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कई मुस्लिम पीढ़ियों से कर रहे गंगाजली का निर्माण
Updated Sun, 04 Feb 2018 10:49 PM IST
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प्रभाकर पाराशरी
सोरों।
कादरवाड़ी के मुस्लिम परिवार कांवड़ों में रखी जाने वाली गंगाजली को तैयार करते हैं। ये मुस्लिम कई पीढ़ियों से कावड़ मेले के लिए गंगाजली को तैयार करते आ रहे हैं।
गांव कादरवाड़ी में तीन भट्ठियों पर ही गंगाजली बनाने का काम चल रहा है। कारीगर कांच को आग में तपाकर सांचों की सहायता से गंगाजली का आकार देते हैं। हर रोज 16 घंटे तक काम करने वाले कारीगरों को इतना मुनाफा नहीं होता कि वे अपने परिवार चला सकें।
यह काम सीजनल होता है जो दिवाली बाद शुरू होता और फाल्गुन मास में महाशिवरात्रि तक केवल तीन महीने ही चलता है। गंगाजली के लिए कांच फिरोजाबाद से मंगाया जाता है। ईधन के लिए कोयले व लकड़ी का इस्तेमाल करते हैं।
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धधकती आग के बीच काम करने वाले कारीगरों को सांस की बीमारी व अन्य त्वचा संबंधी रोग घेरे रहते हैं। कारीगर एक दिन में 300 गंगाजली तैयार कर पाता है। जिनको बेचकर 250 रुपये हर दिन की कमाई होती है। गंगाजली को सोरों के अलावा कछला, राजघाट से भी आकर व्यापारी खरीद ले जाते हैं। साल के बाकी 9 महीने यह कारीगर दूसरे के खेतों में मजदूरी या बाहर जाकर अन्य कार्य कर अपने परिवार का भरण पोषण करते हैं।
गंगाजली का निर्माण करने वाले 50 वर्षीय कारीगर हनीफ का कहना है कि उसके परिवार में गंगाजली निर्माण का काम तीन पीढ़ियों से हो रहा है। उसके पास दो बीघा जमीन है पानी का इंतजाम न होने के कारण बेकार पड़ी है। कारीगर जाबुद्दीन (32) का कहना है कि उसके पास कोई जमीन नहीं है।
पांच पीढ़ियों से उसके परिवार में यह काम हो रहा है। नूर मोहम्मद (30) का कहना है कि इस काम से गुजर बसर मुश्किल से होता है। कारीगर इमरान का कहना है कि गंगाजली निर्माण के लिए रामघाट भी काम करने चले जाते हैं।
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सोरों।
कादरवाड़ी के मुस्लिम परिवार कांवड़ों में रखी जाने वाली गंगाजली को तैयार करते हैं। ये मुस्लिम कई पीढ़ियों से कावड़ मेले के लिए गंगाजली को तैयार करते आ रहे हैं।
गांव कादरवाड़ी में तीन भट्ठियों पर ही गंगाजली बनाने का काम चल रहा है। कारीगर कांच को आग में तपाकर सांचों की सहायता से गंगाजली का आकार देते हैं। हर रोज 16 घंटे तक काम करने वाले कारीगरों को इतना मुनाफा नहीं होता कि वे अपने परिवार चला सकें।
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यह काम सीजनल होता है जो दिवाली बाद शुरू होता और फाल्गुन मास में महाशिवरात्रि तक केवल तीन महीने ही चलता है। गंगाजली के लिए कांच फिरोजाबाद से मंगाया जाता है। ईधन के लिए कोयले व लकड़ी का इस्तेमाल करते हैं।
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धधकती आग के बीच काम करने वाले कारीगरों को सांस की बीमारी व अन्य त्वचा संबंधी रोग घेरे रहते हैं। कारीगर एक दिन में 300 गंगाजली तैयार कर पाता है। जिनको बेचकर 250 रुपये हर दिन की कमाई होती है। गंगाजली को सोरों के अलावा कछला, राजघाट से भी आकर व्यापारी खरीद ले जाते हैं। साल के बाकी 9 महीने यह कारीगर दूसरे के खेतों में मजदूरी या बाहर जाकर अन्य कार्य कर अपने परिवार का भरण पोषण करते हैं।
गंगाजली का निर्माण करने वाले 50 वर्षीय कारीगर हनीफ का कहना है कि उसके परिवार में गंगाजली निर्माण का काम तीन पीढ़ियों से हो रहा है। उसके पास दो बीघा जमीन है पानी का इंतजाम न होने के कारण बेकार पड़ी है। कारीगर जाबुद्दीन (32) का कहना है कि उसके पास कोई जमीन नहीं है।
पांच पीढ़ियों से उसके परिवार में यह काम हो रहा है। नूर मोहम्मद (30) का कहना है कि इस काम से गुजर बसर मुश्किल से होता है। कारीगर इमरान का कहना है कि गंगाजली निर्माण के लिए रामघाट भी काम करने चले जाते हैं।