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Shimla News: कैंसर मरीज के गले में फंसी एनजी ट्यूब बिना सर्जरी के निकाली
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-एक्सक्लूसिव
सुपर स्पेशलिटी अस्पताल चमियाना के चिकित्सकों ने मरीज को दी बड़ी राहत, मरीज की मांसपेशियों में फंस गई थी ट्यूब
एंडोस्कोपी और सीटी स्कैन की मदद से किया दुर्लभ उपचार
मरीज को फीडिंग के लिए सालों पहले लगाई थी एनजी ट्यूब
आदित्य सोफत
शिमला। अटल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल सुपर स्पेशलिटी (एआईएमएसएस) चमियाना में चिकित्सकों ने कैंसर से पीड़ित 61 वर्षीय मरीज के गले में फंसी नेसोगैस्ट्रिक (एनजी) ट्यूब को बिना ओपन सर्जरी के सुरक्षित निकालने में सफलता हासिल की है।
मरीज को भोजन देने के लिए नाक के रास्ते डाली गई राइल्स ट्यूब गले की मांसपेशियों में फंस गई थी। एंडोस्कोपी और सीटी स्कैन की मदद से चिकित्सकों ने इस दुर्लभ और जटिल मामले का सफल उपचार किया। चिकित्सकों के अनुसार यह प्रदेश में सामने आया दुर्लभ मामला है। मामले का अध्ययन कर इसे शोध के रूप में प्रकाशित किया है। इसमें लंबे समय तक एनजी ट्यूब के इस्तेमाल से होने वाली ऐसी दुर्लभ जटिलताओं की ओर भी ध्यान दिलाया है। गेस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग के विशेषज्ञ डॉ. विशाल बोध, डॉ. अजय अहलूवालिया और डॉ. बृज शर्मा ने इस मामले पर शोध किया जो जुलाई में एशियन जर्नल ऑफ रिसर्च एंड रिपोर्ट्स इन गेस्ट्रोएंटरोलॉजी में प्रकाशित हुआ।
चिकित्सकों के अनुसार 61 वर्षीय मरीज को गले के कैंसर (एसोफैगल कार्सिनोमा) के उपचार के दौरान भोजन देने के लिए नाक के रास्ते एनजी ट्यूब (राइल्स ट्यूब) लगाई थी। रेडियोथैरेपी के बाद मरीज की हालत में सुधार हुआ और वह खुद खाना निगलने में सक्षम हो गया। इसके बाद ट्यूब को हटाने का प्रयास किया लेकिन सामान्य तरीके से खींचने पर ट्यूब बाहर नहीं आई और काफी रुकावट महसूस हुई। इस दौरान रक्तस्राव भी होने लगा। इसके बाद मरीज को गेस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग में रेफर किया गया। चिकित्सकों का कहना है कि ऐसे दुर्लभ और जटिल मामलों में मरीजों को पहले बड़े सुपर स्पेशलिटी संस्थानों जैसे एम्स और पीजीआई चंडीगढ़ रेफर किया जाता था। अब प्रदेश में ही अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधाओं और विशेषज्ञों की मदद से ऐसे जटिल मामलों का उपचार संभव हो रहा है।
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मांसपेशियों में 2.5 सेंटीमीटर तक धंस गई थी ट्यूब
ट्यूब मामले की गंभीरता को देखते हुए चिकित्सकों ने अपर जीआई एंडोस्कोपी और गर्दन का सीटी स्कैन करवाया। जांच में सामने आया कि एनजी ट्यूब का एक हिस्सा गले की दाहिनी दीवार की मांसपेशियों में करीब 2.5 सेंटीमीटर तक धंस गया था और नासोफैरिंक्स के पास मुड़ गया था। विशेषज्ञों की टीम ने एंडोस्कोपी के जरिये स्थिति पर नजर रखते हुए बेहद सावधानी से ट्यूब को बाहर निकाला। ट्यूब निकालने के बाद गले में मामूली अल्सर पाया गया जो बिना किसी अतिरिक्त सर्जरी या जटिलता के दवाइयों से ठीक हो गया।
कोट
बिना ओपन सर्जरी के ट्यूब निकाली
मरीज की स्थिति की समीक्षा करने के बाद बिना किसी बड़ी ओपन सर्जरी के ट्यूब निकालने की योजना बनाई गई। बेहद सावधानीपूर्वक एंडोस्कोपिक प्रक्रिया का उपयोग करते हुए फंसी हुई ट्यूब को बाहर निकाला गया जिससे मरीज के गले और आंतरिक अंगों को कोई नुकसान नहीं पहुंचा। उपचार के बाद मरीज की स्थिति में तेजी से सुधार देखा गया।
-डॉ. विशाल बोध, सह-प्राध्यापक, सुपर स्पेशलिटी अस्पताल चमियाना
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सुपर स्पेशलिटी अस्पताल चमियाना के चिकित्सकों ने मरीज को दी बड़ी राहत, मरीज की मांसपेशियों में फंस गई थी ट्यूब
एंडोस्कोपी और सीटी स्कैन की मदद से किया दुर्लभ उपचार
मरीज को फीडिंग के लिए सालों पहले लगाई थी एनजी ट्यूब
आदित्य सोफत
शिमला। अटल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल सुपर स्पेशलिटी (एआईएमएसएस) चमियाना में चिकित्सकों ने कैंसर से पीड़ित 61 वर्षीय मरीज के गले में फंसी नेसोगैस्ट्रिक (एनजी) ट्यूब को बिना ओपन सर्जरी के सुरक्षित निकालने में सफलता हासिल की है।
मरीज को भोजन देने के लिए नाक के रास्ते डाली गई राइल्स ट्यूब गले की मांसपेशियों में फंस गई थी। एंडोस्कोपी और सीटी स्कैन की मदद से चिकित्सकों ने इस दुर्लभ और जटिल मामले का सफल उपचार किया। चिकित्सकों के अनुसार यह प्रदेश में सामने आया दुर्लभ मामला है। मामले का अध्ययन कर इसे शोध के रूप में प्रकाशित किया है। इसमें लंबे समय तक एनजी ट्यूब के इस्तेमाल से होने वाली ऐसी दुर्लभ जटिलताओं की ओर भी ध्यान दिलाया है। गेस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग के विशेषज्ञ डॉ. विशाल बोध, डॉ. अजय अहलूवालिया और डॉ. बृज शर्मा ने इस मामले पर शोध किया जो जुलाई में एशियन जर्नल ऑफ रिसर्च एंड रिपोर्ट्स इन गेस्ट्रोएंटरोलॉजी में प्रकाशित हुआ।
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चिकित्सकों के अनुसार 61 वर्षीय मरीज को गले के कैंसर (एसोफैगल कार्सिनोमा) के उपचार के दौरान भोजन देने के लिए नाक के रास्ते एनजी ट्यूब (राइल्स ट्यूब) लगाई थी। रेडियोथैरेपी के बाद मरीज की हालत में सुधार हुआ और वह खुद खाना निगलने में सक्षम हो गया। इसके बाद ट्यूब को हटाने का प्रयास किया लेकिन सामान्य तरीके से खींचने पर ट्यूब बाहर नहीं आई और काफी रुकावट महसूस हुई। इस दौरान रक्तस्राव भी होने लगा। इसके बाद मरीज को गेस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग में रेफर किया गया। चिकित्सकों का कहना है कि ऐसे दुर्लभ और जटिल मामलों में मरीजों को पहले बड़े सुपर स्पेशलिटी संस्थानों जैसे एम्स और पीजीआई चंडीगढ़ रेफर किया जाता था। अब प्रदेश में ही अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधाओं और विशेषज्ञों की मदद से ऐसे जटिल मामलों का उपचार संभव हो रहा है।
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मांसपेशियों में 2.5 सेंटीमीटर तक धंस गई थी ट्यूब
ट्यूब मामले की गंभीरता को देखते हुए चिकित्सकों ने अपर जीआई एंडोस्कोपी और गर्दन का सीटी स्कैन करवाया। जांच में सामने आया कि एनजी ट्यूब का एक हिस्सा गले की दाहिनी दीवार की मांसपेशियों में करीब 2.5 सेंटीमीटर तक धंस गया था और नासोफैरिंक्स के पास मुड़ गया था। विशेषज्ञों की टीम ने एंडोस्कोपी के जरिये स्थिति पर नजर रखते हुए बेहद सावधानी से ट्यूब को बाहर निकाला। ट्यूब निकालने के बाद गले में मामूली अल्सर पाया गया जो बिना किसी अतिरिक्त सर्जरी या जटिलता के दवाइयों से ठीक हो गया।
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बिना ओपन सर्जरी के ट्यूब निकाली
मरीज की स्थिति की समीक्षा करने के बाद बिना किसी बड़ी ओपन सर्जरी के ट्यूब निकालने की योजना बनाई गई। बेहद सावधानीपूर्वक एंडोस्कोपिक प्रक्रिया का उपयोग करते हुए फंसी हुई ट्यूब को बाहर निकाला गया जिससे मरीज के गले और आंतरिक अंगों को कोई नुकसान नहीं पहुंचा। उपचार के बाद मरीज की स्थिति में तेजी से सुधार देखा गया।
-डॉ. विशाल बोध, सह-प्राध्यापक, सुपर स्पेशलिटी अस्पताल चमियाना