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हर आरे से आई हुसैन की सदा
Updated Mon, 25 Sep 2017 12:14 AM IST
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जुलूस-ए-ताजिया
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मैनपुरी। हजरत इमाम हुसैन की याद में मुहर्रम की तीसरी तारीख को भी शहर के प्रमुख मार्गों से अलम और चौकियों का जुलूस निकाला गया।
जुलूस में शामिल बैंड और मुस्लिम समाज के लोग मातम मनाते हुए चल रहे थे। इमामबाड़ा से शुरू हुआ अलम और चौकियों का जुलूस प्रमुख मार्गों से होता हुआ देर रात वापस इमामबाड़ा पहुंचकर समाप्त हुआ।
शनिवार को अलमों को निकालने वाले अली का लश्कर या हुसैन जैसे नारे लगा रहे थे। शाम छह बजे इमामबाड़ा से शुरू हुआ अलम और चौकियों का गश्त बड़े चौराहे पर पहुंचा। यहां युवकों ने अखाड़ा किया और हैरतअंगेज करतबों का प्रदर्शन किया।
जुलूस शहर के कचहरी रोड, लेनगंज, बजाजा बाजार, गुलाब बाग, मोहल्ला दरीबा, महमूद नगर, जुलाहपुरी से होता हुआ देर रात वापस इमामबाड़ा पहुंचकर समाप्त हुआ। जुलूस में शामिल कई लोग इमाम हुसैन की याद में मातम मनाते हुए चल रहे थे। बैंड कलाकार मातमी धुन बजा रहे थे। वहीं देर शाम इमामबाड़े में मजलिस का आयोजन किया गया। इसमें बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे।
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मैनपुरी। मुहर्रम महीने के 10वें दिन को आशुरा कहते हैं। आशुरा के दिन हजरत रसूल के नवासे हजरत इमाम हुसैन को और उनके बेटे घरवाले और उनके परिवार वालों के साथ करबला के मैदान में शहीद कर दिया गया था।
यह बातें बड़ी खानकाह के सज्जादानशीं अब्दुल रहमान चिश्ती उर्फ बबलू मियां ने मजलिस के दौरान कहीं।
मजलिस में उन्होंने कहा कि मुहर्रम इस्लाम धर्म में विश्वास करने वाले लोगों का एक प्रमुख त्योहार है। इस माह की बहुत विशेषता और महत्व है। सन् 680 में इसी माह में कर्बला नामक स्थान मे एक धर्म युद्ध हुआ था। जो पैगंबर हजरत मोहम्म्द साहब के नाती और यजीद (पुत्र माविया पुत्र अबुसुफियान पुत्र उमैया) के बीच हुआ। इस में वास्तविक जीत हजरत इमाम हुसैन की हुई। इसमें यजीद के कमांडर ने हज़रत इमाम हुसैन और उनके सभी 72 परिवारवालो को शहीद कर दिया था।
इसमें उनके छह माह के पुत्र हजरत अली असगर भी शामिल थे। तभी से दुनिया के मुसलमान इस महीने में इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत का गम मनाते हैं। आशूरे के दिन यानी 10 मुहर्रम को ही यह घटना हुई थी। इमाम और उनकी शहादत के बाद सिर्फ उनके एक पुत्र हजरत इमाम जै़नुलाबेदीन, जो कि बीमारी के कारण युद्ध में भाग न ले सके थे बचे थे। दुनिया में अपने बच्चों का नाम हज़रत हुसैन और उनके शहीद साथियों के नाम पर रखने वाले अरबों मुसलमान हैं। इमाम हुसैन की औलादें जो सादात कहलाती हैं। दुनियाभर में फैली हुई हैं। जो इमाम जेनुलाबेदीन के वंशज हैं।
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जुलूस में शामिल बैंड और मुस्लिम समाज के लोग मातम मनाते हुए चल रहे थे। इमामबाड़ा से शुरू हुआ अलम और चौकियों का जुलूस प्रमुख मार्गों से होता हुआ देर रात वापस इमामबाड़ा पहुंचकर समाप्त हुआ।
शनिवार को अलमों को निकालने वाले अली का लश्कर या हुसैन जैसे नारे लगा रहे थे। शाम छह बजे इमामबाड़ा से शुरू हुआ अलम और चौकियों का गश्त बड़े चौराहे पर पहुंचा। यहां युवकों ने अखाड़ा किया और हैरतअंगेज करतबों का प्रदर्शन किया।
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जुलूस शहर के कचहरी रोड, लेनगंज, बजाजा बाजार, गुलाब बाग, मोहल्ला दरीबा, महमूद नगर, जुलाहपुरी से होता हुआ देर रात वापस इमामबाड़ा पहुंचकर समाप्त हुआ। जुलूस में शामिल कई लोग इमाम हुसैन की याद में मातम मनाते हुए चल रहे थे। बैंड कलाकार मातमी धुन बजा रहे थे। वहीं देर शाम इमामबाड़े में मजलिस का आयोजन किया गया। इसमें बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे।
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मैनपुरी। मुहर्रम महीने के 10वें दिन को आशुरा कहते हैं। आशुरा के दिन हजरत रसूल के नवासे हजरत इमाम हुसैन को और उनके बेटे घरवाले और उनके परिवार वालों के साथ करबला के मैदान में शहीद कर दिया गया था।
यह बातें बड़ी खानकाह के सज्जादानशीं अब्दुल रहमान चिश्ती उर्फ बबलू मियां ने मजलिस के दौरान कहीं।
मजलिस में उन्होंने कहा कि मुहर्रम इस्लाम धर्म में विश्वास करने वाले लोगों का एक प्रमुख त्योहार है। इस माह की बहुत विशेषता और महत्व है। सन् 680 में इसी माह में कर्बला नामक स्थान मे एक धर्म युद्ध हुआ था। जो पैगंबर हजरत मोहम्म्द साहब के नाती और यजीद (पुत्र माविया पुत्र अबुसुफियान पुत्र उमैया) के बीच हुआ। इस में वास्तविक जीत हजरत इमाम हुसैन की हुई। इसमें यजीद के कमांडर ने हज़रत इमाम हुसैन और उनके सभी 72 परिवारवालो को शहीद कर दिया था।
इसमें उनके छह माह के पुत्र हजरत अली असगर भी शामिल थे। तभी से दुनिया के मुसलमान इस महीने में इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत का गम मनाते हैं। आशूरे के दिन यानी 10 मुहर्रम को ही यह घटना हुई थी। इमाम और उनकी शहादत के बाद सिर्फ उनके एक पुत्र हजरत इमाम जै़नुलाबेदीन, जो कि बीमारी के कारण युद्ध में भाग न ले सके थे बचे थे। दुनिया में अपने बच्चों का नाम हज़रत हुसैन और उनके शहीद साथियों के नाम पर रखने वाले अरबों मुसलमान हैं। इमाम हुसैन की औलादें जो सादात कहलाती हैं। दुनियाभर में फैली हुई हैं। जो इमाम जेनुलाबेदीन के वंशज हैं।