हिमाचल: एमआर होम के दोषपूर्ण डिजाइन पर हाईकोर्ट सख्त, मंजूरी देने वाले अधिकारी की जिम्मेदारी तय करने को कहा
प्रदेश हाईकोर्ट ने दिव्यांगजनों के अधिकारों के संरक्षण, बैकलॉग पदों को भरने और उनके लिए बनाए जा रहे बुनियादी ढांचे में खामियों को लेकर प्रदेश सरकार को फटकार लगाई है।
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने दिव्यांगजनों के अधिकारों के संरक्षण, बैकलॉग पदों को भरने और उनके लिए बनाए जा रहे बुनियादी ढांचे में खामियों को लेकर प्रदेश सरकार को फटकार लगाई है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश चिराग भानु की खंडपीठ ने शिमला के हीरानगर में स्थित एमआर होम (मेंटल रिटार्डेशन होम) के निर्माण में हुई गंभीर चूक पर कड़ा संज्ञान लेते हुए उस अधिकारी या व्यक्ति की जिम्मेदारी तय करने के आदेश दिए हैं, जिसने इस दोषपूर्ण बुनियादी ढांचे के डिजाइन को मंजूरी दी थी। कोर्ट ने कहा कि जनता के पैसे की इस बर्बादी के लिए जिम्मेदार अधिकारी की पहचान की जानी चाहिए। साथ ही सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग के सचिव से ताजा हलफनामा तलब किया गया है।
हाईकोर्ट ने सरकार को आदेश दिया है कि अगली सुनवाई से पहले दृष्टिबाधित व्यक्तियों के लिए खाली पड़े क्लास-फोर (ग्रुप-डी) के सभी पदों को भरने के लिए आवश्यक विज्ञापन तुरंत जारी किए जाए। अगली सुनवाई 27 अक्तूबर को होगी। शिमला जिले के हीरानगर में 50 मानसिक रूप से दिव्यांग बच्चों के लिए एक एमआर होम, हॉस्टल और स्कूल भवन का निर्माण 5.24 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से किया गया था। यह सरकारी भवन दिव्यांग बच्चों की जरूरतों के लिहाज से बेहद दोषपूर्ण पाया गया है।
अदालत ने पाया कि इसके कमरों और बाथरूम के दरवाजे इतने संकरे हैं कि व्हीलचेयर या वॉकर का उपयोग करने वाले बच्चे सुविधाओं तक पहुंच ही नहीं सकते। हैरान करने वाली बात यह है कि अब इन कमियों को सुधारने और भवन में बदलाव करने के लिए 828.47 लाख रुपये (करीब 8.28 करोड़ रुपये) के बजट का अनुमान लगाया गया है, जो इसकी मूल निर्माण लागत (5.24 करोड़) से भी कहीं अधिक है। अदालत के समक्ष यह तथ्य आया कि सशक्तिकरण विभाग के निदेशक ने ग्रुप-सी और ग्रुप-डी श्रेणियों में दिव्यांगों के लिए आरक्षित सभी रिक्त पदों को एक बार में विशेष अभियान के तहत भरने की अनुमति मांगी थी।
लेकिन राज्य सरकार ने इस सिफारिश को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि किसी एक आरक्षित श्रेणी के सभी पदों को एक साथ भरना भेदभावपूर्ण होगा। इस दलील को नकारते हुए हाईकोर्ट ने पंजाब सरकार का उदाहरण दिया, जिसने विशेष अभियान चलाकर दृष्टिबाधित लोगों के लिए ग्रुप-डी के पदों को भरा है। कोर्ट ने कहा कि जहां चाह होती है, वहां राह निकल आती है। विभिन्न 36 सरकारी विभागों के आंकड़ों की समीक्षा करते हुए खंडपीठ ने निर्देश दिया कि चूंकि दृष्टिबाधित वर्ग के चतुर्थ श्रेणी के अभ्यर्थियों को शैक्षणिक सुविधाओं के अभाव में उच्च पदों पर आवेदन करने में कठिनाई होती है, इसलिए उनके अधिकारों की रक्षा के लिए सबसे पहले कदम उठाए जाएं।