विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस: हिमाचल में रोज 1000 से 1200 मरीज ले रहे मनोरोग उपचार, आंकड़ों में खुलासा
मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी इन समस्याओं के उपचार के लिए बड़ी संख्या में लोग अस्पतालों का रुख कर रहे हैं। प्रदेश में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति फोन (टेली-मानस) से सलाह लेने वालों का आंकड़ा पिछले तीन वर्षों में करीब 50 फीसदी तक बढ़ गया है।
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रातभर करवटें बदलना, मन में अनजाना डर, छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़ापन और हर वक्त बेचैनी महसूस होना। किसी की नींद गायब है, तो कोई तनाव और चिंता से परेशान है। मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी इन समस्याओं के उपचार के लिए बड़ी संख्या में लोग अस्पतालों का रुख कर रहे हैं। प्रदेश में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति फोन (टेली-मानस) से सलाह लेने वालों का आंकड़ा पिछले तीन वर्षों में करीब 50 फीसदी तक बढ़ गया है। इस वर्ष 25 फरवरी तक ही टेली मानस सेवा के माध्यम से 1433 लोग मानसिक स्वास्थ्य संबंधित सलाह ले चुके हैं। वर्ष 2023 में 483, 2024 में 3363, 2025 में 5070 लोगों ने टेली मेडिसिन से मानसिक स्वास्थ्य का उपचार लिया है। इसके अलावा प्रदेश में अलग-अलग मेडिकल कॉलेजों में मनोचिकित्सा की ओपीडी भी बढ़ गई है। प्रदेश में मेडिकल कॉलेजों की मनोचिकित्सा ओपीडी में रोजाना करीब 1000 से 1200 मरीज पहुंच रहे हैं। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक में सामने आ रही मानसिक स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां स्वास्थ्य विशेषज्ञों के लिए चिंता का विषय हैं। बदलती जीवनशैली, तनाव और नशे के सेवन के बाद होने वाले मनोविकार इस चुनौती को और गंभीर बना रहे हैं।
हर मेडिकल कॉलेज में रोजाना 200 मरीज पहुंच रहे
प्रदेश के हर मेडिकल कॉलेज में रोजाना 200 मरीज मनोचिकित्सा ओपीडी में उपचार के लिए पहुंच रहे हैं। इसमें नए मरीजों की संख्या ज्यादा है, जबकि कुछेक फॉलोअप के मामले भी रहते हैं। इसमें इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज एंव अस्पताल में 180 से 200 ओपीडी है। कांगड़ा स्थित डॉ. राजेंद्र प्रसाद राजकीय चिकित्सा महाविद्यालय टांडा में समेत नाहन, चंबा, हमीरपुर और नेरचौक मेडिकल कॉलेजों की मनोचिकित्सा ओपीडी भी इसी तरह से है। इसके अलावा पीजीआई, मोहाली समेत एमएमयू अस्पताल कुमारहट्टी में भी मरीज उपचार के लिए जाते हैं।
बच्चों को मोबाइल की लत, बड़ों को नौकरी और घर की चिंता
शांत वातावरण और सुखद जीवन के लिए पहचाने जाने वाले हिमाचल प्रदेश में भी मानसिक स्वास्थ्य चुनौतियां बन रहा है। बच्चों में मोबाइल की लत चिंता, घबराहट या बेचैनी (एंग्जायटी डिसऑर्डर) बढ़ा रही है। मोबाइल की लत से पीछा छुड़वाने के लिए बच्चे अस्पताल की ओपीडी में आ रहे हैं। वयस्कों में नौकरी, परिवार व आर्थिक जिम्मेदारियों का दबाव चिंता का कारण बन रहा है।
नशा बन रहा मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ने का बड़ा कारण
प्रदेश में नशे का बढ़ता चलन चिंता का विषय बना हुआ है। हालात यह है कि 15 आयु वर्ग के कई युवा भी सिंथेटिक नशे की चपेट में आ रहे हैं। नशे का सेवन शारीरिक स्वास्थ्य के साथ मानसिक स्थिति को भी प्रभावित कर रहा है।
केस स्टडी
आईजीएमसी की मनोचिकित्सा ओपीडी के बाहर बैठी एक युवती को रात में नींद नहीं आती। छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़ापन बढ़ गया है। वह कुछ समय से दवा ले रही है, लेकिन अभी पूरी तरह राहत नहीं मिली है। मोबाइल फोन देखने से परेशान बच्चे ने बताया कि वह रात को जागता था। अब मोबाइल देखने से चिड़चिड़ापन और गुस्सा बढ़ गया है। गुस्सा तीव्र आता है और चिंता को बढ़ाता है। पढ़ाई में मन तक नहीं लगता है।
विशेषज्ञ राय
आईजीएमसी के मनोचिकित्सा विभागाध्यक्ष डॉ. दिनेश के अनुसार बदलती जीवनशैली और दिनचर्या का असर मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। तनाव भी परेशानी बढ़ाने वाला अहम कारक है। कुछ मामलों में आनुवंशिक कारण भी भूमिका निभाते हैं। समय पर उपचार न मिलने से समस्या गंभीर हो सकती है। इसलिए लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। आईजीएमसी के सेवानिवृत्त प्राचार्य और मेडिसिन विशेषज्ञ डॉ. एलएस पॉल का कहना है कि लोगों के जीवन में तनाव बढ़ रहा है। जीवनशैली में बड़ा बदलाव आया है। बच्चों में मोबाइल फोन का अत्यधिक इस्तेमाल चिंता का विषय है।