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हिमाचल प्रदेश: हाईकोर्ट ने कहा- वन भूमि पर अतिक्रमण, केंद्र व राज्य को व्यापक नीति बनाने की जरूरत

Tue, 15 Sep 2026 09:12 AM IST
Ankesh Dogra संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: Ankesh Dogra Updated Tue, 15 Sep 2026 09:12 AM IST
सार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने जंगलों में निजी भूमि मालिकों द्वारा वन भूमि के कथित बढ़ते अतिक्रमण पर चिंता जताई है। अदालत ने केंद्र और राज्य सरकार को इस समस्या से निपटने के लिए व्यापक नीति बनाने की जरूरत बताई। निजी भूमि को सरकारी जमीन से बदलने और उचित अनुमति के साथ भूमि मालिकों के पुनर्वास का सुझाव भी सामने आया। राज्य सरकार ने व्यावहारिक कठिनाइयों का हवाला देते हुए मामले को केंद्र के समक्ष उठाने की बात कही है।

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himachal high court forest land encroachment policy
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने जंगलों में निजी भूमि मालिकों के बढ़ते अतिक्रमण पर गहरी चिंता जताई है। अदालत ने कहा कि वन क्षेत्रों को सुरक्षित रखने के लिए केंद्र और राज्य स्तर पर एक व्यापक नीति बनाने की जरूरत है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश चिराग भानु की खंडपीठ ने जंगलों में आग की घटनाओं से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। सुनवाई में सामने आया कि हिमाचल में वन भूमि के भीतर निजी भूमि के कुछ हिस्से मौजूद हैं। 

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कोर्ट ने अपने पूर्व आदेश में कहा था कि निजी भूमि के मालिक धीरे-धीरे वन भूमि पर अतिक्रमण कर रहे हैं और अपनी सुविधा के लिए उसका इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे वन भूमि का रखरखाव प्रभावित हो रहा है और वन विभाग के लिए इसका प्रभावी प्रबंधन मुश्किल हो रहा है। कोर्ट का मानना है कि इस समस्या से निपटने के लिए केंद्र और राज्य स्तर पर एक व्यापक नीति की जरूरत है। इसके तहत जंगलों के भीतर स्थित निजी भूमि को सरकारी जमीन से बदला जाना चाहिए और निजी भूमि स्वामियों को जरूरी अनुमति के साथ जंगलों के बाहरी हिस्सों में पुनर्वासित किया जाना चाहिए। इससे पर्यावरण, सरकार और जमीन मालिकों के हितों में संतुलन बनेगा।
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कोर्ट के इस पिछले आदेश के जवाब में राज्य सरकार ने अदालत में एक अनुपालन हलफनामा दायर किया। राज्य ने अपनी व्यावहारिक कठिनाइयों को उजागर करते हुए बताया कि वन विषय संविधान की समवर्ती सूची में आता है। इस वजह से राज्य सरकार के पास लोगों के पुनर्वास या जमीन बदलने को लेकर अकेले फैसला लेने की स्वायत्तता नहीं है। राज्य का कहना है कि पुनर्वास के इस मामले को अब केंद्र सरकार के साथ उठाया जाएगा। खंडपीठ ने राज्य की इन दलीलों को रिकॉर्ड पर लिया है। कोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिए हैंं कि वह पिछले आदेश की टिप्पणियों को ध्यान में रखते हुए हलफनामा दाखिल करें। अगली सुनवाई 2 नवंबर को होगी।

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निजी कॉलेज के टेकओवर के बाद पुरानी सेवा को शून्य नहीं मान सकती सरकार 
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सरकारी नियंत्रण में लिए गए निजी कॉलेजों के कर्मचारियों के हक में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कॉलेज के सरकारीकरण के बाद स्टाफ को नया प्रवेशी मानकर उसकी पुरानी नियमित सेवाओं को शून्य नहीं किया जा सकता। ऐसी सेवाओं को पदोन्नति के लिए पात्रता और अनुभव के रूप में गिना जाना अनिवार्य है। न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की अदालत ने यह फैसला रंजीत सिंह राणा की दायर याचिका को मंजूर करते हुए दिया। याचिकाकर्ता को 1996 में थुरल स्थित महाराजा संसार चंद मेमोरियल डिग्री कॉलेज में नियमित लाइब्रेरी रिस्टोरर नियुक्त किया गया था। 9 नवंबर 2005 को सरकार ने इस कॉलेज का टेकओवर (सरकारीकरण) कर लिया। 24 जनवरी 2009 को सरकार ने नियमों को दरकिनार कर एक अन्य जूनियर कर्मचारी को असिस्टेंट लाइब्रेरियन पद पर पदोन्नत कर दिया, जबकि याचिकाकर्ता को यह कहकर रोक दिया गया कि उसकी सरकारी सेवा अभी 5 साल की नहीं हुई है।

बेरोजगार पत्नी व बच्चे के लिए 7,500 प्रति माह का गुजारा भत्ता अत्यधिक नहीं, पति की याचिका खारिज
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने गुजारा भत्ते के एक मामले में स्पष्ट किया है कि बेरोजगार पत्नी और 4 साल के बच्चे के लिए 7,500 प्रति माह का गुजारा भत्ता किसी भी तरह से अत्यधिक नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि आज के समय में इस राशि में बच्चे की पढ़ाई और बुनियादी जरूरतों के साथ जीवन यापन करना बेहद मुश्किल है। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल और न्यायाधीश योगेश जसवाल की खंडपीठ ने पति की ओर से दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज करते हुए यह आदेश दिया।

मंडी के प्रिंसिपल जज (फैमिली कोर्ट) ने सीआरपीसी की धारा 125 के तहत कुल 7,500 रुपये में पत्नी को 4,000 और 3,500 रुपये की राशि बच्चे के लिए मंजूर की थी। इसके साथ ही 8,000 का मुकदमा खर्च भी देने का आदेश दिया था। अदालत ने संज्ञान लिया कि 4 साल का बच्चा अब स्कूल जाने लगा है, जिससे पत्नी का खर्च और बढ़ेगा। वर्तमान में पत्नी के पास कमाई का कोई जरिया नहीं है और वह अपने माता-पिता पर निर्भर है। ऐसे में यह गुजारा भत्ता उनके अस्तित्व के लिए बेहद जरूरी है। पत्नी का आरोप है कि बच्चे के जन्म के समय ससुराल पक्ष से कोई उसे देखने नहीं आया और सारा खर्च उसके माता-पिता ने उठाया। बाद में पति के परिवार ने उसे वापस घर ले जाने से मना कर दिया, जिससे वह अपने पिता के घर रहने को मजबूर हो गई।
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