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हेरिटेज ट्रैक पर चलती ट्रेन में कविता का पाठ कर अटल को दी श्रद्धांजलि

Mon, 20 Aug 2018 01:06 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शिमला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शिमला Updated Mon, 20 Aug 2018 01:06 PM IST
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Kavi sammelan in Train on kalka shimla rail track

...जूझने का मेरा इरादा न था, मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था, रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई, यूं लगा जिंदगी से बड़ी हो गई। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की कविता ‘मौत से ठन गई,’ की इन पंक्तियों के साथ हिमाचल के साहित्यकार सुदर्शन वशिष्ठ ने संस्मरण की शुरुआत की। मौका था पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को श्रद्धांजलि देने और बाबा भलखू के प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए चलती ट्रेन में आयोजित साहित्यिक गोष्ठी का।

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वशिष्ठ ने बताया कि जून 2002 में मनाली में आयोजित कवि सम्मेलन में अटल जी ने कविता पाठ के दौरान काल और मृत्यु पर अधिकतर कविताएं सुनाईं। उन्होंने बताया कि ‘मौत से ठन गई,’ कविता उन्होंने अस्पताल में लिखी थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उस समय हिमाचल प्रभारी थे और वो भी इस कवि सम्मेलन में मौजूद थे।
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अटल जी के मंच से उतरते ही मोदी मंच पर चढ़े और कहा कि यह कविता उन्होंने ‘धर्मयुग पत्रिका’ में पढ़ी थी और इसे पढ़ने के बाद दो दिन तक रोते रहे थे। उन्होंने कहा था कि अटल जी के मुंह से मौत की बात अच्छी नहीं लगती। बाद में मोदी ने यह कविता गुजराती में भी अनुवादित की। कार्यक्रम के आयोजक एसआर हरनोट, विनोद प्रकाश गुप्ता और सुमित राज वशिष्ट ने बताया कि सुबह 10:40 बजे ट्रेन शिमला से बड़ोग की ओर रवाना हुई।
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रास्ते में जितने बड़े रेलवे स्टेशन आए, उनके नाम से ही सत्र आयोजित किए गए। बड़ोग में दोपहर का भोजन करने के बाद करीब ढाई बजे साहित्यकार वापस लौटे और शाम साढ़े पांच बजे शिमला पहुंच गए। साहित्यकारों ने इस कार्यक्रम में आम लोगों से केरल के बाढ़ पीड़ितों की मदद का भी आह्वान किया है।

गोष्ठी के दौरान सुनाई गईं कविताएं, गजलों का भी दौर चला

Kavi sammelan in Train on kalka shimla rail track

साहित्यिक गोष्ठी में मीनाक्षी पॉल ने कविता कवि अटल के नाम और बाबा भलखू, अश्वनी कुमार ने वाणी विराम न लेती, दिनेश शर्मा ने चार फुट का चिरानी, डा. अनुराग विजयवर्गीय ने हम तुम क्या कर सकते हैं, वो ही है करने वाला, निर्मला चंदेल ने चलती का नाम गाड़ी, पौमिला ठाकुर ने पहाड़ी कविता सुनाई।

अंजलि दीवान ने यादें, गुप्तेश्वर नाथ उपाध्याय ने जो करना था वही किया, सतीश रतन ने गजल जो देखी वो बात लिखेंगे, डा. हेमराज कौशिक ने गांव की अनुगूंज, राकेश कुमार सिंह ने नजम न पास आने का मतलब न वो लफ्ज ए दूरी समझते हैं।

 

उमा ठाकुर ने खाली निगाहें, कल्पना गांगटा ने मां, पुष्प, बेटियां, वंदना राणा ने गजल अलफाज भले साथ नहीं देते प्रस्तुत की। इसके अलावा हेमराज कौशिक, सतीश रतन, कुलराजीव पंत, आत्मा रंजन, विद्यानिधि, सीताराम शर्मा, प्रियंबदा शर्मा, कौशल मुंगटा, शांति स्वरूप शर्मा, वंदना भागड़ा, रितांजलि हस्तीर और निर्मल चंदेल ने भी प्रस्तुति दी।

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