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Shimla News: चेक बाउंस मामले में दोषी को एक साल का कारावास
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दोषी ने लिया था दो लाख रुपये का ऋण
निगम को बतौर मुआवजा 1.57 लाख देने के आदेश
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। चेक बाउंस के एक मामले में अदालत ने दोषी की सजा बरकरार रखी है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश गौरव महाजन की अदालत ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए दोषी की अपील खारिज कर दी है।
अदालत ने जुब्बल निवासी दोषी गुलजार मोहम्मद को एक वर्ष के साधारण कारावास और हिमाचल प्रदेश अल्पसंख्यक वित्त एवं विकास निगम को 1,57,000 रुपये बतौर मुआवजा अदा करने के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, शिमला के आदेश को सही ठहराया है।मामले के अनुसार दोषी ने निगम से व्यावसायिक कार्य के लिए दो लाख रुपये का ऋण लिया था। इस देनदारी के भुगतान के लिए दोषी ने निगम को 1,10,900 रुपये का चेक जारी किया था। निगम ने जब इस चेक को बैंक में भुगतान के लिए लगाया तो वह बाउंस हो गया। इसके बाद निगम की ओर से 31 जनवरी 2022 को कानूनी नोटिस भेजा।
निर्धारित समय सीमा के भीतर राशि का भुगतान नहीं किए जाने पर निगम ने अदालत में शिकायत दर्ज करवाई। ट्रायल कोर्ट ने 24 मई 2025 को आरोपी को दोषी करार देते हुए सजा सुनाई थी। इस फैसले के खिलाफ दोषी ने सत्र अदालत में आपराधिक अपील दायर की थी। अपील में दोषी ने तर्क दिया कि उसने केवल सुरक्षा के तौर पर हस्ताक्षरित खाली चेक दिया था और उसे कानूनी नोटिस भी नहीं मिला था। अदालत ने बचाव पक्ष की दलीलों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि यदि चेक पर किए हस्ताक्षर सही हैं और चेक स्वेच्छा से सौंपा है तो कानून के तहत यह माना जाता है कि उसे वैध देनदारी के भुगतान के लिए जारी किया था। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि चेक बाउंस के बढ़ते मामलों को देखते हुए ऐसे वित्तीय लेनदेन में सख्ती जरूरी है।
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निगम को बतौर मुआवजा 1.57 लाख देने के आदेश
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। चेक बाउंस के एक मामले में अदालत ने दोषी की सजा बरकरार रखी है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश गौरव महाजन की अदालत ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए दोषी की अपील खारिज कर दी है।
अदालत ने जुब्बल निवासी दोषी गुलजार मोहम्मद को एक वर्ष के साधारण कारावास और हिमाचल प्रदेश अल्पसंख्यक वित्त एवं विकास निगम को 1,57,000 रुपये बतौर मुआवजा अदा करने के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, शिमला के आदेश को सही ठहराया है।मामले के अनुसार दोषी ने निगम से व्यावसायिक कार्य के लिए दो लाख रुपये का ऋण लिया था। इस देनदारी के भुगतान के लिए दोषी ने निगम को 1,10,900 रुपये का चेक जारी किया था। निगम ने जब इस चेक को बैंक में भुगतान के लिए लगाया तो वह बाउंस हो गया। इसके बाद निगम की ओर से 31 जनवरी 2022 को कानूनी नोटिस भेजा।
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निर्धारित समय सीमा के भीतर राशि का भुगतान नहीं किए जाने पर निगम ने अदालत में शिकायत दर्ज करवाई। ट्रायल कोर्ट ने 24 मई 2025 को आरोपी को दोषी करार देते हुए सजा सुनाई थी। इस फैसले के खिलाफ दोषी ने सत्र अदालत में आपराधिक अपील दायर की थी। अपील में दोषी ने तर्क दिया कि उसने केवल सुरक्षा के तौर पर हस्ताक्षरित खाली चेक दिया था और उसे कानूनी नोटिस भी नहीं मिला था। अदालत ने बचाव पक्ष की दलीलों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि यदि चेक पर किए हस्ताक्षर सही हैं और चेक स्वेच्छा से सौंपा है तो कानून के तहत यह माना जाता है कि उसे वैध देनदारी के भुगतान के लिए जारी किया था। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि चेक बाउंस के बढ़ते मामलों को देखते हुए ऐसे वित्तीय लेनदेन में सख्ती जरूरी है।
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