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हिमाचल: हाईकोर्ट ने कहा- पत्नी की अनुबंध पर नौकरी से खत्म नहीं होती पति की भरण-पोषण की जिम्मेदारी

Tue, 27 Oct 2026 06:46 PM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Tue, 27 Oct 2026 06:46 PM IST
सार

प्रदेश हाईकोर्ट ने गुजारा भत्ते के एक मामले में स्पष्ट किया है कि पत्नी की ओर से अनुबंध आधार पर कुछ आय अर्जित करने से पति की भरण-पोषण की जिम्मेदारी खत्म नहीं होती। 

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High Court states that a wife’s contractual employment does not absolve the husband of his maintenance obliga
अदालत(सांकेतिक)। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने गुजारा भत्ते के एक मामले में स्पष्ट किया है कि पत्नी की ओर से अनुबंध आधार पर कुछ आय अर्जित करने से पति की भरण-पोषण की जिम्मेदारी खत्म नहीं होती। अदालत ने कहा कि स्वस्थ और शिक्षित पति होने के नाते उसका यह नैतिक और कानूनी कर्तव्य है कि वह अपनी पत्नी की देखभाल करे। फैमिली कोर्ट की ओर से पारित 4,000 रुपये प्रति माह की राशि को किसी भी स्थिति में अत्यधिक नहीं कहा जा सकता। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल और न्यायाधीश योगेश जसवाल की खंडपीठ ने यह फैसला मनीष कुमार की ओर से दायर क्रिमिनल रिवीजन याचिका को खारिज करते हुए दिया।

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गौरतलब है कि फैमिली कोर्ट ऊना के अतिरिक्त प्रधान जज-दो ने 25 अप्रैल 2026 को पारित आदेश में 4,000 रुपये प्रति माह भरण-पोषण देने का आदेश दिया था। पति ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए कहा था कि वह लैब अटेंडेंट के रूप में 10,500 रुपये प्रति माह कमाता है, जबकि उसकी पत्नी मेट्रोन के रूप में काम कर रही है। उसने अदालत से भरण-पोषण की राशि को घटाकर 2,500 रुपये करने की मांग की थी। रिकॉर्ड और आरटीआई से सामने आया कि पत्नी जवाहर नवोदय विद्यालय में 541 रुपये प्रतिदिन की दिहाड़ी पर अनुबंध आधार पर कार्य कर रही थी। इसके अलावा पति ने यह जानकारी समय रहते निचली अदालत के समक्ष भी पेश नहीं की थी। पति के इस तर्क को कि उसकी आय कम है, अदालत ने खारिज कर दिया।

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वैवाहिक रिश्ता खत्म होने के बाद स्त्रीधन रोकना निरंतर अपराध नहीं : हाईकोर्ट
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक मामले में स्पष्ट किया है कि शादी टूटने (तलाक) के बाद पति या उसके परिवार के पास स्त्रीधन का बकाया रहना एक निरंतर अपराध नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि कानूनी रूप से पति-पत्नी का रिश्ता खत्म होने के बाद पत्नी को तीन साल की निर्धारित समय सीमा के भीतर ही स्त्रीधन की वापसी के लिए आपराधिक शिकायत दर्ज करानी होगी। यह फैसला न्यायाधीश चिराग भानु सिंह ने आरोपी पूर्व पति की ओर से दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को स्वीकार करते हुए सुनाया। अदालत ने निचली अदालत द्वारा जारी समन और आरोप पत्र सहित पूरी आपराधिक कार्रवाई को रद कर दिया है। पीड़ित महिला और याचिकाकर्ता की शादी साल 2007 में हुई थी, लेकिन आपसी विवाद के कारण वे 2008 से ही अलग रहने लगे थे। पूर्व पति ने क्रूरता और परित्याग के आधार पर अदालत से 9 अक्तूबर 2012 को तलाक की एकतरफा डिक्री हासिल कर ली थी। तलाक के करीब पांच साल बाद, महिला ने 19 जुलाई 2017 को शिमला की निचली अदालत में पूर्व पति के खिलाफ आरोप लगाया कि उसका स्त्रीधन अभी भी पूर्व पति के कब्जे में है। हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के पश्चात स्पष्ट किया कि न्यायिक अलगाव में पति-पत्नी का कानूनी रिश्ता बना रहता है, इसलिए वहां स्त्रीधन रोकना एक निरंतर अपराध माना जा सकता है। लेकिन तलाक की डिक्री मिलते ही दोनों का कानूनी रिश्ता पूरी तरह टूट जाता है। रिश्ता खत्म होने के बाद धारा 406 और 506 के तहत अधिकतम 3 साल की सजा का प्रावधान है। इसलिए सीआरपीसी की धारा 468 के तहत संज्ञान लेने की अवधि भी 3 वर्ष ही होगी। चूंकि यह शिकायत तलाक के 5 साल बाद दर्ज की गई थी, इसलिए कानूनन यह विचारणीय नहीं है। अदालत ने कहा कि महिला पूर्व में भरण-पोषण के लिए सिविल सूट और अन्य याचिकाएं दायर कर चुकी थी, लेकिन उसने तब कभी स्त्रीधन का दावा नहीं किया।

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