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हिमाचल में उठा था सीपीएस की नियुक्ति का सबसे पहला विवाद

Sat, 20 Jan 2018 02:27 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला Updated Sat, 20 Jan 2018 02:27 PM IST
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himachal First state where cps appointments challenged
हिमाचल प्रदेश सरकार

विधायकों को संसदीय सचिव बनाए जाने के मामले में भले ही दिल्ली में सियासी भूचाल खड़ा हुआ हो, लेकिन सीपीएस पद पर नियुक्तियों का सबसे पहला विवाद हिमाचल में सामने आया था। दरअसल, साल 2005 में पहली बार सीपीएस की नियुक्ति को लेकर विवाद खड़ा हो गया था।

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इसके बाद प्रदेश सरकार ने 2007 में सीपीएस की नियुक्ति के लिए विधानसभा से एक्ट पास कराया। इसमें उनकी नियुक्ति से लेकर उनके वेतन भत्ते, शक्तियां सभी के नियम बनाए गए। इसी के तहत आज तक सीपीएस की नियुक्ति की जा रही है।
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सीपीएस पद पर नियुक्ति का मामला वर्ष 2016 में फिर से तब उठाया गया जब दिल्ली सरकार के मुख्य संसदीय सचिवों (सीपीएस) की नियुक्ति पर सवाल उठे। उस दौरान एक आरटीआई कार्यकर्ता ने हिमाचल प्रदेश में सीपीएस की नियुक्ति पर सरकार को घेरा था।
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दो वर्ष पूर्व के इस मामले में भी प्रदेश सरकार द्वारा सीपीएस की नियुक्ति को लेकर 2007 में बनाया गया एक्ट ही नियुक्तियों की ढाल बना था। आरटीआई कार्यकर्ता का दावा था कि सीपीएस लाभ के पद पर आसीन हैं, ऐसे में इनकी सदस्यता रद्द की जाए।

सीपीएस को मिलता है इतना वेतन

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हालांकि हिमाचल सरकार ने यह कहते हुए बात को खारिज कर दिया था कि प्रदेश में सीपीएस की नियुक्ति 2007 में बने हिमाचल प्रदेश संसदीय सचिव (नियुक्ति, वेतन, भत्ते, शक्ति, सुविधा एवं एमेनेटीज) एक्ट के तहत करती है। इसी बात को आधार मानते हुए हाईकोर्ट ने भी आरटीआई कार्यकर्ता के पक्ष में कोई आदेश नहीं दिए।

पिछली वीरभद्र सरकार ने भी इसी एक्ट के तहत ही 9 सीपीएस की नियुक्ति की थी। प्रदेश की नई जयराम ठाकुर सरकार में भी कई विधायक सीपीएस बनने के लिए प्रयास कर रहे हैं। हालांकि सरकार अब तक यही कहती आ रही है कि जरूरत के हिसाब से सरकार किसी भी नियुक्ति को लेकर फैसला करेगी। 

आरटीआई कार्यकर्ता की याचिका के अनुसार हिमाचल में सीपीएस को हर महीने 65 हजार वेतन मिलता है। इसके अलावा बतौर विधानसभा क्षेत्र भत्ता 90 हजार, दैनिक भत्ता 1800, ऑफिस भत्ता 30 हजार, कंप्यूटर डाटा आपरेटर के लिए 15 हजार भत्ता मिलता है।

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