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लापरवाही: आगरा में प्रशासन लचर, अस्पतालों पर कार्रवाई, न तालाबों से हटे निर्माण, पढ़िए पूरी खबर
Fri, 02 Jul 2021 12:59 PM IST
Abhishek Saxena
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
Published by: Abhishek Saxena
Updated Fri, 02 Jul 2021 12:59 PM IST
सार
एक अस्पताल को छोड़ बाकी पर अफसर मेहरबान रहे। कोई कार्रवाई नहीं हुई। दूसरी तरफ 12 महीनों में 139 तालाबों से पक्के निर्माण व कब्जे नहीं हट सके।
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तालाब का फाइल फोटो
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
प्रशासन की लचर कार्यशैली से हर काम लेटलतीफी का शिकार है। शासन द्वारा तय कीमतों को ताक पर रख कोविड अस्पतालों ने मनमानी वसूली की। एक अस्पताल को छोड़ बाकी पर अफसर मेहरबान रहे। कोई कार्रवाई नहीं हुई। दूसरी तरफ 12 महीनों में 139 तालाबों से पक्के निर्माण व कब्जे नहीं हट सके।
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वहीं जोंस मिल मामले में सात महीने बाद भी नगर निगम, सिंचाई व राजस्व विभाग खुर्दबुर्द हो रही सरकारी जमीन पर कब्जा नहीं ले सके। इधर, जनसुनवाई में जिला फिसड्डी है। उधर, छह महीने से धूल नियंत्रण के दावे धूल फांक रहे हैं। पांचों मामलों जस के तस हैं। इन लापरवाहियों के सवालों के जवाब में प्रशासन चुप्पी साध रहा है।
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लापरवाही एक : 54 शिकायतें, एक अस्पताल डिबार
महामारी में हर व्यक्ति को समान उपचार मिल सके। इसके लिए शासन ने निजी कोविड अस्पतालों में इलाज की कीमतें तय की। अस्पतालों ने शासनादेश का मखौल उड़ाया। अधिक बिलिंग की 54 शिकायतें आईं। किसी के विरुद्ध अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई। जिलाधिकारी प्रभु एन सिंह ने सिर्फ एक मामले में रवि हॉस्पिटल को कोविड उपचार सूची से डिबार किया था। अन्य अस्पतालों की शिकायतों को महामारी समिति को भेज दिया। जहां प्रशासनिक जांच के बाद कार्रवाई कागजों में सिमट गई। कार्रवाई के डर से कई अस्पतालों ने अधिक वसूला धन वापस किया, परंतु इनके विरुद्ध अफसर लापरवाह बने हुए हैं।
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लापरवाही दो : 139 तालाबों से नहीं हटे निर्माण
शहर से गांव तक 139 तालाबों पर अवैध निर्माण हैं। हाईकोर्ट ने तालाबों को पुराने स्वरूप में लौटाने के आदेश दिए। डीएम ने एडीएम की अध्यक्षता में कमेटी बनाई। 12 महीने बाद भी कमेटी एक तालाब से कब्जे नहीं हटा सकी। कुछ तालाब खुद सरकारी विभागों ने घेर लिए। अमर उजाला बार-बार अफसरों को चेताता रहा, लेकिन वह नहीं चेते। कभी कोविड, तो कभी चुनाव तो कभी कोई और बहाना बनाकर अधिकारी अतिक्रमण में दफन तालाबों को लेकर सजग नहीं दिखे। एडीएम वित्त का कहना है कि पक्के निर्माण को हटाना संभव नहीं है। तालाबों को संरक्षित करने के लिए दोबारा समीक्षा की जाएगी।
लापरवाही तीन: जोंस मिल में नहीं लिया कब्जा
आगरा में जमीनों का सबसे बड़ा फर्जीवाड़ा जोंस मिल। 2596 करोड़ रुपये की जमीन खुर्दबुर्द हो गई। जिनमें 107 करोड़ की सरकारी जमीन हैं। दिसंबर में डीएम प्रभु एन सिंह ने सिंचाई विभाग, नगर निगम और राजस्व विभाग को खुदबुर्द हो रही जमीनों पर कब्जा लेने के आदेश दिए। सात महीने बाद भी प्रशासन एक इंच जमीन पर कब्जा नहीं ले सका है। जमीनों को भूमाफिया प्रवृत्ति के लोग इस्तेमाल कर आर्थिक लाभ उठा रहे हैं। इस पूरे मामले में सदर तहसील प्रशासन की भूमिका भी संदिग्ध है। जमीनों की खरीद-फरोख्त के समय तहसील अधिकारियों ने लापरवाही बरती। अरबों रुपये की सरकारी संपत्तियों की अनदेखी हो रही है।
लापरवाही चार: धूल फांक रहे धूल नियंत्रण के दावे
जिला प्रशासन ने पिछले साल धूल और प्रदूषण नियंत्रण को लेकर बड़े-बड़े दावे किए थे। पानी छिड़काव, हरा कपड़ा, निर्माण नियमों का पालन व गैर जिम्मेदार विभागों पर जुर्माना की बात कही थी। सात महीने से प्रशासन के दावे धूल फांक रहे हैं। बेतरतीब खुदाई और जाम से शहर हांफ रहा है। तब जिलाधिकारी ने ऐसे विभागों से जुर्माना राशि भूराजस्व की भांति वसूलने की बात कही थी, लेकिन एनएचआई के विरुद्ध रिकवरी जारी होने के बाद भी वसूली नहीं की गई। इधर, जल निगम ने सीवर व पेयजल लाइनों के नाम पर शहर खोद रखा है। प्रशासन की लचर कार्यशैली का खामियाजा जनता भुगत रही है।
शहर से गांव तक 139 तालाबों पर अवैध निर्माण हैं। हाईकोर्ट ने तालाबों को पुराने स्वरूप में लौटाने के आदेश दिए। डीएम ने एडीएम की अध्यक्षता में कमेटी बनाई। 12 महीने बाद भी कमेटी एक तालाब से कब्जे नहीं हटा सकी। कुछ तालाब खुद सरकारी विभागों ने घेर लिए। अमर उजाला बार-बार अफसरों को चेताता रहा, लेकिन वह नहीं चेते। कभी कोविड, तो कभी चुनाव तो कभी कोई और बहाना बनाकर अधिकारी अतिक्रमण में दफन तालाबों को लेकर सजग नहीं दिखे। एडीएम वित्त का कहना है कि पक्के निर्माण को हटाना संभव नहीं है। तालाबों को संरक्षित करने के लिए दोबारा समीक्षा की जाएगी।
लापरवाही तीन: जोंस मिल में नहीं लिया कब्जा
आगरा में जमीनों का सबसे बड़ा फर्जीवाड़ा जोंस मिल। 2596 करोड़ रुपये की जमीन खुर्दबुर्द हो गई। जिनमें 107 करोड़ की सरकारी जमीन हैं। दिसंबर में डीएम प्रभु एन सिंह ने सिंचाई विभाग, नगर निगम और राजस्व विभाग को खुदबुर्द हो रही जमीनों पर कब्जा लेने के आदेश दिए। सात महीने बाद भी प्रशासन एक इंच जमीन पर कब्जा नहीं ले सका है। जमीनों को भूमाफिया प्रवृत्ति के लोग इस्तेमाल कर आर्थिक लाभ उठा रहे हैं। इस पूरे मामले में सदर तहसील प्रशासन की भूमिका भी संदिग्ध है। जमीनों की खरीद-फरोख्त के समय तहसील अधिकारियों ने लापरवाही बरती। अरबों रुपये की सरकारी संपत्तियों की अनदेखी हो रही है।
लापरवाही चार: धूल फांक रहे धूल नियंत्रण के दावे
जिला प्रशासन ने पिछले साल धूल और प्रदूषण नियंत्रण को लेकर बड़े-बड़े दावे किए थे। पानी छिड़काव, हरा कपड़ा, निर्माण नियमों का पालन व गैर जिम्मेदार विभागों पर जुर्माना की बात कही थी। सात महीने से प्रशासन के दावे धूल फांक रहे हैं। बेतरतीब खुदाई और जाम से शहर हांफ रहा है। तब जिलाधिकारी ने ऐसे विभागों से जुर्माना राशि भूराजस्व की भांति वसूलने की बात कही थी, लेकिन एनएचआई के विरुद्ध रिकवरी जारी होने के बाद भी वसूली नहीं की गई। इधर, जल निगम ने सीवर व पेयजल लाइनों के नाम पर शहर खोद रखा है। प्रशासन की लचर कार्यशैली का खामियाजा जनता भुगत रही है।
लापरवाही पांच : जनसुनवाई में फिसड्डी प्रशासन
जन शिकायतों को लेकर प्रशासन गंभीर है, न सरकारी विभाग। प्रार्थनापत्रों का गुणवत्ता पूर्ण निस्तारण नहीं होता। एक-एक शिकायत के लिए फरियादियों को दस-दस चक्कर काटने पड़ते हैं। पिछले चार महीने से जिले में संपूर्ण समाधान दिवस बंद है। आईजीआरएस पोर्टल पर शिकायतों के निस्तारण में खानापूरी हो रही है। फरवरी में जनसुनवाई में आगरा प्रदेश में सबसे फिसड्डी 75वें पर स्थान पर रहा। इस शर्मनाक स्थिति के बाद भी अफसर नहीं संभल रहे। उधर, जनशिकायतों का तहसील से लेकर कलक्ट्रेट, नगर निगम, पुलिस थानों में अंबार लगा है। जनसुनवाई में प्रशासनिक अधिकारियों की लापरवाही से पीड़ित दर-दर भटकने को मजबूर हैं।
तालाब: ताजनगरी की तहसीलों में सौ से अधिक राजस्व वाद, बेदखली के मुकदमों में लचर पैरवी से नहीं हट सके कब्जे
जन शिकायतों को लेकर प्रशासन गंभीर है, न सरकारी विभाग। प्रार्थनापत्रों का गुणवत्ता पूर्ण निस्तारण नहीं होता। एक-एक शिकायत के लिए फरियादियों को दस-दस चक्कर काटने पड़ते हैं। पिछले चार महीने से जिले में संपूर्ण समाधान दिवस बंद है। आईजीआरएस पोर्टल पर शिकायतों के निस्तारण में खानापूरी हो रही है। फरवरी में जनसुनवाई में आगरा प्रदेश में सबसे फिसड्डी 75वें पर स्थान पर रहा। इस शर्मनाक स्थिति के बाद भी अफसर नहीं संभल रहे। उधर, जनशिकायतों का तहसील से लेकर कलक्ट्रेट, नगर निगम, पुलिस थानों में अंबार लगा है। जनसुनवाई में प्रशासनिक अधिकारियों की लापरवाही से पीड़ित दर-दर भटकने को मजबूर हैं।
तालाब: ताजनगरी की तहसीलों में सौ से अधिक राजस्व वाद, बेदखली के मुकदमों में लचर पैरवी से नहीं हट सके कब्जे