हिमाचल में पीएम मोदी के तिलिस्म से पस्त कांग्रेस में भविष्य का संकट
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मोदी के तिलिस्म और जनता के बारी-बारी से सत्ता की कुंजी सौंपने की परंपरा ने हिमाचल में इस बार कमल खिला दिया है। भाजपा के रणनीतिकारों की खुशी इसको लेकर भी है कि देवभूमि में कड़ाके की सर्दी के बीच छप्पर फाड़ कर मिले वोटों से पैदा हुई सियासी गर्मी उनके मिशन 2019 तक गर्माहट देगी।
हालांकि, पार्टी को प्रचंड बहुमत के बीच धूमल की हार पर अगला मुख्यमंत्री कौन? इस सवाल पर भाजपा में शुरू होने वाली खेमेबंदी जहां हाईकमान के सिर का दर्द बन सकती है, वहीं सरकार गठन में भी विलंब कर सकती है। मोदी लहर में कांग्रेस मुक्त राज्यों की सूची में फिलहाल हिमाचल भी आ गया है। ऐसे में कांग्रेस के लिए हिमाचल में भविष्य का राजनीतिक संकट भी पैदा हो सकता है।
दरअसल, उम्रदराज हो चुके वीरभद्र चुनाव के दौरान ही इसे अपना आखिरी चुनाव बता चुके हैं और यह भी सच है कि दशकों से भाजपा को टक्कर दे रहे उनके कद के बराबर का कोई नेता फिलहाल कांग्रेस के पास नहीं है। इन हालातों में संभव है कि जनता द्वारा तय रोटेशन के क्रम में पांच साल बाद कांग्रेस की बारी न आए। दूसरी ओर इस जीत से वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में भी हिमाचल की चारों लोकसभा सीटों पर भाजपा का कमल खिला रहने की आस भाजपा में जगी है।
सरकार गठन में भी हो सकती है देरी
दूसरी ओर भाजपा की प्रचंड जीत के बीच मुख्यमंत्री प्रत्याशी प्रेम कुमार धूमल और उनके कुछ करीबियों के हार जाने से पार्टी का एक खेमा उनकी घेराबंदी कर सकता है। इससे पूर्व धूमल की सीट बदलवाने को भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। ऐसे में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा या उनके गुट के किसी नेता को मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट किया जा सकता है।
नड्डा की पसंद जयराम भी बताए जाते हैं। पार्टी के भीतर इस खींचतान के बीच सरकार गठन में भी विलंब हो सकता है। अगर धूमल मुख्यमंत्री बनते भी हैं तो उतनी हनक के साथ उनका यह राज नहीं चलेगा। दरअसल, वीरभद्र और कांग्रेस के सामने इस चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी के रूप में एक बड़ी दीवार खड़ी हो गई थी।
वर्ष 2012 में भी हिमाचल के साथ ही गुजरात विधानसभा के चुनाव हुए थे लेकिन इस बार फर्क सिर्फ इतना था कि पिछली बार गुजरात में भाजपा की सरकार बनाने वाले नरेंद्र मोदी ने मुख्यमंत्री बनने की हैट्रिक मारी थी और इस बार देश के प्रधानमंत्री थे और उनके तिलिस्म की जद में हिमाचल भी था। मोदी का हिमाचल से पुराना नाता रहा है। वे यहां के प्रभारी रह चुके हैं और पार्टी को खड़ा करने में उनकी अहम भूमिका रही है। यही नहीं, धूमल को मुख्यमंत्री बनाने में भी इनका मुख्य रोल रहा था।
बारी-बारी से बनते-बिगड़ते रहे राजनीतिक हालात
कांग्रेस व उसके मुख्यमंत्री उम्मीदवार 83 वर्षीय वीरभद्र सिंह और भाजपा व उसके मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार 73 वर्षीय प्रेम कुमार धूमल के लिए यहां पर राजनीतिक हालात करीब तीन दशकों से अधिक समय से लगातार बारी-बारी से बनते-बिगड़ते रहे हैं। यह भी कह सकते हैं कि इस अवधि में भाजपा और कांग्रेस का चेहरा हिमाचल में यह दोनों प्रतिद्वंद्वी ही रहे।
कांग्रेस से वर्ष 1985 के चुनाव में जब वीरभद्र कांग्रेस के मुख्यमंत्री बने थे तो भाजपा से शांता कुमार उनके प्रतिद्वंद्वी होते थे। वर्ष 1990 में शांता आखिरी बार मुख्यमंत्री बने तो वर्ष 1993 में कुछ दिन की सरकार के बाद वीरभद्र को ही कुर्सी मिली।
वर्ष 1998 में धूमल पहली बार भाजपा से मुख्यमंत्री बने तो वर्ष 2003 में वीरभद्र सीएम बने। इसके बाद वर्ष 2007 में धूमल तो 2012 में वीरभद्र ने बाजी मारी। इस तरह से अगर इसे हिमाचल की जनता का दोनों के लिए फिक्स किया रोटेशन मानें या हर बार लागू होने वाला एंटी इनकंबेंसी फैक्टर तो वर्ष 2017 में धूमल या भाजपा का आना तय था।
टोपी के रंग का भी खेल
हिमाचल के चुनाव परिणाम से पहले यहां के पहाड़ों पर लोगों द्वारा पहने जाने वाली टोपी का रंग सरकार किसकी, इसका सटीक अनुमान लगवा देती हैं। यही यहां के लोगों की सियासी समझ को समझने का सबसे सही तरीका माना जाता है।
हालांकि, इन हिमाचली टोपियों के आगे का रंग कांग्रेस और भाजपा के रंगों से मेल न खाकर कांग्रेस के वीरभद्र व भाजपा के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार प्रेम कुमार धूमल से जुड़े रंगों के आधार पर होता है।
इसी कड़ी में इस बार वीरभद्र की टोपी के आगे हरे रंग के खाने बने होने वाली टोपी की जगह धूमल की महरुन रंग की टोपी ने लोगों के सिर पर जगह ले ली थी।