पढ़िए, रघुनाथ ने कैसे मिटाया राजा का ब्रह्महत्या दोष?
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कुल्लू दशहरा देव संस्कृति का अनूठा महासंगम है। अंतरराष्ट्रीय उत्सव के रूप में इसकी पहचान देश-विदेश में भी है। कुल्लू दशहरा 16वीं सदी में तत्कालीन राजा जगत सिंह के समय से शुरू हुआ।
किंवदंति के अनुसार भगवान रघुनाथ का आशीर्वाद लेने से तत्कालीन राजा का ब्रह्महत्या का दोष धुल गया था। राजा जगत सिंह को कुछ दरबारियों ने सूचना दी कि मणिकर्ण घाटी के गांव टिपरी के ब्राह्मण दुर्गादत्त के पास मोती है।
बहकावे में आकर राजा सैनिकों के साथ ब्राह्मण के घर पहुंचा और मोती मांगने लगा। गरीब ब्राह्मण के पास मोती नहीं था।
आग की भेंट चढ़ा ब्राह्मण परिवार
ब्राह्मण परिवार के बार बार मना करने के बाद भी राजा नहीं माना। इस पर जुल्म ढाने शुरू कर दिए। यातनाएं दी जाने लगी। आखिरकार राजा के जुल्म से तंग आकर ब्राह्मण दुर्गादत्त ने अपने घर को आग लगा दी।
इस आग में इसने खुद पूरे परिवार को अपने साथ अग्नि की भेंट कर दिया। इसका राजा को दोष लग गया। ब्रह्महत्या के फलस्वरूप राजा को भोजन में रक्त और कीड़े नजर आने लगे। इस समस्या के समाधान को राजदरबार में राज पुरोहित बुलाकर सुझाव मांगे।
राज पुरोहित कृष्णदास ने अपने शिष्य दामोदर दास को अयोध्या से रघुनाथ की मूर्ति लाने को कहा।
ऐसे दोषमुक्त हुआ राजा
दामोदर दास अयोध्या से मूर्ति आए और मूर्ति का स्नान वैदिक मंत्रों से किया। स्नान वाला जल राजा को पिलाया। तत्पश्चात राजा जगत सिंह को इस कष्ट से मुक्ति मिली। उन्होंने अपना राज्य भगवान रघुनाथ को सौंप दिया और स्वयं उनके छड़ीबरदार बनकर रहने लगे।
इस तरह कुल्लू दशहरे का शुभारंभ हुआ। उत्सव में आज 250 से ज्यादा देवी-देवता रघुनाथ के समक्ष हाजिरी भरने पहुंचते हैं। सात दिन तक ढालपुर मैदान में देवी-देवता अस्थाई तंबुओं में विराजमान होते हैं।
रघुनाथ की शोभायात्रा में सभी देवी-देवता पारंपरिक वाद्य यंत्रों की मंगल ध्वनि के साथ शरीक होते हैं। इस ऐतिहासिक अनूठे देव मिलन की झलक पाने को देश-विदेश से सैलानी पहुंचते हैं।