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यहां आज भी पांच दिन तक निकलतीं हैं हुरियारों की टोलियां
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हाेली
- फोटो : Amar Ujala
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मैनपुरी। कभी दस्यु छबिराम जैसे लोगों की शरणगाह रहा गांव रठेरा आज भी एकता की परंपरा को आगे बढ़ा रहा है। यहां चाहे वर्ष भर लोगों में कितनी भी लड़ाईयां हों लेकिन लगभग 11 हजार की आबादी वाले इस गांव के लोग एक ही स्थान पर होलिका दहन कर आखत डालने का कार्य करते हैं। यही नहीं गांव के लोग सैकड़ों वर्ष पुरानी अपनी पांच दिन तक चौपाई (हुरियारों की टोलियां) निकालने का कार्य भी करते हैं।
80 के दशक में गांव रठेरा की पहचान दस्यु छबिराम की शरणस्थली के रूप में मानी जाती थी, लेकिन इस गांव ने अपनी होली को लेकर चल रही परंपरा को कभी बिगड़ने नहीं दिया। लगभग 11 हजार की आबादी वाला जिले का सबसे बड़ा गांव रठेरा जिसमें चार हजार से अधिक मतदाता हैं। एकता का संदेश भी देता है। गांव में वर्षों पुरानी एक परंपरा है कि गांव के सभी लोग एक स्थान पर एकत्रित होकर होलिका दहन कर आखत डालते हैं।
यही नहीं गांव में पड़वा से हुरियारों की टोलियां घूमना शुरू करती हैं। बड़ा गांव होने के कारण यह टोलियां गांव में घर-घर पांच दिन तक घूमती हैं। पांचवें दिन हुरियारों की टोली पंचमी शाम होलिका स्थान पर पहुंचकर समाप्त होती है और इस रात गांव के लोग एक दूसरे के घर जाकर प्रेम से गले सिकवे मिटाकर गले मिलते हैं। छोटे लोग बड़ों के पैर छूकर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। इस दौरान जुहारी कार्यक्रम भी चलता रहता है।
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25 लोगों की मौत के बाद भी निकली हुरियारों की टोली
मैनपुरी। वर्ष 2012 में गांव पर बड़ा संकट आया था। सात फरवरी 2012 लगुन ले जा रही बस सड़क हादसे का शिकार हुई। इस दुर्घटना में 25 लोगों की मौत हुई। जिसमें गांव के 22 लोग शामिल थे। होली से ठीक पहले गांव के 22 लोगों की मौत एक बड़ा सदमा था। इस दौरान इस पुरानी परंपरा टूटने का संकट खड़ा हुआ, लेकिन जिन घरों के लोग इस हादसे में मौत का शिकार हुए थे। उन घरों के लोग आगे आए। उन्होंने कहा कि हम अपनी पुरानी परंपरा नहीं तोड़ेंगे। उन लोगाें की सहमति के बाद गांव की यह पुरानी परंपरा 2012 में भी जारी रही।
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80 के दशक में गांव रठेरा की पहचान दस्यु छबिराम की शरणस्थली के रूप में मानी जाती थी, लेकिन इस गांव ने अपनी होली को लेकर चल रही परंपरा को कभी बिगड़ने नहीं दिया। लगभग 11 हजार की आबादी वाला जिले का सबसे बड़ा गांव रठेरा जिसमें चार हजार से अधिक मतदाता हैं। एकता का संदेश भी देता है। गांव में वर्षों पुरानी एक परंपरा है कि गांव के सभी लोग एक स्थान पर एकत्रित होकर होलिका दहन कर आखत डालते हैं।
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यही नहीं गांव में पड़वा से हुरियारों की टोलियां घूमना शुरू करती हैं। बड़ा गांव होने के कारण यह टोलियां गांव में घर-घर पांच दिन तक घूमती हैं। पांचवें दिन हुरियारों की टोली पंचमी शाम होलिका स्थान पर पहुंचकर समाप्त होती है और इस रात गांव के लोग एक दूसरे के घर जाकर प्रेम से गले सिकवे मिटाकर गले मिलते हैं। छोटे लोग बड़ों के पैर छूकर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। इस दौरान जुहारी कार्यक्रम भी चलता रहता है।
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25 लोगों की मौत के बाद भी निकली हुरियारों की टोली
मैनपुरी। वर्ष 2012 में गांव पर बड़ा संकट आया था। सात फरवरी 2012 लगुन ले जा रही बस सड़क हादसे का शिकार हुई। इस दुर्घटना में 25 लोगों की मौत हुई। जिसमें गांव के 22 लोग शामिल थे। होली से ठीक पहले गांव के 22 लोगों की मौत एक बड़ा सदमा था। इस दौरान इस पुरानी परंपरा टूटने का संकट खड़ा हुआ, लेकिन जिन घरों के लोग इस हादसे में मौत का शिकार हुए थे। उन घरों के लोग आगे आए। उन्होंने कहा कि हम अपनी पुरानी परंपरा नहीं तोड़ेंगे। उन लोगाें की सहमति के बाद गांव की यह पुरानी परंपरा 2012 में भी जारी रही।