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UP: एक सप्ताह में 12 बुजुर्गों ने ली वृद्ध आश्रम में शरण, किसी को बेटों ने पीटा तो किसी को बहू ने घर से निकाला
Wed, 01 Apr 2026 11:23 AM IST
Dhirendra Singh
अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
Published by: Dhirendra Singh
Updated Wed, 01 Apr 2026 11:23 AM IST
सार
आगरा के वृद्ध आश्रम में एक हफ्ते में 12 बुजुर्गों ने शरण ली, जिन्हें उनके ही परिवार ने ठुकरा दिया। बीमारी और लाचारी के बावजूद अपनों से दूर हुए ये बुजुर्ग अब आश्रम में सहारा तलाश रहे हैं।
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रामलाल वृद्धाश्रम
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
आगरा में रिश्तों की मर्यादाएं तार-तार हो रही है। जिन हाथों ने बच्चों को चलना सिखाया, आज वही हाथ बुढ़ापे में लाठी की तलाश में दर-दर भटक रहे हैं। रामलाल वृद्ध आश्रम में बीते एक सप्ताह के भीतर 12 ऐसे बदनसीब बुजुर्गों ने शरण ली है, जिन्हें उनके ही अपनों ने बोझ समझकर घर से बाहर धकेल दिया।
नगला पदी की 65 वर्षीय आशा शर्मा की कहानी रूह कंपा देने वाली है। तीन बेटे होने के बावजूद वह पूरी तरह असहाय हैं। बिस्तर से उठने में असमर्थ आशा को बहुओं ने अपनाने से इन्कार कर दिया। अब उनका छोटा बेटा बंटी खुद आश्रम में रहकर अपनी मां की सेवा कर रहा है। वहीं, शहीद नगर की राजकुमारी (70) ने कोरोना में एक बेटा खोया, तो दूसरे बेटे और पति ने ही उन्हें प्रताड़ित कर घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया।
भावना स्टेट के रजनीकांत (65) को लकवा (पैरालिसिस) मार गया है। पत्नी ने उन्हें बोझ समझ लिया। बेटी लखनऊ में नौकरी करती है, लेकिन पिता की सुध लेने वाला कोई नहीं। वहीं रामबाग के दीपक (45) और रुनकता के सीताराम (65) की व्यथा भी कम नहीं है। सीताराम को उनके ही बेटों और बहुओं ने धक्के मारकर घर से निकाल दिया। कोलकाता के रहने वाले 80 वर्षीय बंगाली बाबा रास्ता भटक कर परिवार से बिछड़ गए, तो अलीगढ़ के आनंद प्रकाश मानसिक अस्थिरता के कारण सड़कों पर घूमते मिले, जिन्हें पुलिस ने आश्रम पहुंचाया। मथुरा की रेखा को उनके बेटे ने दोबारा घर न आने की चेतावनी देकर निकाल दिया, जबकि उनके पति की हालत भी गंभीर बनी हुई है।
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आश्रम के अध्यक्ष शिव प्रसाद शर्मा ने कहा कि समाज में गिरते नैतिक मूल्य चिंता का विषय हैं। इन सभी बुजुर्गों को भोजन, चिकित्सा और छत मुहैया कराई जा रही है। इस दौरान विनय शर्मा, मीडिया प्रभारी धीरज चौधरी और मुकेश सारस्वत आदि सेवादार मौजूद रहे।
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नगला पदी की 65 वर्षीय आशा शर्मा की कहानी रूह कंपा देने वाली है। तीन बेटे होने के बावजूद वह पूरी तरह असहाय हैं। बिस्तर से उठने में असमर्थ आशा को बहुओं ने अपनाने से इन्कार कर दिया। अब उनका छोटा बेटा बंटी खुद आश्रम में रहकर अपनी मां की सेवा कर रहा है। वहीं, शहीद नगर की राजकुमारी (70) ने कोरोना में एक बेटा खोया, तो दूसरे बेटे और पति ने ही उन्हें प्रताड़ित कर घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया।
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भावना स्टेट के रजनीकांत (65) को लकवा (पैरालिसिस) मार गया है। पत्नी ने उन्हें बोझ समझ लिया। बेटी लखनऊ में नौकरी करती है, लेकिन पिता की सुध लेने वाला कोई नहीं। वहीं रामबाग के दीपक (45) और रुनकता के सीताराम (65) की व्यथा भी कम नहीं है। सीताराम को उनके ही बेटों और बहुओं ने धक्के मारकर घर से निकाल दिया। कोलकाता के रहने वाले 80 वर्षीय बंगाली बाबा रास्ता भटक कर परिवार से बिछड़ गए, तो अलीगढ़ के आनंद प्रकाश मानसिक अस्थिरता के कारण सड़कों पर घूमते मिले, जिन्हें पुलिस ने आश्रम पहुंचाया। मथुरा की रेखा को उनके बेटे ने दोबारा घर न आने की चेतावनी देकर निकाल दिया, जबकि उनके पति की हालत भी गंभीर बनी हुई है।
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आश्रम के अध्यक्ष शिव प्रसाद शर्मा ने कहा कि समाज में गिरते नैतिक मूल्य चिंता का विषय हैं। इन सभी बुजुर्गों को भोजन, चिकित्सा और छत मुहैया कराई जा रही है। इस दौरान विनय शर्मा, मीडिया प्रभारी धीरज चौधरी और मुकेश सारस्वत आदि सेवादार मौजूद रहे।