कुल्लू दशहरा: सबसे पहली मणिकर्ण में रखी थी भगवान रघुनाथ की प्रतिमा
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अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा में हर साल जिले से सैकड़ों देवी-देवता आते हैं। ढालपुर मैदान में हर वर्ष देव परंपरा के साथ दशहरा उत्सव मनाया जाता है। बताया जाता है कि भगवान रघुनाथ की प्रतिमा को सबसे पहले धार्मिक नगरी मणिकर्ण में रखा गया था। 1651 में भगवान रघुनाथ, सीता और हनुमान की मूर्तियों को अयोध्या से दामोदर दास लाए थे। इन्हें राजा के आदेश पर धार्मिक तीर्थ स्थल मणिकर्ण में रखा गया था।
कहा जाता है कि दशहरा उत्सव का पहला आयोजन मणिकर्ण में हुआ था। वर्ष 1660 में तत्कालीन राजा जगत सिंह ने मूर्तियों को कुल्लू के सुल्तानपुर में रघुनाथ की नगरी में स्थापित किया था। अंतरराष्ट्रीय दशहरे का सफर 1970 में आरंभ हुआ था। वर्ष 1966 तक इसे राज्य स्तर का दर्जा था। सत्तर के दशक में अंतरराष्ट्रीय स्तर का दर्जा देने की घोषणा हुई, लेकिन लंबे समय तक अंतरराष्ट्रीय उत्सव के मानक पर खरा नहीं उतरने से 47 साल बाद यानी 2017 में इसे अंतरराष्ट्रीय उत्सव का दर्जा मिला।
दशहरा में 1971 में हुआ था गोलीकांड
वर्ष 1971 में कुल्लू दशहरा में गोलीकांड हुआ था। इस दौरान भगदड़ मच गई थी। श्यामा नाम के व्यक्ति गोली की चपेट में आने से मौत हो गई थी। इसके लोकगीत की पंक्तियां ओ मेरी गोलीएं ओ मेरी बंदूके हैं। गोलीकांड के कारण 1972-73 में कुल्लू दशहरा नहीं मनाया गया था।
वर्ष 1974 में तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. यशवंत सिंह ने इसे दोबारा शुरू किया। उसके बाद से दशहरा उत्सव मनाया जा रहा है। वन, परिवहन मंत्री एवं दशहरा कमेटी अध्यक्ष गोविंद सिंह ठाकुर ने कहा कि दशहरा उत्सव धार्मिक संस्कृति और व्यापारिक दृष्टि से विशेष महत्व रखता है। देश-विदेश के कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन लाल चंद कलाकेंद्र में करते हैं।