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Shakambhari Navratri 2025: 07 जनवरी से शाकंभरी देवी नवरात्रि प्रारंभ, जानिए महत्व, पूजाविधि और कथा
Tue, 07 Jan 2025 11:17 AM IST
विनोद शुक्ला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Tue, 07 Jan 2025 11:17 AM IST
सार
Shakambhari Navratri 2025: शाकंभरी नवरात्रि विशेष रूप से राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और मध्य प्रदेश में धूमधाम से मनाया जाता है। यह पर्व प्रकृति और उसके उपहारों के प्रति आभार व्यक्त करने का प्रतीक है।
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देवी शाकंभरी को प्रकृति, अन्न और वनस्पतियों की देवी माना जाता है।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
Shakambhari Navratri 2025: शाकंभरी नवरात्रि देवी शाकंभरी को समर्पित एक विशेष पर्व है, जिसे पौष मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी से पूर्णिमा तक मनाया जाता है। इस बार शाकम्भरी नवरात्रि पर्व 7 जनवरी 2025 से प्रारंभ होकर 13 जनवरी 2025 तक रहेगा। अष्टमी तिथि का प्रारम्भ 6 जनवरी 2025 को शाम 06:23 बजे से होगा और इसकी समाप्ति 7 जनवरी 2025 को शाम 04:26 बजे होगी। देवी शाकंभरी को प्रकृति, अन्न और वनस्पतियों की देवी माना जाता है। मान्यता है कि देवी ने एक भयंकर अकाल के समय संसार को अन्न, जल और सब्जियों का वरदान देकर जीवन को पुनर्जीवित किया। शाकंभरी नवरात्रि विशेष रूप से राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और मध्य प्रदेश में धूमधाम से मनाया जाता है। यह पर्व प्रकृति और उसके उपहारों के प्रति आभार व्यक्त करने का प्रतीक है।
महत्व
देवी शाकंभरी को अन्नपूर्णा का रूप माना जाता है, जो भुखमरी और अकाल से मुक्ति दिलाती हैं। उनकी पूजा से न केवल जीवन में सुख-समृद्धि आती है, बल्कि आध्यात्मिक शांति और संतुलन भी प्राप्त होता है। यह पर्व किसानों और कृषि से जुड़े लोगों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह फसलों की समृद्धि और बेहतर उत्पादन का प्रतीक है। देवी शाकंभरी की कृपा से कृषि भूमि उपजाऊ होती है और पर्यावरण में संतुलन बना रहता है। नवरात्रि के दौरान व्रत रखने और मंत्रों का जाप करने से आत्मा की शुद्धि होती है और मानसिक शांति प्राप्त होती है।
पूजा विधि
नवरात्रि के पहले दिन घर और पूजा स्थल की सफाई की जाती है, जिससे वातावरण पवित्र हो सके। पवित्र स्थान पर कलश की स्थापना की जाती है। कलश को आम के पत्तों और नारियल से सजाकर जल से भर दिया जाता है। इसके बाद देवी शाकंभरी की प्रतिमा या चित्र को लाल वस्त्र पर स्थापित किया जाता है। पूरे नवरात्रि के दौरान श्रद्धालु व्रत रखते हैं और देवी के विशेष स्तोत्र जैसे शाकंभरी अष्टक, दुर्गा सप्तशती या देवी महात्म्य का पाठ करते हैं। देवी को हरी सब्जियां, फल, अनाज और दूध का भोग चढ़ाया जाता है, जो उनकी कृपा और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करता है। प्रतिदिन दीप जलाकर देवी की आरती की जाती है, और उन्हें पुष्प अर्पित किए जाते हैं। नवरात्र के अंतिम दिन विशेष हवन का आयोजन होता है, जिसमें देवी का आह्वान कर उनसे कृपा और आशीर्वाद मांगा जाता है। पूजा के समापन पर कलश का विसर्जन किया जाता है।
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पुराणों के अनुसार, एक समय पृथ्वी पर भयंकर अकाल पड़ा। प्राणियों का जीवन संकट में था। तब देवी शाकंभरी ने प्रकट होकर वनस्पतियों, फलों और सब्जियों का निर्माण किया और संसार को अन्न और जल से परिपूर्ण किया। इसी कारण उन्हें शाकंभरी देवी कहा गया। उनकी कृपा से धरती पर हरियाली लौटी और जीवन पुनः संचालित हुआ।
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महत्व
देवी शाकंभरी को अन्नपूर्णा का रूप माना जाता है, जो भुखमरी और अकाल से मुक्ति दिलाती हैं। उनकी पूजा से न केवल जीवन में सुख-समृद्धि आती है, बल्कि आध्यात्मिक शांति और संतुलन भी प्राप्त होता है। यह पर्व किसानों और कृषि से जुड़े लोगों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह फसलों की समृद्धि और बेहतर उत्पादन का प्रतीक है। देवी शाकंभरी की कृपा से कृषि भूमि उपजाऊ होती है और पर्यावरण में संतुलन बना रहता है। नवरात्रि के दौरान व्रत रखने और मंत्रों का जाप करने से आत्मा की शुद्धि होती है और मानसिक शांति प्राप्त होती है।
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पूजा विधि
नवरात्रि के पहले दिन घर और पूजा स्थल की सफाई की जाती है, जिससे वातावरण पवित्र हो सके। पवित्र स्थान पर कलश की स्थापना की जाती है। कलश को आम के पत्तों और नारियल से सजाकर जल से भर दिया जाता है। इसके बाद देवी शाकंभरी की प्रतिमा या चित्र को लाल वस्त्र पर स्थापित किया जाता है। पूरे नवरात्रि के दौरान श्रद्धालु व्रत रखते हैं और देवी के विशेष स्तोत्र जैसे शाकंभरी अष्टक, दुर्गा सप्तशती या देवी महात्म्य का पाठ करते हैं। देवी को हरी सब्जियां, फल, अनाज और दूध का भोग चढ़ाया जाता है, जो उनकी कृपा और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करता है। प्रतिदिन दीप जलाकर देवी की आरती की जाती है, और उन्हें पुष्प अर्पित किए जाते हैं। नवरात्र के अंतिम दिन विशेष हवन का आयोजन होता है, जिसमें देवी का आह्वान कर उनसे कृपा और आशीर्वाद मांगा जाता है। पूजा के समापन पर कलश का विसर्जन किया जाता है।
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देवी शाकंभरी की कथापुराणों के अनुसार, एक समय पृथ्वी पर भयंकर अकाल पड़ा। प्राणियों का जीवन संकट में था। तब देवी शाकंभरी ने प्रकट होकर वनस्पतियों, फलों और सब्जियों का निर्माण किया और संसार को अन्न और जल से परिपूर्ण किया। इसी कारण उन्हें शाकंभरी देवी कहा गया। उनकी कृपा से धरती पर हरियाली लौटी और जीवन पुनः संचालित हुआ।
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