फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Agra News ›   ‘मॉडर्न होते जा रहे हैं पुराण और कहानियां’

‘मॉडर्न होते जा रहे हैं पुराण और कहानियां’

Mon, 04 Feb 2013 05:30 AM IST
Agra
Agra Updated Mon, 04 Feb 2013 05:30 AM IST
विज्ञापन
‘ताज साहित्य उत्सव’ का समापन रविवार को ताज के आंगन में हुआ। समापन दो सत्रों में हुआ। पहला अमीष त्रिपाठी की नई किताब ‘नागाओं के रहस्य’ के नाम रहा, तो दूसरे में अभिनेता फारुख शेख ने ‘प्यार’ के विभिन्न रूपों पर चर्चा की। अभिनेत्री वाणी त्रिपाठी के साथ बातचीत में युवा लेखक अमीष त्रिपाठी ने कहा कि हमारे पुराण और कहानियां मॉडर्न होते जा रहे हैं। यह सिलसिला हजारों सालों से चला आ रहा है। बाल्मीकि की रामायण और तुलसी की रामायण का अंतर इसका उदाहरण हैं। साउथ में ‘कंबा रामायण’ में कुछ और भाव हैं, तो छत्तीसगढ़ में प्रचलित रामायण का स्वरूप और है।
विज्ञापन

हजारों साल पहले गढ़े गए इन पुराणों को आधुनिक शब्द देकर पेश करना ही नई शैली है। उन्होंने कहा कि मैं इस शैली का पालन करता हूं। इसलिए मैं कहानी लिखता नहीं हूं, कहानी की खोज करता हूं।
विज्ञापन

‘फ्रीडम ऑफ स्पीच’ पर अमीष ने कहा कि वो धार्मिक नहीं हो सकता है, जो अपने धर्म या काम को दूसरे से बेहतर बताए। यदि कोई बात सही है, तो उसे कहने के अलग-अलग रूप हो सकते हैं। आईआईएम कोलकाता से पढ़े और बैंक की नौकरी छोड़कर लेखक बने अमीष ने लेखन शैली पर कहा कि ‘मार्केटिंग करके किताब नहीं लिखनी चाहिए, लेकिन किताब लिखने के बाद मार्केटिंग जरूर करनी चाहिए’।
विज्ञापन
विज्ञापन



फारुख शेख और फिरोज अब्बास खान की बातचीत
सोसायटी ‘मैकडॉनायल’ हो गई है
सब कुछ जल्द पाने की चाहत लोगों को गर्त में ले जा रही है। फिर बात चाहे अमीरी के संदर्भ में हो या प्यार के। या फिर मैकडोनाल्ड में बर्गर खाकर जल्दी पेट भरने की। वास्तव में जल्दी का यह सिलसिला व्यक्ति को कुछ भी नहीं दे पाता। यह बातें अभिनेता फारुख शेख ने कहीं, जब वह ताज के आंगन में बैठकर ‘प्रेम’ की बदली परिभाषा पर फीरोज अब्बास खान से बातचीत कर रहे थे।
फारुख शेख ने कहा कि प्रेम एक बुनियादी जज्बा है। इसके बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। प्यार का जज्बा न हो तो जिंदगी रेगिस्तान सरीखी हो जाती है। यह किसी पड़ोसी की दीवारों तक सिमटा नहीं है, यह सरहदों के पार भी है। हां, लेकिन समय के साथ इसकी परिभाषा में बदलाव आया है।
एक जमाना था, जब कोई मोहब्बत की बात कहता था तो इसे इंकलाबी बात समझा जाता था। हीरोइन, फिल्म में हीरो से सात जन्म साथ निभाने की बात कहती थी, तो भावुकता आती थी। जबकि आज की हीरोइनें इस डॉयलॉग को बोलेंगी, तो बोरियत ही होगी।
जंजीर, सिलसिला, गुमराह सहित दर्जनों फिल्मों का उदाहरण देकर उन्होंने कहा कि उस जमाने में फिल्म एक कला थी, जबकि आज ‘करोड़ी क्लब’ का खेल बन गया है। बेहद व्यथित अंदाज में फारुख ने कहा कि असल में फिल्में सोसायटी का ही चेहरा दिखाती हैं। कोई भी निर्माता या निर्देशक ऐसी किसी कहानी या बात पर रिस्क नहीं लेना चाहता, जिसमें समाज एक्सेप्ट नहीं करता। इतना ही पहले आज कल की फिल्मों का आधुनिक चेहरा सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित था, लेकिन अब यह बातें छोटे कस्बों और गांवों तक पहुंच गई हैं।

उन्होंने कहा कि जिस व्यक्ति को लगता है कि वह अपने जीवनसाथी का बिना अधूरा है, समझो उसने प्रेम को हृदय से आत्मसात किया है। हमें समझने की जरूरत है कि हमें प्रेम को किस रूप में देखना है और यह सिर्फ दो व्यक्ति के बीच का रिश्ता नहीं बल्कि सर्वत्र है।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed