ज्यादा पेंशन के चक्कर में बढ़ा ली हमारे विधायकों ने सैलरी
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यह अंदर की कहानी है। अगले साल के अंत तक कइयों के विधायकी के ये जलवे खत्म हो सकते हैं। 80 फीसदी विधायकों का दिल जानता है कि चार साल उन्होंने जनता के लिए क्या किया? वे चाहते थे अपना भविष्य महफूज कर लें। सत्ता और विपक्ष दोनों तरफ के कुछ नए विधायकों ने सरकार पर दबाव बनाया कि कम से कम गुजारा करने लायक पेंशन लग जाए।
अब तक उनकी पेंशन 22,000 रुपये बनती थी। वे चाहते थे - यह बढ़ाकर 45,000 रु. कर दी जाए। लेकिन इतनी पेंशन तो भारत सरकार के मुख्य सचिव की भी नहीं है। फिर पेंशन 40,000 रु. करने की बात हुई। इतनी पेंशन प्रदेश के मुख्य सचिव की भी नहीं बनती। अगर विधायकों की इतनी पेंशन लगा भी दी जाए तो एक पेच और था।
सेकेंड टाइमर विधायकों की पेंशन हर साल हजार रु. बढ़नी थी। आने वाले सालों में यह पेंशन मूल वेतन से कई गुना ज्यादा हो जाती। वित्त विभाग ने हाथ खड़े कर दिए कि ऐसा नहीं हो सकता। हम सबकी नौकरी जाएगी। फिर मंथन हुआ। और विधायकों की पेंशन 36,000 रुपये मासिक तय हुई। भत्ते जोड़ने के बाद यह पेंशन 78,000 रु. प्रतिमाह बनती है।
पेच फिर फंसा। इतनी पेंशन के लिए वेतन भी उसी अनुपात में होना चाहिए। और तब विधायकों का वेतन 30,000 से बढ़ाकर 55,000 करना पड़ा। राज्य के खजाने की चाबी खुद विधायकों के पास थी और उन्होंने झोली भर ली। अंतिम दिन अपनी तनख्वाह का बिल पास करने के बाद सब ने एक साथ मिल कर भारत माता का जयकारा लगाया।
चीफ जस्टिस, वीसी से भी ज्यादा सैलरी विधायकों की
लेकिन आप नहीं जानते कि सिर्फ ये नारा लगाने से आप देशभक्त नहीं हो जाते। असल देशभक्ति यह है कि आप निजी और क्षुद्र स्वार्थों से ऊपर उठकर लोकतंत्र में सर्वजन हिताए, सर्वजन सुखाए मंत्र को जमीन पर उतारिए। प्रदेश की जनता की चिंता यह है कि गरीब राज्य में एक विधायक की महीने की सवा दो लाख रुपये सैलरी बहुत ज्यादा है।
दुनिया में सिर्फ सिंगापुर ऐसा देश है जहां राजनेता की सैलरी सर्वाधिक है और देश में अब हिमाचल प्रदेश। इस धन को विकास कार्य में लगाया जाना चाहिए। इसके बजाए वह उन अस्थायी कर्मचारियों का मानदेय बढ़ाते जो 5,000 रु. महीने में अपने बच्चों का पेट पाल रहे हैं। इससे बड़ा सैद्धांतिक सवाल यह था कि पांच साल के लिए चुनाव जीतने वाले शख्स की सवा दो लाख रु. सैलरी क्यों होनी चाहिए?
आप इसी हिमाचल प्रदेश में विरोधाभास देखें। प्रदेश के उच्च संवैधानिक पद पर विराजमान हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की मासिक सैलरी सभी भत्ते मिलाकर करीब 1 लाख 50,000 रुपये है। प्रदेश में अफसरशाही के मुखिया यानी मुख्य सचिव का मासिक वेतन, सभी भत्ते मिलाकर करीब 1 लाख 75,000 रु. है। तमाम प्रोफेसरों और शिक्षकों के मुखिया और हिमाचल विश्वविद्यालय के कुलपति की तनख्वाह करीब 1 लाख 36,000 रु. है।
आप कल्पना कीजिए, इन तीनों पदों पर विराजमान महानुभाव कितने बरसों के अध्ययन, कितने सालों की सार्वजनिक सेवा, तपस्या और कठोर परिश्रम के बाद इस मुकाम पर पहुंचे होंगे। दूसरी तरफ हम अपनी विधानसभा के टॉप 10 युवा विधायकों में सिर्फ दो उदाहरण लेंगे। कांग्रेस के रेणुका जी से विधायक और कांगड़ा से निर्दलीय चुने गए विधायक सिर्फ बारहवीं पास हैं। इनकी उम्र अभी चालीस पार भी नहीं हुई। और ये 2 लाख 10,000 रु. मासिक वेतन के हकदार हो गए। ये कैसा लोकतंत्र है? यह कैसा न्याय है?
किसी भी विधायक ने नहीं किया विरोध
हमने अपनी शृंखला में हर रोज छापा कि इस विषय पर अगर कोई विधायक अपना पक्ष रखना चाहे तो सामने आए। लेकिन 68 वर्तमान विधायकों में से कोई सामने नहीं आया। यानी दिल ही दिल में वे भी जानते हैं कि जो हुआ वह गलत हुआ। यह जनभावनाओं के साथ खिलवाड़ है। एक विधायक ने अनौपचारिक बातचीत में जरूर स्वीकार किया कि इस मुहिम ने हमारे विधायक दोस्तों को जनता के सामने जाने लायक नहीं छोड़ा।
मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने बहुत तार्किक बयान दिया कि जब दिहाड़ी मजदूरों का मेहनताना बढ़ सकता है तो विधायकों का वेतन क्यों नहीं? और इसके बाद ही खबर आई कि सरकार ने पार्ट टाइम वर्करों की दिहाड़ी ढाई रुपये प्रति घंटा बढ़ा दी गई। यानी पहले उन्हें 22.50 रु. प्रति घंटे मिलते थे, अब उन्हें 25 रु. प्रति घंटे मिलेंगे। अब यह बताने की जरूरत नहीं कि किसी भी सरकार में दिहाड़ी मजदूरों की क्या हैसियत है?
यह हैसियत इसलिए है क्योंकि ये किसी की सरकार गिरा नहीं सकते। पर विधायक ऐसा कर सकते हैं। इसी तरह भाजपा नेता प्रेम कुमार धूमल की टिप्पणी थी कि - आते हुए पैसे किसे बुरे लगते हैं। फिर वे बोले- विधायकों का वेतन तय करने के लिए कमीशन बनना चाहिए। पता नहीं, यह सुनहरा ख्याल वेतन बढ़ाने से पहले किसी के दिमाग में क्यों नहीं आया। अब देखिए, नेता सदन और नेता विपक्ष दोनों एक भाषा बोल रहे हों तो आप किसी विधेयक या कानून पर पुनर्विचार की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?
तो लोक बनाम सेवक शृंखला में आपने पढ़ा कि कैसे खुद को लोक का सेवक कहने वाले मोटी तनख्वाह के अलावा दुनिया जहान की सुख सुविधाओं का मजा लूट रहे हैं। खुशी की बात यह कि इस अभियान में आम पब्लिक, अफसर, सरकारी कर्मचारी, पेंशनर्स, युवा आदि ने खुलकर सामने आए। हमारे सैकड़ों जागरूक पाठकों के रोजाना व्हाट्स एप संदेश हमारे पास आ रहे हैं जो विधायकों के इस सामूहिक फैसले का विरोध कर रहे हैं। हमने जब ये शृंखला शुरू की थी, तभी हमें पता था कि इस मुहिम का कोई अंतत: नतीजा नहीं निकलने वाला।
क्योंकि हमारे लोकतंत्र का ढांचा ही कुछ ऐसा है। एक बार जो आप उनके हाथ अपनी ताकत दे देते हैं तो उसे वापस लेने के लिए आपको कम से कम पांच साल इंतजार करना पड़ता है। इस शृंखला का मकसद आम जनता को सिर्फ जागरूक करना था कि वह अपना जनप्रतिनिधि सोच समझ कर चुनें। उन्हें पता होना चाहिए कि चुनाव के वक्त जो व्यक्ति आपके दरवाजे पर याची की तरह हाथ जोड़े खड़ा है, वह वाकई निरीह है। आप अपना कीमती वोट देकर अपनी संपूर्ण ताकत उसे सौंपने जा रहे हैं। जैसे शिव ने भस्मासुर को अपनी शक्ति देकर अपना ही दुश्मन बना लिया था।
इसलिए आप भोलेनाथ न बनिए। अगली दफा जब वे आपसे वोट मांगने आपके दरवाजे आएं तो आप उससे देवता की कसम उठवाइएगा कि अगली बार अगर विधानसभा में इस तरह का कोई जन विरोधी प्रस्ताव आए तो वह उसका विरोध करेगा। भले ही वह सदन में विरोध करने वाला अकेला एक विधायक होगा।