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पंचायत चुनाव मामला: हिमाचल हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची सुक्खू सरकार, जानें विस्तार से

Wed, 04 Feb 2026 01:29 PM IST
अंकेश डोगरा संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: अंकेश डोगरा Updated Wed, 04 Feb 2026 01:29 PM IST
सार

पंचायत चुनावों को लेकर हिमाचल सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है। राज्य सरकार ने स्पेशल लीव पिटीशन दायर की है। 

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Himachal Panchayat Elections Sukhu government approaches Supreme Court against High Court decision
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हिमाचल प्रदेश में 30 अप्रैल से पहले पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव करवाने के हाईकोर्ट के आदेश को राज्य सरकार ने सुप्रीम चुनौती दी है। इसके लिए स्पेशल लीव पिटीशन दायर की गई है। उच्चतम न्यायालय में चुनौती देने के लिए राज्य सरकार ने दो मुख्य बिंदुओं को आधार बनाया है।
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याचिका में पहला तर्क यह है कि हाईकोर्ट की खंडपीठ ने प्रदेश सरकार को पंचायत चुनाव रोस्टर जारी करने के लिए केवल चार दिन दिए हैं, जो तर्कसंगत नहीं है, जबकि एक अन्य खंडपीठ ने 2021 में मनीष धरमैक मामले में रोस्टर जारी करने के बाद आपत्तियां सुनने के लिए तीन महीने दिए थे। चुनाव समय पर करवाने को लेकर दायर याचिका की सुनवाई करने वाली खंडपीठ ने फैसले पर स्थिति स्पष्ट नहीं की। 
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दूसरा तर्क डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट से संबंधित है। प्रदेश में एक्ट लागू होने पर क्या पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव कुछ समय के लिए टाल सकते हैं या नहीं। आग्रह किया है कि इस पर भी कानून की स्थिति स्पष्ट होनी जरूरी है, क्योंकि डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट केंद्र सरकार का है, जबकि पंचायती राज अधिनियम राज्यों का है। 
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के महाधिवक्ता अनूप रतन ने कहा कि पंचायत चुनाव टालने की सरकार की कोई मंशा नहीं है। रोस्टर जारी करने के बाद आपत्तियों को लेकर खंडपीठ की अलग-अलग राय सामने आई है। कानून की व्याख्या स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि 31 जनवरी को पंचायतों का कार्यकाल खत्म हो गया है। पंचायती राज एक्ट में कार्यकाल समाप्त होने के बाद 6 माह में चुनाव करवाना बताया गया है। 
 

हाईकोर्ट ने कहा था- आपदा कानून का सहारा लेकर प्रदेश सरकार चुनाव नहीं टाल सकती
हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा था कि आपदा कानून का सहारा लेकर सरकार चुनाव नहीं टाल सकती। आपदा प्रबंधन एक्ट के तहत जारी आदेश निर्वाचन आयोग के कामकाज में बाधा नहीं बन सकते। खंडपीठ ने कहा कि संविधान सर्वोच्च है और आयोग स्वतंत्र सांविधानिक निकाय है। नए परिसीमन में देरी हो रही है, तो चुनाव 2011 की जनगणना और पिछले परिसीमन के आधार पर करवा सकते हैं।

वहीं, सरकार ने तर्क दिया था कि प्राकृतिक आपदा से कई क्षेत्रों में सड़कें और बुनियादी ढांचा प्रभावित है, इसलिए चुनाव करवाना संभव नहीं है। कुछ पंचायतों के पुनर्गठन और परिसीमन का काम लंबित है। वहीं चुनाव आयोग ने कोर्ट को बताया कि आयोग ने तैयारी की है। सरकार के आरक्षण रोस्टर का इंतजार है। चुनाव समय पर करवाने के लिए आयोग ने उपायुक्तों को निर्देश जारी किए हैं, लेकिन सरकार आपदा कानून और पुनर्सीमांकन का हवाला देकर इसे टाल रही है।

याचिकाकर्ता ने कहा - तीन साल का जश्न मना सकते हैं तो चुनाव क्यों नहीं  इसी मामले में एक याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि राज्य में जनजीवन सामान्य हो चुका है और सरकार अन्य बड़े आयोजन जैसे सरकार तीन साल का जश्न मना रही है, तो चुनाव क्यों नहीं। आपदा कानून और देविंद्र सिंह नेगी मामले में जिला परिषद शिमला के परिसीमन पर आए फैसले को चुनाव टालने के लिए ढाल के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश की जा रही है, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया। खंडपीठ ने कहा, आपदा या प्रशासनिक कारणों का हवाला देकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अनिश्चितकाल तक देरी नहीं की जा सकती। राज्य सरकार जानबूझकर चुनाव टालने की कोशिश कर रही है। बोर्ड परीक्षाओं, जनगणना और मानसून का बहाना बनाकर चुनाव को अनिश्चितकाल के लिए नहीं रोका जा सकता है।

9 जनवरी को सुनाया था फैसला
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रोमेश वर्मा की खंडपीठ ने 9 जनवरी को सरकार को आदेश दिया था कि पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव 30 अप्रैल तक करवाएं। खंडपीठ ने राज्य चुनाव आयोग, पंचायती राज विभाग और शहरी विकास विभाग को निर्देश दिया है कि आपसी खींचतान खत्म कर चुनाव आयोग के मार्गदर्शन में मिलकर काम करें।  
  • आयोग बड़े भाई की भूमिका निभाते हुए राज्य सरकार, पंचायती राज संस्थाओं और शहरी स्थानीय निकायों के साथ बातचीत करते हुए तालमेल बिठाए, ताकि चुनाव सुचारु रूप से करवाए जाएं। 
  • अदालत ने कहा था कि जहां पुनर्सीमांकन कार्य पूरा हो चुका है, वहां आरक्षण रोस्टर का काम तुरंत किया जाए। जहां पर पुनर्सीमांकन कार्य नहीं हुआ है, वहां पर 28 फरवरी तक पूरा करने को कहा था। 
  • कोर्ट ने कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 243-ई के तहत पंचायती राज संस्थाओं का पांच साल का कार्यकाल समाप्त होने से पहले चुनाव कराना अनिवार्य है। राज्य आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत जारी आदेश सांविधानिक जनादेश को दरकिनार नहीं कर सकते हैं।

वहीं, भाजपा विधायक सुधीर शर्मा ने सोशल मीडिया पर लिखा कि सुप्रीम कोर्ट में हिमाचल प्रदेश पंचायती राज चुनावों पर रोक लगाने के लिए दायर एसएलपी को अगर देखें तो यह 'सरकार बनाम सरकार' लग रहा है याचीकर्ता और रिसपोंडेंट्स की सूची को देखते ऐसा लगता है। चोरे दा गवाह मोर।
 
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