में लुप्तप्राय स्थिति में पहुंचे घड़ियालों को नया जीवन देने वाली चंबल नदी खतरे में पड़ी इंडियन स्कीमर के लिए भी संजीवनी बनी है। घड़ियालों की तरह ही इस चिड़िया की भी संख्या यहां बढ़ रही है। शनिवार को इनकी नेस्टिंग का काम पूरा हो गया। मई में इंडियन स्कीमर और जून में घड़ियालों के नेस्ट से बच्चे निकलेंगे। नेस्ट की वन विभाग की टीम दिन रात निगरानी कर रही है।
वन विभाग के ताजा सर्वे में इंडियन स्कीमर (वैज्ञानिक नाम रेनचॉप्स अल्बिकोलिस) की संख्या 500 से बढ़कर 740 हो गई है। बांग्लादेश, पाकिस्तान, नेपाल, म्यांमार में संकटग्रस्त इंडियन स्कीमर की आबादी पिछले साल 500 थी। वर्ष 2015 में चंबल सफारी में हुए बर्ड फेस्टिवल में बांबे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी की परवीन शेख को इंडियन स्कीमर के संरक्षण का प्रोजेक्ट सौंपा गया था।
आज स्थिति ये है कि दुनिया की 80 फीसदी इंडियन स्कीमर चंबल में मौजूद हैं। बाह के रेंजर आरके सिंह राठौड़ ने बताया कि नदी के टापू पर इंडियन स्कीमर ने 70 से ज्यादा घोसले बनाए हैं। जिनमे करीब 210 अंडे दिए हैं। इससे साफ है कि इंडियन स्कीमर के लिए चंबल ने एक संजीवनी का काम किया है।
ऐसे संरक्षित हुई घड़ियालों की आबादी
1979 में दुनिया में लुप्तप्राय घड़ियालों के संरक्षण के लिए चंबल नदी को चुना गया। 1981 में घड़ियाल सेंक्चुअरी अस्तित्व में आई। ताजा सर्वे में घड़ियाल (वैज्ञानिक नाम गेविएलिस गंगेटिक्स) की आबादी 2108 हो गई है। पिछले साल इनका कुनबा 2014 था। मद्रास क्रोकोडाइल बैंक की टीम घड़ियालों के जीवन चक्र पर शोध कर रही है।
चंबल का स्वच्छ पानी घड़ियालों के लिए मुफीद साबित हुआ है। बाह के रेंजर आरके सिंह राठौड़ ने बताया कि घड़ियालों की नेस्टिंग का काम पूरा हो गया है। सियार आदि अंडों को नष्ट कर देते हैं। नेस्टों की सुरक्षा के लिए बालू में लोहे की जाली लगाई गई है। जून में हैचिंग पीरियड शुरू होते ही जाली हटाई जाएगी। अकेले बाह रेंज में 785 घड़ियाल मिले थे।
नेस्ट मॉनीटरिंग के लिए मिली अत्याधुनिक कश्ती
घड़ियाल इकोलॉजी प्रोजेक्ट पर काम कर रहे शोधार्थियों को बर्लिन चिड़ियाघर से अत्याधुनिक कश्ती मिली है। शोधार्थी जैलाबुद्दीन ने बताया कि अत्याधुनिक पोर्टेबल कश्ती, दो इलेक्ट्रिक ट्रोलिंग मोटर्स, रिचार्जेबल बैटरी और आवश्यक सामान से लैस है। इस कश्ती की मदद से नेस्टिंग सीजन में चंबल नदी के टापू और दोनों किनारों के नेस्टों तक पहुंचने एवं शोध कार्य आसान हो जाएगा।