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लड्डू गोपाल की पोशाक तैयार कर रहा मुस्लिम परिवार
Updated Wed, 29 Aug 2018 12:07 AM IST
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पोशाक तैयार करते मुश्लिम
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मथुरा। आकर्षक पोशाक और सिर पर सजा शृंगारित मुकुट, होठों को छूती जरी की बांसुरी व गले में मोतियों का हार। जन्माष्टमी पर कान्हा का यह रूप घर-घर में दिखाई देगा। कान्हा की साज-सज्जा में इस समय मुस्लिम समुदाय के जमील, फारूख, शाहरुख, पप्पू, लईक, विक्की, राजू आदि के पूरा परिवार दिन रात-जुटा हुआ है।
शहर के डीग गेट, मटिया गेट, राजाधिराज बाजार, नारायनदास टंकी, भार्गव गली, छत्ता बाजार आदि के अलावा वृंदावन के विभिन्न क्षेत्रों में करीब 70-80 कारखाने संचालित है। जन्माष्टमी पर जन्म लेते ही घर-घर में लड्डू गोपाल जो पोशाक व शृंगार धारण करेंगे, उसे बनाने का कार्य मुस्लिम समुदाय के हजारों कारीगर कर रहे है।
निर्माता शाहरुख ने बताया कि उनका परिवार 30 वर्ष से इस व्यवसाय से जुड़ा है। पर्व से एक माह पूर्व ही वृंदावन से कच्चा माल मंगा लिया जाता है। कारीगर जब बाहर जाते हैं और कोई उनसे पूछता है कि उनका व्यवसाय क्या है तो वे गर्व से कहते हैं कि कान्हा की पोशाक बनाते हैं।
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देश के विभिन्न हिस्सों में होती है सप्लाई
मथुरा के कारखानों में बने पोशाक, मुकुट व श्रृंगार के आइटमों की दिल्ली, मुंबई, आगरा, नाथद्वारा, जयपुर, कलकत्ता, इंदौर आदि शहरों में सप्लाई होती है। अगस्त के महीने से शुरू होकर यह व्यवसाय दीपावली के खत्म होने तक जारी रहता है। सभी आइटमों को थोक में 6 हजार से लेकर 8 हजार रुपये प्रति किलो के हिसाब से बेचा जाता है।
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शहर के डीग गेट, मटिया गेट, राजाधिराज बाजार, नारायनदास टंकी, भार्गव गली, छत्ता बाजार आदि के अलावा वृंदावन के विभिन्न क्षेत्रों में करीब 70-80 कारखाने संचालित है। जन्माष्टमी पर जन्म लेते ही घर-घर में लड्डू गोपाल जो पोशाक व शृंगार धारण करेंगे, उसे बनाने का कार्य मुस्लिम समुदाय के हजारों कारीगर कर रहे है।
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निर्माता शाहरुख ने बताया कि उनका परिवार 30 वर्ष से इस व्यवसाय से जुड़ा है। पर्व से एक माह पूर्व ही वृंदावन से कच्चा माल मंगा लिया जाता है। कारीगर जब बाहर जाते हैं और कोई उनसे पूछता है कि उनका व्यवसाय क्या है तो वे गर्व से कहते हैं कि कान्हा की पोशाक बनाते हैं।
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मथुरा के कारखानों में बने पोशाक, मुकुट व श्रृंगार के आइटमों की दिल्ली, मुंबई, आगरा, नाथद्वारा, जयपुर, कलकत्ता, इंदौर आदि शहरों में सप्लाई होती है। अगस्त के महीने से शुरू होकर यह व्यवसाय दीपावली के खत्म होने तक जारी रहता है। सभी आइटमों को थोक में 6 हजार से लेकर 8 हजार रुपये प्रति किलो के हिसाब से बेचा जाता है।