परमार जयंती पर विशेष: हिमाचल निर्माता के ‘घर की अनदेखी’ अधूरे हैं कई सपने
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हिमाचल निर्माता डॉ. यशवंत सिंह परमार का गृह जिला सरकार की अनदेखी का शिकार है। हिमाचल निर्माता ने जो सपने देखे थे, वह आज भी अधूरे हैं। दुखद यह है कि उनकी जन्मस्थली चनालग-बागथन को जोड़ने वाली सड़क की सुध नहीं ली जा रही।
राज्य में चाहे किसी की भी सरकार रही हो, लेकिन सिरमौर पिछड़े जिलों की श्रेणी से उभर नहीं पाया। चार अगस्त को परमार जयंती पर पूरे प्रदेश में कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।
शिमला में सरकारी स्तर का कार्यक्रम है तो उनके जन्म स्थल बागथन में पहली बार राज्य स्तर का कार्यक्रम रखा गया है, लेकिन कार्यक्रमों के आयोजन से अधिक उनके सपनों को साकार करने की जरूरत है।
वर्षों से बंद पड़ी है फैक्टरी
हिमाचल निर्माता डॉ. यशवंत सिंह परमार ने अपने क्षेत्र के लोगों की आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने के लिए बागथन में फल विधायन एवं प्रदर्शन उद्यान कारखाना लगवाया था। इसमें चटनी, आचार समेत कई उत्पाद बनाए जाते थे।
इसके माध्यम से जहां क्षेत्र के लोगों को रोजगार मिलता था, वहीं क्षेत्र के किसानों की ओर से तैयार किए गए फल और सब्जियों को भी बेचा जाता था, लेकिन आज इस फैक्टरी में ऐसा कुछ नहीं है।
वर्षों से यह फैक्टरी बंद पड़ी हुई है। पशु नस्ल सुधार के लिए न्यूजीलैंड से अच्छी नस्ल की पांच गाय लाई थीं और बागथन में पशु प्रजनन केंद्र खोला था। कभी यहां पर 89 गाय थीं, लेकिन आज इनकी संख्या सिमट कर महज 20 ही रह गई।
सिरमौर जिला न तो पर्यटन की दृष्टि से विकसित हो पाया और न ही यहां अन्य मूलभूत सुविधाएं जुटाई जा सकीं। कई गांव सड़क से अछूते हैं। शिलाई क्षेत्र के कई गांवों के लोग सड़क के अभाव में पलायन करने को विवश हैं, जबकि स्वास्थ्य सुविधाओं के हाल भी किसी से छुपा नहीं है।
डॉ. परमार की सादगी के कायल थे सभी
पच्छाद विधानसभा क्षेत्र के बागथन के पास चनालग गांव में जन्मे डॉ. यशवंत सिंह परमार की सादगी का हर कोई कायल था। हिमाचल को अस्तित्व में लाने में उनका अहम योगदान रहा।
चार अगस्त 1906 को जन्मे डॉ. यशवंत सिंह परमार ने पूरे हिमाचल को अपना घर समझा और पूरे प्रदेश में एक समान विकास करवाया। 1928 में लखनऊ से बीए ऑनर्स करने के बाद उन्होंने एमए, एलएलबी तथा समाजशास्त्र में पीएचडी की।
डॉ. परमार के अथक प्रयासों के बाद 15 अप्रैल 1948 को 30 रियासतों के विलय के बाद हिमाचल प्रदेश अलग राज्य बना। डॉ. परमार राजनीति में आने से पहले 1930 से 1937 तक सब जज और मजिस्ट्रेट रहे।
1937 से 1941 तक सिरमौर रियासत में जिला एवं सत्र न्यायाधीश के रूप में कार्य किया। वे सुकेत आंदोलन, ऑल इंडिया पीपुल्स कांन्फ्रेंस और प्रजामंडल प्रधान एसोसिएशन से भी जुड़े रहे।
1952 से 1956 तक पहली बार डॉ. यशवंत सिंह परमार प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। उसके बाद वे सांसद भी चुने गए। तत्पश्चात 1963 से 1977 तक डॉ यशवंत सिंह परमार प्रदेश के मुख्यमंत्री बने।