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Shimla News: प्रेस कॉन्फ्रेंस में पीड़िता की पहचान उजागर करने के मामले में आरोपी की डिस्चार्ज अर्जी खारिज
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मौखिक खुलासा करने मात्र से धारा 228ए के दायरे से नहीं बचा जा सकता
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। राजधानी की अदालत ने दुष्कर्म पीड़िता की पहचान सार्वजनिक करने और उसकी गरिमा को ठेस पहुंचाने के मामले में आरोपी संजय कुमार की डिस्चार्ज अर्जी खारिज कर दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रथम दृष्टया आरोपी के खिलाफ मुकदमा चलाने के पर्याप्त आधार मौजूद है। न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वितीय श्रेणी कोर्ट नंबर-8, शिमला सिमरन की अदालत ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता बीएनएसएस की धारा 262 के तहत दायर अर्जी पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया है। अभियोजन पक्ष के अनुसार आरोपी ने 14 जनवरी 2022 को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान दुष्कर्म पीड़िता का नाम और पहचान उजागर की थी। साथ ही, उसके सम्मान को ठेस पहुंचाने वाली टिप्पणियां भी की थीं। पुलिस ने मामले में धारा 228 ए और 509 भारतीय दंड संहिता के तहत आरोप पत्र दायर किया था। केवल अखबार में छपना ही अपराध नहीं, मीडिया के सामने बोलना भी दायरे में आरोपी पक्ष की ओर से दलील दी गई थी कि आईपीसी की धारा 228 ए प्रिंट या पब्लिश शब्द का इस्तेमाल हुआ है जबकि आरोपी ने खुद कुछ भी प्रिंट नहीं करवाया था। अदालत ने दस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि इस कानूनी प्रावधान का मुख्य उद्देश्य दुष्कर्म पीड़िता की पहचान सार्वजनिक होने से रोकना और उसे सामाजिक कलंक व अपमान से बचाना है। यदि प्रेस कॉन्फ्रेंस में मीडिया के सामने मौखिक तौर पर नाम उजागर किया जाता है तो इस प्रावधान का मकसद निष्प्रभावी नहीं हो सकता।
अदालत ने माना कि मामले में प्रेस कॉन्फ्रेंस की सीडी और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य रिकॉर्ड पर मौजूद है। रिकॉर्डिंग असली है या नहीं, आवाज आरोपी की है या नहीं और शब्दों के इस्तेमाल के पीछे क्या मंशा थी, इन तमाम बिंदुओं का निर्धारण ट्रायल के दौरान गवाहियाें और साक्ष्यों की जांच के बाद ही किया जा सकता है। वहीं, दिल्ली में दर्ज मूल मामले में पुलिस की कैंसिलेशन रिपोर्ट का हवाला देकर राहत मांगने की दलील पर अदालत ने कहा कि पीड़िता ने उस रिपोर्ट के खिलाफ प्रोटेस्ट पिटीशन दायर कर रखी है। लिहाजा, केवल उस आधार पर मौजूदा मामले को आधारहीन नहीं माना जा सकता। अदालत ने आरोपी की डिस्चार्ज अर्जी खारिज करते हुए मामले में ट्रायल जारी रखने के आदेश दिए हैं।
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संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। राजधानी की अदालत ने दुष्कर्म पीड़िता की पहचान सार्वजनिक करने और उसकी गरिमा को ठेस पहुंचाने के मामले में आरोपी संजय कुमार की डिस्चार्ज अर्जी खारिज कर दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रथम दृष्टया आरोपी के खिलाफ मुकदमा चलाने के पर्याप्त आधार मौजूद है। न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वितीय श्रेणी कोर्ट नंबर-8, शिमला सिमरन की अदालत ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता बीएनएसएस की धारा 262 के तहत दायर अर्जी पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया है। अभियोजन पक्ष के अनुसार आरोपी ने 14 जनवरी 2022 को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान दुष्कर्म पीड़िता का नाम और पहचान उजागर की थी। साथ ही, उसके सम्मान को ठेस पहुंचाने वाली टिप्पणियां भी की थीं। पुलिस ने मामले में धारा 228 ए और 509 भारतीय दंड संहिता के तहत आरोप पत्र दायर किया था। केवल अखबार में छपना ही अपराध नहीं, मीडिया के सामने बोलना भी दायरे में आरोपी पक्ष की ओर से दलील दी गई थी कि आईपीसी की धारा 228 ए प्रिंट या पब्लिश शब्द का इस्तेमाल हुआ है जबकि आरोपी ने खुद कुछ भी प्रिंट नहीं करवाया था। अदालत ने दस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि इस कानूनी प्रावधान का मुख्य उद्देश्य दुष्कर्म पीड़िता की पहचान सार्वजनिक होने से रोकना और उसे सामाजिक कलंक व अपमान से बचाना है। यदि प्रेस कॉन्फ्रेंस में मीडिया के सामने मौखिक तौर पर नाम उजागर किया जाता है तो इस प्रावधान का मकसद निष्प्रभावी नहीं हो सकता।
अदालत ने माना कि मामले में प्रेस कॉन्फ्रेंस की सीडी और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य रिकॉर्ड पर मौजूद है। रिकॉर्डिंग असली है या नहीं, आवाज आरोपी की है या नहीं और शब्दों के इस्तेमाल के पीछे क्या मंशा थी, इन तमाम बिंदुओं का निर्धारण ट्रायल के दौरान गवाहियाें और साक्ष्यों की जांच के बाद ही किया जा सकता है। वहीं, दिल्ली में दर्ज मूल मामले में पुलिस की कैंसिलेशन रिपोर्ट का हवाला देकर राहत मांगने की दलील पर अदालत ने कहा कि पीड़िता ने उस रिपोर्ट के खिलाफ प्रोटेस्ट पिटीशन दायर कर रखी है। लिहाजा, केवल उस आधार पर मौजूदा मामले को आधारहीन नहीं माना जा सकता। अदालत ने आरोपी की डिस्चार्ज अर्जी खारिज करते हुए मामले में ट्रायल जारी रखने के आदेश दिए हैं।
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