आगरा कथा: घोड़ों की रकाब के काम से पड़ा रकाबगंज नाम, रोचक है इसका इतिहास
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आगरा में दौर-ए-मुगलिया में गंज नाम से बने इलाकों में एक रकाबगंज भी है। इसका नाम रकाबगंज पड़ने का किस्सा दिलचस्प है। मुगल बादशाह जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर के समय में यहां घोड़ों की रकाब (जिस पर पैर रखकर घोड़े पर चढ़ते हैं) बनाने का काम शुरू हुआ था। इसीलिए इस इलाके का नाम रकाबगंज पड़ गया।
इतिहासकार राज किशोर राजे ने बताया कि पहले सिर्फ शाही घोड़ों की रकाब बनाई जाती थी। बाद में सिर्फ रकाब ही नहीं, जीन आदि अन्य सामान भी बनाए जाने लगे। अंग्रेजों के समय तक यह जारी रहा। अंग्रेजों के घोड़े यहां बांधे जाते थे। अंग्रेजों के समय ही यहां थाना बना।
उसी दौर में यहां अन्य कारोबार होने लगे। इसके आसपास होटल और क्लब खोले गए। रकाबगंज का गुरुद्वारा भी एतिहासिक है। गुरुद्वारा गुरु का ताल के मास्टर गुरनाम सिंह ने बताया कि गुरु तेग बहादुर सिंह की याद में यहां गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब बना। यह बात सन् 1675 की है।
ऑटो पार्ट्स का बड़ा कारोबार
आगरा ऑटो ट्रेडर्स एसोसिएशन के उपाध्यक्ष संजय सिंघल ने बताया कि रकाबगंज थाना क्षेत्र में स्क्रैप और ऑटोपार्ट्स का काम बड़े पैमाने पर होता है। 100 दुकानें और शोरूम हैं। पिछले करीब 100 वर्षों से यह कारोबार हो रहा है।
गुरु तेगबहादुर की याद में बना गुरुद्वारा
रकाबगंज में ऐतिहासिक गुरुद्वारा भी है। यह गुरु तेगबहादुर महाराज जी की याद में बना है। गुरुद्वारा गुरु के ताल के मास्टर गुरनाम सिंह ने बताया कि उनकी दिल्ली चांदनी चौक में शहीदी हुई थी। गुरु महाराज का शीश जैता जी श्री आनंदपुर साहिब लेकर आ गए थे और गुरु महाराज का धड़ चांदनी चौक पर ही था।
गुरु महाराज के सेवक लक्खी शाह बंजारा धड़ रकाबगंज लेकर आए और यहां घर में अंतिम संस्कार किया। मुगलों से बचने के लिए उन्होंने कह दिया कि उनके घर में आग लग गई है। यह वर्ष 1675 की बात है। बाद में उन्होंने गुरु महाराज के अंतिम संस्कार की जानकारी दी। 11 मार्च, 1793 में बाबा बघेल सिंह ने दिल्ली फतह की, तब गुरुद्वारे में सेवा आरंभ की।