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एक्सक्लूसिव: समय से पहले जन्म ले रहे 40 फीसदी शिशु, शोध में सामने आई चौंकाने वाली जानकारी

Sun, 10 Jan 2021 08:40 AM IST
मुकेश कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा Published by: मुकेश कुमार Updated Sun, 10 Jan 2021 08:40 AM IST
सार

  • 200 महिलाओं पर किया गया शोध, 80 ने समय से पूर्व दिया बच्चे को जन्म 
  • समय से पहले जन्मे बच्चों का विकास प्रभावित होता है, वजन कम रह जाता है

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bad effects of air pollution on pregnancy
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

आगरा की हवा में घुलते जहर का असर गर्भस्थ शिशुओं पर भी पड़ रहा है। ये समय से पहले दुनिया में आ रहे हैं। ताजनगरी में 200 गर्भवती महिलाओं की गर्भनाल के नमूने लेकर शोध किया गया तो चौंकाने वाली जानकारी सामने आई।

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शोध में पता चला कि 80 गर्भवती महिलाओं का प्रसव समय पूर्व (प्री-टर्म डिलीवरी) हुआ था। यह शोध डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय के रसायन विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रोफेसर अजय तनेजा के निर्देशन में डॉ. मधु आनंद और डॉ. अतर सिंह ने किया है। इसमें पाया गया कि समय पूर्व जन्म लेने से बच्चों के विकास पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।
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अध्ययन के लिए वर्ष 2016 से एसएन मेडिकल कॉलेज के स्त्री एवं प्रसूती रोग विभाग से महिलाओं के गर्भनाल के नमूने लिए गए। इसमें शहर और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों की महिलाओं को शामिल किया गया। 200 में से 97-98 फीसदी घरेलू महिलाएं हैं। डॉ. मधु आनंद और डॉ. अतर सिंह ने वायु में उपस्थित सूक्ष्म कणों को एकत्रित करके उनके विषैले प्रभाव का आंकलन किया।

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37 सप्ताह होने से पहले जन्मे बच्चे
चिकित्सकों ने बताया कि प्रदूषण का प्रभाव गर्भवती महिलाओं और शिशुओं पर देखा गया है। 200 में से 80 (40 फीसदी) महिलाओं का समय से पहले प्रसव हुआ। 37 सप्ताह से पहले जन्मे बच्चों को प्री-टर्म शिशु की श्रेणी में रखा जाता है। समय से प्रसव के मामले में गर्भनाल में कैडमियम व लेड की मात्रा अधिक पाई गई।

अंतिम तिमाही में कम रह गया बच्चों का वजन
डॉ. अतर सिंह के मुताबिक शोध के दौरान सामने आया कि गर्भावधि की अंतिम तिमाही (जो कि बच्चे के विकास के लिए एक महत्वपूर्ण समय होता है) में बढ़े हुए पर्यावरणीय प्रदूषण से बच्चे का वजन कम होना पाया गया। शोध में पाए गए कैडमियम व लेड का मुख्य स्रोत पर्यावरण है। इसके अलावा आहार व जल स्रोत भी हैं।

कैडमियम और लेड की मात्रा अधिक मिली
डॉ. मधु आनंद ने बताया कि बच्चों को जन्म देने वाली महिलाओं से निवास स्थान, खानपान की आदतें, उम्र, वजन, लंबाई आदि जानकारियां जुटाई गईं। उन महिलाओं की गर्भावधि का पर्यावरणीय डाटा, इसमें पार्टिकुलेट मैटर (नाइट्रोजन डाईऑक्साइड, सल्फर डाईऑक्साइड व कॉर्बन मोनोऑक्साइड) एकत्रित किया गया। 

गर्भनाल में उपस्थित मेटल का आंकलन किया गया। इसमें लेड, कॉपर, जिंक, निकिल, क्रोमियम, कोबाल्ट, आर्सेनिक व आयरन प्रमुख थे। समय से पहले के प्रसव के मामले में ही कैडमियम व लेड की मात्रा अधिक मिली। पार्टिकुलेट मैटर (पीएम-2.5) का असर सीधा बच्चे के वजन पर देखा गया। पार्टिकुलेट मैटर बढ़ने पर बच्चे का वजन कम पाया गया।

खून के थक्के जम जाते हैं
एसएन मेडिकल कॉलेज की वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. रिचा सिंह ने बताया कि प्रदूषण से महिलाओं में ऑक्सीजन का स्तर कम होने से कई बार गर्भवती महिलाओं में नलिकाओं में खून के थक्के भी जम जाते हैं, इससे समय पूर्व प्रसव कराना पड़ता है। ऑक्सीजन की कम मात्रा होने से गर्भस्थ शिशु का विकास प्रभावित होता है। वजन भी कम होता है। 
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